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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 52 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 52/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अग्निः सौचीकः देवता - देवाः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अ॒हं होता॒ न्य॑सीदं॒ यजी॑या॒न्विश्वे॑ दे॒वा म॒रुतो॑ मा जुनन्ति । अह॑रहरश्वि॒नाध्व॑र्यवं वां ब्र॒ह्मा स॒मिद्भ॑वति॒ साहु॑तिर्वाम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒हम् । होता॑ । नि । अ॒सी॒द॒म् । यजी॑यान् । विश्वे॑ । दे॒वाः॒ । म॒रुतः॑ । मा॒ । जु॒न॒न्ति॒ । अहः॑ऽअहः । अ॒श्वि॒ना॒ । आध्व॑र्यवम् । वा॒म् । ब्र॒ह्मा । स॒म्ऽइत् । भ॒व॒ति॒ । सा । आऽहु॑तिः । वा॒म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहं होता न्यसीदं यजीयान्विश्वे देवा मरुतो मा जुनन्ति । अहरहरश्विनाध्वर्यवं वां ब्रह्मा समिद्भवति साहुतिर्वाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहम् । होता । नि । असीदम् । यजीयान् । विश्वे । देवाः । मरुतः । मा । जुनन्ति । अहःऽअहः । अश्विना । आध्वर्यवम् । वाम् । ब्रह्मा । सम्ऽइत् । भवति । सा । आऽहुतिः । वाम् ॥ १०.५२.२

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 52; मन्त्र » 2
    अष्टक » 8; अध्याय » 1; वर्ग » 12; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (अहं यजीयान् होता न्यसीदम्) मैं अतिशय से संगतिकर्ता ज्ञानभाग का ग्रहण करनेवाला तुम लोगों के बीच में उपस्थित हूँ (विश्वेदेवाः-मरुतः-मा जुनन्ति) सम्बन्धी जन और विद्वान् मुझे आगे प्रेरित करते हैं (अश्विना वाम्-आध्वर्यवम्-अहः-अहः-भवति) हे अध्यापक-उपदेशको ! तुम्हारा ज्ञानदान दिन-दिन-प्रतिदिन होता रहे (वां ब्रह्मा-समित् सा-आहुतिः) तुम्हारा शिष्य चतुर्वेदवेत्ता तथा सम्यक् ज्ञान में प्रकाशित ज्ञान-आहुति दूसरों के लिए बने ॥२॥

    भावार्थ

    मनुष्य को अपने वृद्ध सम्बन्धियों और विद्वानों से घर पर रहते हुए ज्ञान का जितना ग्रहण हो सके, करना चाहिए तथा अध्यापक और उपदेशकों से विधिपूर्वक ज्ञानलाभ करके चारों वेदों का वेत्ता होने की आकाङ्क्षा रखता हुआ मानवसमाज में अपने को ज्ञान की आहुति बना दे ॥२॥

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    विषय

    ब्रह्मज्ञान के दान और प्रतिग्रह का वर्णन।

    भावार्थ

    (अहम्) मैं अल्पशक्ति, अल्पज्ञानी जीव, (होता) ज्ञान और शक्ति का लेने हारा और (यजीयान्) सर्वोत्कृष्ट सत्-संगति करनेहारा होकर (नि असीदम्) स्थिर होकर बैठूं। और (विश्वे देवाः) समस्त देव, ज्ञान को प्रकाशित करने और प्रदान करने वाले (मरुतः) विद्वान् जन (मा जुनन्ति) मुझे प्रेरित या उपदेश करें। हे (अश्विना) दिन रात्रिवत् ज्ञाननिष्ठ और कर्मनिष्ठ पुरुषो ! माता पिता वा हे जितेन्द्रिय गुरु उपदेशक जनो ! (अहरहः) दिन रात ही (वाम् आध्वर्यवम् भवति) आप दोनों का यज्ञ में अध्वर्यु के समान शासन एवं अविनाशी यज्ञ वा ब्रह्मरूप अध्वर-सम्बन्धी ज्ञानोपदेश हो। और (ब्रह्मा सम्-इत् भवति) महान् प्रभु वा चतुर्वेदज्ञ विद्वान् पुरुष होकर ज्ञान को भली प्रकार प्रकाशित करने वाला हो। और तब (वाम् सा आहुतिः) आप दोनों की वह ज्ञान, बल आदि की आहुति अर्थात् ब्रह्मदान सफल हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अग्निः सौचीक ऋषिः। देवा देवताः॥ छन्द:- १ त्रिष्टुप्। २–४ निचृत् त्रिष्टुप्। ५, ६ विराट् त्रिष्टुप्॥ षडृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    अश्विनी देवों का आध्वर्यव

