ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 16/ मन्त्र 4
चक्रि॒र्यो विश्वा॒ भुव॑ना॒भि सा॑स॒हिश्चक्रि॑र्दे॒वेष्वा दुवः॑। आ दे॒वेषु॒ यत॑त॒ आ सु॒वीर्य॒ आ शंस॑ उ॒त नृ॒णाम्॥
स्वर सहित पद पाठचक्रिः॑ । यः । विश्वा॑ । भुव॑ना । अ॒भि । स॒स॒हिः । चक्रिः॑ । दे॒वेषु॑ । आ । दुवः॑ । आ । दे॒वेषु॑ । यत॑ते । आ । सु॒ऽवीर्ये॑ । आ । शंसे॑ । उ॒त । नृ॒णाम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
चक्रिर्यो विश्वा भुवनाभि सासहिश्चक्रिर्देवेष्वा दुवः। आ देवेषु यतत आ सुवीर्य आ शंस उत नृणाम्॥
स्वर रहित पद पाठचक्रिः। यः। विश्वा। भुवना। अभि। ससहिः। चक्रिः। देवेषु। आ। दुवः। आ। देवेषु। यतते। आ। सुऽवीर्ये। आ। शंसे। उत। नृणाम्॥
ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 16; मन्त्र » 4
अष्टक » 3; अध्याय » 1; वर्ग » 16; मन्त्र » 4
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अष्टक » 3; अध्याय » 1; वर्ग » 16; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह।
अन्वयः
हे मनुष्या यो विश्वा भुवनाऽभिचक्रिर्देवेषु सासहिर्दुवरा चक्रिर्देवेष्वा यतत उतापि नृणामाशंसे सुवीर्य्य आ यतते तं सदा सेवध्वम् ॥४॥
पदार्थः
(चक्रिः) यः करोति सः (यः) (विश्वा) सर्वाणि (भुवना) भवन्ति येषु तानि भुवनानि (अभि) (सासहिः) अतिशयेन सोढा (चक्रिः) कर्तुं शीलः (देवेषु) दिव्यगुणेषु (आ) (दुवः) परिचरणं सेवनम् (आ) (देवेषु) प्रशंसकेषु (यतते) साध्नोति (आ) (सुवीर्य्ये) शोभने बले (आ) (शंसे) स्तुतौ (उत) (नृणाम्) वीरजनानाम् ॥४॥
भावार्थः
हे मनुष्या येन सर्वे लोका निर्मिता मनुष्यादयः प्राणिनस्तेषां निर्वाहायान्नादयः पदार्था रचिता यो विद्वद्भिर्वेद्यस्तस्यैव परमात्मनः सेवनं सततं कर्त्तव्यम् ॥४॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदार्थ
हे मनुष्यो ! (यः) जो (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवना) लोकों का (अभि, चक्रिः) अभिमुख कर्ता (देवेषु) उत्तम गुणों में (सासहिः) अतिसहनशील और (दुवः) सेवन को (आ, चक्रिः) अच्छे प्रकार करनेवाला और जो (देवेषु) स्तुतिकारकों में (आ) (यतते) अच्छा यत्न करता है (उत) और भी (नृणाम्) वीरपुरुषों की (आ) (शंसे) स्तुति में (सुवीर्य्ये) श्रेष्ठ बल में (आ) सब प्रकार प्रयत्न करता है, उसकी सदा (सेवध्वम्) सेवा करो ॥४॥
भावार्थ
हे मनुष्यो ! जिसने सम्पूर्ण लोक तथा मनुष्य आदि प्राणी रचे और उन प्राणियों के जीवनार्थ अन्न आदि पदार्थ रचे और जो विद्वानों से जानने योग्य उस ही परमात्मा का निरन्तर सेवन करना चाहिये ॥४॥
विषय
देव-शंस व सुवीर्य
पदार्थ
[१] (यः) = जो प्रभु (विश्वा भुवना) = सब लोकों को (चक्रिः) = बनाते हैं, जो (अभिसासहिः) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं का अभिभव करनेवाले हैं। जो प्रभु (देवेषु) = देववृत्तिवाले व्यक्तियों में (दुवः) = [Wealth] धन को (आचक्रिः) = सब प्रकार से करनेवाले हैं। [२] ये प्रभु (देवेषु) = देववृत्तिवाले व्यक्तियों में (आयतते) = [आभिमुख्येन गच्छति] आभिमुख्येन प्राप्त होते हैं, (सुवीर्ये) = उत्तम शक्तिवाले में प्राप्त होते हैं। (उत) = और (नृणाम्) = मनुष्यों में (शंसे) = शंसन करनेवाले व स्तुति करनेवाले में आ प्राप्त होते हैं। प्रभु की प्राप्ति 'देव, सुवीर्य व शंसों' को होती है । 'विद्वांसो हि देवाः' ज्ञानी पुरुष ही देव हैं। इसी प्रकार प्रभुप्राप्ति उसको होती है जो कि [क] मस्तिष्क के दृष्टिकोण से देव है, [ख] मन के दृष्टिकोण से शंस है, [ग] तथा शरीर के दृष्टिकोण से सुवीर्य है। [३] ये प्रभु ही देवों को धन प्राप्त कराते हैं। शंसन व स्तवन करनेवालों के काम-क्रोध आदि का पराभव करते हैं। सुवीर्य पुरुषों के अंग-प्रत्यंगों का सुन्दर निर्माण करते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ- हम देव बनकर धन के पात्र हों। स्तवन करनेवाले होकर काम आदि का पराभव करनेवाले हों। सुवीर्य बनकर सुन्दर अंग-प्रत्यंगवाले हों।
