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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 15/ मन्त्र 7
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - सोमकः साहदेव्यः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    बोध॒द्यन्मा॒ हरि॑भ्यां कुमा॒रः सा॑हदे॒व्यः। अच्छा॒ न हू॒त उद॑रम् ॥७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    बोध॑त् । यत् । मा॒ । हरि॑ऽभ्याम् । कु॒मा॒रः । सा॒ह॒ऽदे॒व्यः । अच्छ॑ । न । हू॒तः । उत् । अ॒र॒म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    बोधद्यन्मा हरिभ्यां कुमारः साहदेव्यः। अच्छा न हूत उदरम् ॥७॥

    स्वर रहित पद पाठ

    बोधत्। यत्। मा। हरिऽभ्याम्। कुमारः। साहऽदेव्यः। अच्छ। न। हूतः। उत्। अरम् ॥७॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 15; मन्त्र » 7
    अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 16; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथाध्यापकविषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे अध्यापक ! यत्साहदेव्यः कुमारोऽहं हूतस्सन्नरं न विजानीयां तं मा हरिभ्यामिवाच्छोद्बोधत् ॥७॥

    पदार्थः

    (बोधत्) बोधय (यत्) यः (मा) माम् (हरिभ्याम्) अश्वाभ्यामिव पठनाभ्यासाभ्याम् (कुमारः) ब्रह्मचारी (साहदेव्यः) ये देवैः सह वर्त्तन्ते तत्र भवेषु साधुः (अच्छ) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (न) (हूतः) प्रशंसितः (उत्) (अरम्) अलम् ॥७॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यदा कुमाराः कुमार्य्यश्च मातापितृभ्यां शिक्षां प्राप्ता आचार्य्यकुलं गच्छेयुस्तदाऽऽचार्य्यस्य प्रियाचरणेन विनयेन तं प्रार्थ्यं विद्या याचनीया य एवं कुर्यात् स उत्तमाभ्यां हरिभ्यां युक्तेन रथेनेव विद्यापारं गच्छेत् ॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    अब अध्यापक विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥७॥

    पदार्थ

    हे अध्यापक ! (यत्) जो (साहदेव्यः) जो विद्वानों के साथ वर्त्तमान उनमें श्रेष्ठ (कुमारः) ब्रह्मचारी मैं (हूतः) प्रशंसित होता हुआ (अरम्) पूर्ण (न) न जानूँ उस (मा) मुझको (हरिभ्याम्) घोड़ों के सदृश (अच्छ) अच्छे प्रकार (उत्, बोधत्) उत्तम बोध दीजिये ॥७॥

    भावार्थ

    जब कुमार और कुमारियाँ माता और पिता से शिक्षा को प्राप्त हुए आचार्य के कुल को जावें, तब आचार्य के प्रिय आचरण और विनय से उसकी प्रार्थना करके विद्या की याचना करें, जो ऐसा करे, वह श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त रथ से जैसे वैसे विद्या के पार को जावे ॥७॥

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    विषय

    कुमार साहदेव्य

    पदार्थ

    [१] गतमन्त्र के अनुसार प्रभु के उपासन से वासनाओं को विनष्ट करनेवाला व्यक्ति 'कुमार' है, 'कु', अर्थात् बुराई को 'मार' समाप्त करनेवाला । यह 'साहदेव्य' है, दिव्य गुणों के साथ होनेवालों में उत्तम । यह (कुमारः साहदेव्यः) = कुमार साहदेव्य (यत्) = जब (मा) = मुझे [प्रभु को] (हरिभ्याम्) = अपने इन्द्रियाश्वों के द्वारा (बोधत्) = जानता है । इन्द्रियों को विषयों से व्यावृत्त करके यह कुमार प्रभु को देखने का प्रयत्न करता है 'कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षद् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्'। उस समय (अच्छा हूतः) = अपने अभिमुख उस कुमार से पुकारा गया मैं (न उत् अरम्) = बाहर नहीं जाता। प्रभु इस कुमार के हृदय में निवास करते हैं। [२] हम [क] कुमार बनें, बुराइयों को मारनेवाले। [ख] साहदेव्य बनें दिव्यगुणों के साथ अपने जीवन को बनानेवाले। [ग] आवृत्तचक्षु होकर प्रभु को देखने का प्रयत्न करें। [घ] प्रभु को अपने अभिमुख पुकारनेवाले हों, प्रभुप्राप्ति की प्रबल कामनावाले हों। ऐसा होने पर अवश्य हमारे हृदयों में प्रभु का निवास होगा।

    भावार्थ

    भावार्थ- बुराइयों को नष्ट करनेवाले, दिव्य गुणों को उत्पन्न करनेवाले बनकर हम प्रभु के दर्शन कर पायें।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जेव्हा कुमार व कुमारिका माता - पिता यांच्याकडून शिक्षण प्राप्त करून आचार्यकुलामध्ये जातात तेव्हा आचार्यांशी प्रिय वर्तन करून विनयाने त्यांची प्रार्थना करून विद्येची याचना करावी. जसे प्रशिक्षित घोडे रथ ओढतात तसे ते विद्या प्राप्त करतील. ॥ ७ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Neither well informed nor inspired nor fully prepared as I am, may the youthful Agni, companion power of divinity, awaken and inform me by the gifts of Ashvins, light and knowledge of the teacher and the preacher, breath and beauty of nature and the light and fragrance of yajna.

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