    पदार्थ

    [१] प्रभु कहते हैं कि (अहम्) = मैं (होता) = देनेवाला हूँ । (न्यसीदम्) = यहाँ सब के हृदय- देश में ही बैठा हूँ । (यजीयान्) = अधिक से अधिक संगतिकरण योग्य व देनेवाला हूँ। [२] (विश्वदेवा:) = देव तथा (मरुतः) = प्राण-प्राणसाधक पुरुष (मा) = मुझे (जुनन्ति) = प्रेरित करते हैं । अर्थात् देववृत्ति के प्राणसाधक पुरुषों को देने के लिये मेरी कामना होती है । 'इनको दिया गया धन ठीक ही विनियुक्त होगा' इस विचार से इन्हें धन देने की मैं इच्छा करता हूँ। [३] हे अश्विना प्राणापानो ! (वाम्) = आप दोनों का ही (अहरहः) = यह प्रतिदिन का (आध्वर्यवम्) = यज्ञकार्य का प्रचलन होता है । अर्थात् जब मनुष्य प्राणसाधना करता है तब उसके मलों का नाश होकर चित्तवृत्ति का प्रसादन व नैर्मल्य सिद्ध होता है । चित्तवृत्ति के निर्मल होने पर मनुष्य भोग-प्रवण न होकर यज्ञात्मक वृत्तिवाला बनता है । इस प्रकार यह यज्ञ का प्रचलन प्राणापान की साधना पर ही निर्भर करता है। [४] इस प्राणसाधना से अन्त में विवेकख्याति होती है, आत्मदर्शन होता है । (ब्रह्मा) = चारों वेदों का ज्ञान देनेवाला प्रभु (समिद् भवति) = हमारे जीवनों को दीप्त करनेवाला होता है [ सं इन्ध्] । (सा आहुति:) = यह देना भी (वाम्) = हे प्राणापानो! आपकी ही है। प्रभु दर्शन के होने पर सांसारिक आनन्द तुच्छ हो जाते हैं, मनुष्य इन भोगों में न उलझकर यज्ञात्मक जीवन बितानेवाला होता है।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु देवों व प्राणसाधकों को अपना प्रिय भक्त समझते हैं ।

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (अहं यजीयान् होता न्यसीदम्) अहमतिशयेन सङ्गतिकर्त्ता ज्ञानभागस्यादाता निषीदामि (विश्वेदेवाः मरुतः-मा जुनन्ति) जनाः ऋत्विजो विद्वांसः “मरुतः ऋत्विङ्नाम” [निघ० ३।१८] मां प्रेरयन्ति (अश्विना वाम्-आध्वर्यवम्-अहः-अहः-भवति) हे-अध्याकोपदेशकौ ! “अश्विनौ-अध्यापकोपदेशकौ” [ऋ० ५।७८ दयानन्दः] युवयोः-ज्ञानयज्ञप्रापणं दिनं दिनं प्रतिदिनं भवेत् (वां ब्रह्मा समित्-सा-आहुतिः) युवयोः शिष्यश्च ब्रह्मा चतुर्वेदवेत्ता भवेत् तथा सम्यग्ज्ञानेन प्रकाशिता सा ज्ञानाहुतिर्भवेत् ॥२॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    I am the hota, performer of yajna, calling to the fire and offering oblations into the vedi, seated on the vedi one in unison with all people. All divinities of the world and Maruts, vibrant youth, like winds of storm, inspire and energise me. O Ashvins, complementary powers of nature and humanity, men and women, teachers and preachers in the socio-economic system, yours is the conduct of the organisation of yajna day by day at and from the very rise of dawn. Let the Vedic scholar, bright and cool like the moon be the Brahma, presiding high priest, and act like ignition and illumination of the fire, and let that light and fire be the concluding oblation into the fire.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसाने आपल्या वृद्ध विद्वानांकडून घरी राहून ज्ञान जितके ग्रहण करता येईल तितके करावे व अध्यापक व उपदेशकाकडून विधिपूर्वक ज्ञानलाभ करून चारही वेदांचा वेत्ता होण्याची आकांक्षा बाळगून मानव समाजात आपली ज्ञान आहुती द्यावी. ॥२॥

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