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ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 61/ मन्त्र 5
    ऋषिः - गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा देवता - उषाः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अच्छा॑ वो दे॒वीमु॒षसं॑ विभा॒तीं प्र वो॑ भरध्वं॒ नम॑सा सुवृ॒क्तिम्। ऊ॒र्ध्वं म॑धु॒धा दि॒वि पाजो॑ अश्रे॒त्प्र रो॑च॒ना रु॑रुचे र॒ण्वसं॑दृक्॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अच्छ॑ । वः॒ । दे॒वीम् । उ॒षस॑म् । वि॒ऽभा॒तीम् । प्र । वः॒ । भ॒र॒ध्व॒म् । नम॑सा । सु॒ऽवृ॒क्तिम् । ऊ॒र्ध्वम् । म॒धु॒धा । दि॒वि । पाजः॑ । अ॒श्रे॒त् । प्र । रो॒च॒ना । रु॒रु॒चे॒ । र॒ण्वऽस॑न्दृक् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अच्छा वो देवीमुषसं विभातीं प्र वो भरध्वं नमसा सुवृक्तिम्। ऊर्ध्वं मधुधा दिवि पाजो अश्रेत्प्र रोचना रुरुचे रण्वसंदृक्॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अच्छ। वः। देवीम्। उषसम्। विऽभातीम्। प्र। वः। भरध्वम्। नमसा। सुऽवृक्तिम्। ऊर्ध्वम्। मधुधा। दिवि। पाजः। अश्रेत्। प्र। रोचना। रुरुचे। रण्वऽसन्दृक्॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 61; मन्त्र » 5
    अष्टक » 3; अध्याय » 4; वर्ग » 8; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह।

    अन्वयः

    हे मनुष्या या रण्वसन्दृग्रोचना मधुधा दिवि वो युष्मान् प्र रुरुचे। यया वो युष्माकमूर्ध्वं पाजोऽश्रेत् तां देवीं युष्मान् विभातीं सुवृक्तिमुषसं नमसा यूयमच्छ प्र भरध्वम् ॥५॥

    पदार्थः

    (अच्छ) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (वः) युष्मान् (देवीम्) देदीप्यमानाम् (उषसम्) प्रातर्वेलाम् (विभातीम्) विविधान् पदार्थान् प्रकाशयन्तीम् (प्र) (वः) युष्माकम् (भरध्वम्) (नमसा) वज्रेण विद्युता सह (सुवृक्तिम्) सुष्ठु वर्त्तमानाम् (ऊर्ध्वम्) उत्कृष्टम् (मधुधा) या मधूनि दधाति (दिवि) प्रकाशे (पाजः) बलम् (अश्रेत्) श्रयति (प्र) (रोचना) रुचिकरी (रुरुचे) रोचते (रण्वसंदृक्) या रण्वान्ररमणीयान्पदार्थान् सन्दर्शयति सा ॥५॥

    भावार्थः

    यथा प्रातर्वेलां सेवमाना जना उत्कृष्टं बलं प्राप्नुवन्ति तथैव हृद्यां पतिव्रतां भार्यां प्राप्य पुरुषः शरीरात्मबलाऽऽरोग्यानि प्राप्नोति यतो द्वयोः सदृशयोः सत्योर्रुचिर्वर्धेत ॥५॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! जो (रण्वसन्दृक्) सुन्दर पदार्थों के दिखाने (रोचना) रुचि करने और (मधुधा) मधुर पदार्थों को धारण करनेवाली (दिवि) प्रकाश में (वः) आप लोगों को (प्र, रुरुचे) अच्छी लगती है और जिससे (वः) आप लोगों के (ऊर्ध्वम्) उत्तम (पाजः) बल का (अश्रेत्) श्रवण करती है, उस (देवीम्) प्रकाशमान और आप लोगों और (विभातीम्) अनेक पदार्थों को प्रकाशित करती हुई (सुवृक्तिम्) उत्तम प्रकार वर्त्तमान (उषसम्) प्रभातवेला को (नमसा) वज्र अर्थात् बिजुली के साथ आप लोग (अच्छ) उत्तम प्रकार (प्र, भरध्वम्) पुष्ट कीजिये ॥५॥

    भावार्थ

    जैसे प्रातःकाल को सेवन करते हुए लोग उत्तम बल को प्राप्त होते हैं, वैसे ही स्नेहपात्र पतिव्रता स्त्री को प्राप्त होकर पुरुष शरीर आत्मबल और आरोग्यपन को प्राप्त होते हैं, जिससे दोनों के सदृश होने पर प्रेम बढ़ै ॥५॥

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    विषय

    'मधुधा' उषा

    पदार्थ

    [१] (वः अच्छा विभातीम्) = तुम्हारा लक्ष्य करके प्रकाश को करती हुई (उषसं देवीम्) = प्रकाशमय उषा के प्रति (नमसा) = नमन के साथ (वः सुवृक्तिम्) = अपनी उत्तम पापवर्जनरूप स्तुति को (प्रभरध्वम्) = प्रकर्षेण भरण करनेवाले बनो। उषाकाल में नम्रतापूर्वक प्रभुस्तवन करना आवश्यक है-उस समय प्रभु से पाप-परित्याग की शक्ति की याचना करनी चाहिए। हमारी यही प्रार्थना हो कि हम दिनभर के कार्यों में यथासम्भव पाप से ऊपर ही उठे रहें। [२] यह (मधुधा) = माधुर्य का धारण करनेवाली उषा (दिवि) = द्युलोक में (ऊर्ध्वं पाजः अश्रेत्) = उत्कृष्ट शक्ति का आश्रय करती है। द्युलोक मस्तिष्क है, यह उषा मस्तिष्क में ज्ञान के आधार में उत्कृष्ट शक्ति को स्थापित करती है। यह (रण्वसंदृक्) = रमणीय दर्शनवाली उषा (रोचना) = सब लोकों को (प्ररुरुचे) = अपने तेज से प्रकर्षेण दीप्त करती है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- उषाकाल में हम नम्रतापूर्वक पापवर्जन के संकल्प द्वारा प्रभु का स्तवन करें। यह उषा हमें ज्ञान व उत्कृष्ट शक्ति प्राप्त कराती है ।