विषय
अग्रणी के अनुयायियों के प्रति कर्त्तव्य।
भावार्थ
(यः) जो (चक्रिः) स्वयं कार्यों को करने में कुशल होकर (विश्वा भुवना अभि यतते) समस्त लोकों को लक्ष्य करके उनके उपकार करने में यत्नवान् रहता है, जो (सासहिः) सहनशील पराक्रमी होकर (देवेषु) ऐश्वर्य की कामना करने और विद्यादि गुणों में चमकने वाले विद्वानों के बीच (चक्रिः) कार्यकुशल होकर उनकी (दुवः) सेवा शुश्रूषा (आ यतते) आदरपूर्वक यथायोग्य करता है। जो (देवेषु) दानशील, विजयेच्छुक पुरुषों के बीच भी (सुवीर्ये) उत्तम शोभाजनक वीर्य, बल को प्राप्त करने (उत्) और (नृणाम्) मनुष्यों या नायक पुरुषों के बीच (शंसे) उत्तम ख्याति लाभ करने के निमित्त (आ यतते) पूर्व यत्न करता है वही (अग्निः) अग्रणी, नायक, तेजस्वी प्रतापी है। (२) परमात्मा के पक्षमें—परमेश्वर (भुवना विश्वा चक्रिः) सब लोकों के बनाने हारा है। वह (देवेषु दुवः आचक्रिः) दिव्य तेजस्वी सूर्य, अग्नि, विद्युदादि पदार्थों में ताप, शक्ति, प्रदान करता है। वह (देवेषु) विद्वानों में उत्तम बल देने और मनुष्यों के (शंसे) उपदेश करने में (आ यतते) सब प्रकार से यत्न करता है। अर्थात् वही बल और ज्ञान देता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
उत्कीलः कात्य ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः– १, ५ भुरिगनुष्टुप। २, ६ निचृत् पंक्तिः। ३ निचृद् बृहती। ४ भुरिग् बृहती ॥ षडृचं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
हे माणसांनो! ज्याने संपूर्ण लोक व मनुष्य इत्यादी प्राणी निर्माण केलेले आहेत, त्या प्राण्यांच्या जीवनासाठी अन्न इत्यादी पदार्थ निर्माण केलेले आहेत व जो विद्वानांनी जाणण्यायोग्य आहे, त्याच परमात्म्याचे निरंतर सेवन केले पाहिजे. ॥ ४ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
The lord of action wields and governs all regions of the world, he is the adorable sustainer among all the divine powers, he inspires life and passion among the noblest of humanity, and he is the object of admiration and the very life of the courage and valour of the people.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The learned person's duties are stated.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O men ! worship that one God alone, Who is the creator of all those planets, Who excels all in might and endures, and is served by all enlightened persons. They accomplish or fulfil the noble desires of His devotees, who help in achieving heroic strength and is the object of the praise of all brave men.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O men! you should always serve or adore That one God only, who created all worlds and all beings, Who has provided food for all and Who can be comprehended only by the enlightened persons.
Foot Notes
(दुव:) परिचरणं सेवनम् | (दुव ) दुवस्पति परिचरणकर्मा ( N. G. 3, 5 ) = Service or worship. (चक्रि:) कर्तुशील:| = Capable to create. (देवेषु ) प्रशंसकेषु – दिव्येषु गुणेषु | - In the Divine Attributes or among the devotees. According to Shri Sayanacharya, the Agni mentioned in the mantra is अयम् अग्नि:। (चक्रि:) सर्वस्य जगतः कर्त्ता सच विश्वा भुवनानि अभिविशति - अनेन अग्नेः सर्वव्यापकता प्रतिपादिता | Prof. Wilson has translated it as "He (Agni), Who is the maker pervades all worlds". Griffith's translation is “He (Agni) who made all that lives.” Obviously, this material fire can not be generated by men. It is gratifying to note that even Shri Sayanacharya has interpreted देवेषु here as देवनशीलेषु स्तोतृषु = Worshippers.
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