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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 15/ मन्त्र 8
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - सोमकः साहदेव्यः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    उ॒त त्या य॑ज॒ता हरी॑ कुमा॒रात्सा॑हदे॒व्यात्। प्रय॑ता स॒द्य आ द॑दे ॥८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त । त्या । य॒ज॒ता । हरी॒ इति॑ । कु॒मा॒रात् । सा॒ह॒दे॒व्यात् । प्रऽय॑ता । स॒द्यः । आ । द॒दे॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत त्या यजता हरी कुमारात्साहदेव्यात्। प्रयता सद्य आ ददे ॥८॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत। त्या। यजता। हरी इति। कुमारात्। साहऽदेव्यात्। प्रऽयता। सद्यः। आ। ददे ॥८॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 15; मन्त्र » 8
    अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 16; मन्त्र » 3
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथाध्येतृविषयमाह ॥

    अन्वयः

    त्या यजता हरी प्रयताध्यापकोपदेशकौ साहदेव्यात्कुमारात् प्रतिज्ञां गृह्णीयातामुतापि ताभ्यां कुमारो विद्याः सद्य आददे ॥८॥

    पदार्थः

    (उत) (त्या) तौ (यजता) दातारावध्यापकोपदेशकौ (हरी) अविद्याया हर्त्तारौ (कुमारात्) ब्रह्मचारिणः (साहदेव्यात्) (प्रयता) प्रयतमानौ (सद्यः) (आ) (ददे) गृह्णीयात् ॥८॥

    भावार्थः

    यदा विद्यार्थिनो विद्यार्थिन्यश्चाऽध्ययनाय गच्छेयुस्तदा तैः प्रतिज्ञा कार्य्या वयं धर्म्येण ब्रह्मचर्य्येण भवदानुकूल्येन वर्त्तित्त्वा विद्याभ्यासं करिष्यामो मध्ये ब्रह्मचर्य्यव्रतं न लोप्स्याम इति अध्यापकाश्च वयं प्रीत्या निष्कपटतया विद्यां दास्याम इति च ॥८॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    अब अध्येतृविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    (त्या) वे दोनों (यजता) देने और (हरी) अविद्या के हरनेवाले (प्रयता) प्रयत्न करते हुए अध्यापकोपदेशक (साहदेव्यात्) विद्वानों के साथ रहनेवालों में उत्तम (कुमारात्) ब्रह्मचारी से प्रतिज्ञा को ग्रहण करें (उत) और उन दोनों से ब्रह्मचारी विद्या (सद्यः) शीघ्र (आ, ददे) ग्रहण करे ॥८॥

    भावार्थ

    जब विद्यार्थी और विद्यार्थिनी पढ़ने के लिये जावें, तब उनको चाहिये कि प्रतिज्ञा करें कि हम लोग धर्म्मयुक्त ब्रह्मचर्य्य से आपके अनुकूल वर्त्ताव करके विद्या का अभ्यास करेंगे और मध्य में ब्रह्मचर्य्य व्रत का न लोप करेंगे और अध्यापक लोग यह प्रतिज्ञा करें कि हम निष्कपटता से विद्यादान करेंगे ॥८॥

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    विषय

    'पयजता प्रयता' हरी

    पदार्थ

    [१] प्रभु कहते हैं कि मैं इस (कुमारात्) = बुराइयों को समाप्त करनेवाले (साहदेव्यात्) = दिव्य गुणों से युक्त उपासक के हेतु से (त्वा) = उन (यजता) = यज्ञों के करनेवाले (प्रयता) = पवित्र (हरी) = इन्द्रियाश्वों को (उत) = निश्चय से (सद्यः) = शीघ्र ही (आददे) = प्राप्त करता हूँ। [२] प्रभु इस कुमार साहदेव्य को उन इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराते हैं जो कि यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त रहते हैं तथा ज्ञानाग्नि में तपकर सदा पवित्र बने रहते हैं। कर्मेन्द्रियाँ यज्ञों में लगी रहती हैं तो ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति का साधन बनी रहकर पवित्र बनी रहती हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु हमें वे इन्द्रियाँ प्राप्त कराते हैं जो कि यज्ञादि कर्मों में व ज्ञान प्राप्ति में लगी रहती हैं।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जेव्हा विद्यार्थी व विद्यार्थिनी शिकण्यासाठी जातात तेव्हा त्यांनी प्रतिज्ञा करावी की, आम्ही धर्मयुक्त ब्रह्मचर्यपूर्वक तुमच्या अनुकूल वर्तन करून विद्येचा अभ्यास करू. मधेच ब्रह्मचर्याचा भंग करणार नाही व अध्यापकांनीही प्रतिज्ञा करावी की आम्ही निष्कपटीपणाने विद्यादान करू. ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    I readily accept the breath and beauty of nature and the light and fragrance of yajna, gifts of the Ashvins, teachers and preachers, adorable messengers of life coming from Agni, youthful brilliance of Divinity.

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