ऋग्वेद मण्डल - 2 के सूक्त 28 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 28/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा देवता - वरुणः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    मैं (यः) जो (मन्द्रः) आनन्द देनेवाला (देवः) विद्वान् (मह्ना) महत्त्व के साथ (अस्तु) होवे उस (स्वराजः) स्वयं शोभायमान (वरुणस्य) श्रेष्ठ (भूरेः) बहुत विद्यावाले (आदित्यस्य) सूर्य के तुल्य वर्त्तमान उपकारी (कवेः) विद्वान् के सम्बन्ध से जो (विश्वानि) सब कर्त्तव्य (सन्ति) हैं (इदम्) इस सब और (सुकीर्त्तिम्) सुन्दर कीर्त्ति को (यजथाय) सत्कार के लिये (अति,अभि,भिक्षे) अत्यन्त सब ओर से माँगता हूँ ॥१॥

    भावार्थ -

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य की किरण घटपटादि पदार्थों को प्रकाशित करती हैं, वैसे विद्वानों के उपदेश श्रोता लोगों के आत्माओं को प्रकाशित करते हैं ॥१॥

    अन्वय -

    अहं यो मन्द्रो देवो मह्नास्तु तस्य स्वराजो वरुणस्य भूरेरादित्यस्येव वर्त्तमानस्य कवेः सकाशाद्यानि सन्तीदं सर्वं सुकीर्त्तिं यजथायात्यभि भिक्षे ॥१॥

    पदार्थ -

    (इदम्) (कवेः) विदुषः (आदित्यस्य) सूर्यस्य (स्वराजः) यः स्वयं राजते तस्य (विश्वानि) सर्वाणि (सन्ति) वर्त्तन्ते। अत्र संहितायामिति दीर्घः (अभि) (अस्तु) भवतु (मह्ना) महिम्ना महत्त्वेन (अति) (यः) (मन्द्रः) आनन्दप्रदः (यजथाय) सत्करणाय (देवः) विद्वान् (सुकीर्त्तिम्) (भिक्षे) (वरुणस्य) (भूरेः) बहुविद्यस्य ॥१॥

    भावार्थ -

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथाऽऽदित्यस्य किरणा घटपटादीन् प्रकाशयन्ति तथा विदुषामुपदेशाः श्रोतॄणामात्मनः प्रकाशयन्ति ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशी सूर्याची किरणे सर्व पदार्थांना प्रकाशित करतात तसे विद्वानांचे उपदेश श्रोत्यांच्या आत्म्यांना प्रकाशित करतात. ॥ १ ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top