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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 52 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 52/ मन्त्र 5
    ऋषिः - अग्निः सौचीकः देवता - देवाः छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    आ वो॑ यक्ष्यमृत॒त्वं सु॒वीरं॒ यथा॑ वो देवा॒ वरि॑व॒: करा॑णि । आ बा॒ह्वोर्वज्र॒मिन्द्र॑स्य धेया॒मथे॒मा विश्वा॒: पृत॑ना जयाति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । वः॒ । य॒क्षि॒ । अ॒मृत॒ऽत्वम् । सु॒ऽवीर॑म् । यथा॑ । वः॒ । दे॒वाः॒ । वरि॑वः । करा॑णि । आ । बा॒ह्वोः । वज्र॑म् । इन्द्र॑स्य । धेया॑म् । अथ॑ । इ॒माः । विश्वाः॑ । पृत॑नाः । ज॒या॒ति॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ वो यक्ष्यमृतत्वं सुवीरं यथा वो देवा वरिव: कराणि । आ बाह्वोर्वज्रमिन्द्रस्य धेयामथेमा विश्वा: पृतना जयाति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । वः । यक्षि । अमृतऽत्वम् । सुऽवीरम् । यथा । वः । देवाः । वरिवः । कराणि । आ । बाह्वोः । वज्रम् । इन्द्रस्य । धेयाम् । अथ । इमाः । विश्वाः । पृतनाः । जयाति ॥ १०.५२.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 52; मन्त्र » 5
    अष्टक » 8; अध्याय » 1; वर्ग » 12; मन्त्र » 5
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (देवाः) हे विद्वानो ! (वः) तुम्हारी (यथा वरिवः कराणि) जैसे मैं परिचर्या करता हूँ (वः-सुवीरम्-अमृतत्वम्-आयक्षि) उसी प्रकार तुम्हारे श्रेष्ठ ज्ञानबल को-अमृतरूप को अपने में धारण करता हूँ (इन्द्रस्य वज्रं बाह्वोः-आधेयाम्) ऐश्वर्यवान् परमात्मा के ज्ञानमय ओज, अज्ञान के बाधक आत्मा और मन के अन्दर करता हूँ (अथ-इमाः-विश्वाः पृतनाः-जयाति) पुनः इन सारी विरोधी वासनाओं को मनुष्य जीत लेता है ॥५॥

    भावार्थ

    जिज्ञासु को विद्वानों की सेवा करनी चाहिए, जिससे कि विद्वानों से ज्ञानबल और आत्मिक बल प्राप्त हो सके एवं परमात्मा की उपासना भी करनी चाहिए। अज्ञाननाशक परमात्मा के ओज को अपने मन और आत्मा में धारण करके वासनाओं पर विजय पानी चाहिए ॥५॥

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    विषय

    विद्वानों से ज्ञान धारण करने के साथ बल-वीर्य धारण, ब्रह्मचर्य-धारण तथा प्राण निग्रह के साथ २ शत्रुदमन।

    भावार्थ

    हे (देवाः) विद्वान् जनो ! हे प्राणगण ! (वः यथा वरिवः कृणोमि) मैं आप लोगों की जैसी २ सेवा करता हूं उतना ही मैं (वः) आप लोगों के (सु-वीरम्) उत्तम बलवीर्य सम्पन्न (अमृतत्वं आ यक्षि) अमृतत्व, अविनाशी भाव को प्राप्त करता हूं। मैं ही (इन्द्रस्य) आत्मा, वा महान ऐश्वर्यवान् प्रभु के (वज्रम्) बल वीर्य को (बाह्वोः आ धेयाम्) बाहुओं में धारण करूं। (अथ) और अनन्तर (इमा विश्वाः पृतनाः) इन समस्त शत्रु सेनाओं वा संग्रामों को भी (जयाति) वह जीत लेता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अग्निः सौचीक ऋषिः। देवा देवताः॥ छन्द:- १ त्रिष्टुप्। २–४ निचृत् त्रिष्टुप्। ५, ६ विराट् त्रिष्टुप्॥ षडृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    'अमृतत्व सुवीर-धन'

    पदार्थ

    [१] प्रभु कहते हैं कि (देवाः) = हे देवो ! मैं (वः) = आपके साथ (अमृतत्वम्) = अमरता व नीरोगता का (आयक्षि) = सम्पर्क करता हूँ । (सुवीरम्) = उत्तम सन्तानों को संगत करता हूँ। उसी प्रकार नीरोगता व उत्तम सन्तानों को प्राप्त कराता हूँ (यथा) = जैसे (वः) = तुम्हें (वरिवः कराणि) = धन देता हूँ। गत मन्त्र के अनुसार ज्ञानी प्रभु से निर्दिष्ट यज्ञों को करनेवाले बनते हैं और प्रभु इन्हें नीरोगता, उत्तम सन्तान व धन प्राप्त कराते हैं । [२] प्रभु कहते हैं कि मैं (इन्द्रस्य) = देवों के सम्राट् इस जितेन्द्रिय पुरुष की (बाह्वोः) = भुजाओं में (वज्रम्) = क्रियाशीलता रूप वज्र को (आधेयाम्) = स्थापित करता हूँ। इस जितेन्द्रिय पुरुष के जीवन को मैं खूब ही क्रियाशील बनाता हूँ । अथ अब इस क्रियाशीलता से यह इन्द्र (इमाः) = इन (विश्वाः) = सब (पृतनाः) = संग्रामों को (जयाति) = जीतता है । क्रियाशीलता के होने पर काम-क्रोधादि का आक्रमण होता ही नहीं। यही इनको क्रियाशीलता के द्वारा पराजित करता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - देव प्रभु प्रतिपादित यज्ञों को करते हैं। प्रभु इन्हें नीरोगता, उत्तम सन्तान व धन प्राप्त कराते हैं तथा इन्हें वह क्रियाशीलता प्राप्त कराते हैं जिससे कि ये काम-क्रोधाधि को संग्राम में पराजित करनेवाले होते हैं।

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (देवाः) हे विद्वांसः ! (वः) युष्माकम् (यथा वरिवः कराणि) यथा हि परिचर्यां करोमि, तथैव (वः-सुवीरम् अमृतत्वम्-आयक्षि) युष्माकं सुबलं सुष्ठुज्ञानबलं खल्वमृतरूपं स्वस्मिनादधे समन्ताद् धारयामि (इन्द्रस्य वज्रं बाह्वोः आधेयाम्) ऐश्वर्यवतः परमात्मनो ज्ञानमयमोजः “वज्रो वा ओजः” [श० ८।४।१।२०] अज्ञानबाधकयोरात्ममनसो-रभ्यन्तरे ह्यादधामि (अथ-इमाः-विश्वाः पृतनाः-जयाति) अनन्तर-मिमाः सर्वा विरोधिन्यो वासना मनुष्यो जयति ॥५॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O devas, as I do honour and service to you in the best manner, as I pray for your gifts of immortality, virility and vitality, and as I hold in hands the ruler’s thunderbolt of justice and dispensation, this way does man win all the battles of life.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जिज्ञासूने विद्वानांची सेवा केली पाहिजे. ज्यामुळे विद्वानांकडून ज्ञानबल व आत्मिक बल प्राप्त होऊ शकेल, तसेच परमात्म्याची उपासनाही केली पाहिजे. अज्ञाननाशक परमात्म्याचे ओज आपल्या मन व आत्म्यात धारण करून वासनांवर विजय प्राप्त केला पाहिजे. ॥५॥

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