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    विषय

    उषावत् स्त्री के उत्तम गुण और कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    (मधुधा दिविपाजः अश्रेत्) जिस प्रकार ‘मधु’ आदित्य को धारण करने वाली उषा आकाश में तेज को धारण करती है और जिस प्रकार वह (रण्वसंदृक्) रम्यदर्शना, (रोचना रुरुचे) प्रकाशवती होकर चमकती है उसी प्रकार (मधुधा) पति के निमित्त मधुपर्क को लाती हुई, मधुर वचनों और मधुर रूप, गुण, स्वभाव को धारण करती हुई वा मधु अर्थात् उत्तम अन्न जल को (अश्रेत्) धारण करे और परिपक्व करे (दिवि) अपनी कामना के योग्य पति के आश्रय रहकर (ऊर्ध्वं) सबसे ऊपर (रण्वसंदृक्) रमणीय, सम्यक् दृष्टि, सौम्यलोचना होकर (रोचना) सबके हृदय को अच्छी लगती हुई (रुरुचे) सबके मनोनुकूल वर्त्ते। हे विद्वान् पुरुषो ! (वः) आप लोगों के बीच में ऐसी (देवीं) दिव्य गुणों से युक्त (उषसं) पति की कामना करने वाली (सुवृक्तिम्) उत्तम रीति से दुर्गुणों से वचने वाली (विभातीं) विशेष रूप से गुणों से चमकने वाली कन्या वा स्त्री को (वः) आप लोग (अच्छ) सबके समक्ष (नमसा) आदर सत्कार और अन्नादि से (प्र भरध्वम्) खूब पुष्ट, पूर्ण करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः॥ उषा देवता॥ छन्द:- १, ५, ७ त्रिष्टुप्। २ विराट् त्रिष्टुप। ६ निचृत्त्रिष्टुप्। ३, ४ भुरिक् पङ्क्तिः॥ सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    मन्त्रार्थ

    (वः-अच्छा) हे जनो! तुम्हें अभिप्राप्त-सम्मुख प्राप्त (देवीम्-उषसम्) दिव्य उषा को या नव वधू को तथा (वः-विभातीम्) तुम्हें विशेष प्रकाश देती हुई या तुम्हें वेश वृद्धि में प्रसिद्ध करती हुई (सुवृक्तिम्) सुप्रवृत्ति सुन्दर प्रवृति जिसकी देखने सेवन करनेरूप प्रवर्त्तन में अच्छी है-उस प्रातः ज्योति को या सुन्दर व्यवहार वाली "सुवृक्तिभिः सुप्रवृत्तिभिः" (निरु० २।२४) नव वधू को भाव से धारण करो । (मधुधा) (नमसा प्रभरध्वम्) स्वागत वह प्राणधारिका “प्राणो वै मधु (शत० १४।१।३।३०) (दिवि-ऊर्ध्व पाजः-अत्) आकाश में उत्कृष्ट तेजोरूप बल को प्राप्त है या पारिवारिक यश में उत्कृष्ट यशोबल को प्राप्त करती है (रण्वसन्हकू-रोचना प्ररुरुचे) प्रकटितदर्शिका + रोचमाना या रुचिकरा भली भाँति अच्छी लगती है ॥५॥

    विशेष

    ऋषिः-विश्वामित्रः (सर्वमित्र-"विश्वामित्रः-सर्वमित्रः") (निरु० २।२५ विद्यासूर्यविद्वान्—नवस्नातक) देवता- उषाः (प्रातस्तनी प्रत्यग्रप्रकाशप्रभा एवं नवस्नातक की प्रत्यग्रज्ञान ज्योतिष्मती नववधू)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसे प्रातःकाळी लोक उत्तम बल प्राप्त करतात तसे हृद्य पतिव्रता स्त्री मिळाल्यामुळे पुरुष आत्मबल व आरोग्य प्राप्त करतो. दोघेही सारखेच असल्यामुळे प्रेम वाढते. ॥ ५ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Come ye celebrants, bear and bring songs of praise with offers of homage to the dawn over there, radiant and inspiring queen of light. Up there in high heaven she holds the nectar sweets and splendour of life, glorious, sublime, and blissful to the sight of mortals.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The subject of women is further highlighted.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    Offer due praise to the divine (radiant) Ushas, shining upon you. It is the repository of sweetness, manifests her brightness aloft in the sky, is radiant and lovely, and brightens the regions. Make proper use of electricity at the time of the dawn and on other occasions. Ushas enables us to see the charming objects.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As the persons who get up early in the morning before the advent of the dawn, get good health and strength, in the same manner, a man attains the physical and spiritual power and health by marrying lovely and chaste wife. Because of it, the love may ever increase on account of likeness and suitability.

    Foot Notes

    (सुवृक्तिम्) सुष्ठु वर्त्तमानाम् । नम इति वज्रनाम (NG 2, 20) = Existing well. (रणवसंदृक् ) या रण्वान् रमणीयान्पदार्थान् सन्दर्शयति सा । = She who enables to see charming objects. (नमसा ) वज्रेण विद्युता सह । = With the proper use of electricity.

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