ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 26/ मन्त्र 5
ऋषिः - वामदेवो गौतमः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - विराट्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
भर॒द्यदि॒ विरतो॒ वेवि॑जानः प॒थोरुणा॒ मनो॑जवा असर्जि। तूयं॑ ययौ॒ मधु॑ना सो॒म्येनो॒त श्रवो॑ विविदे श्ये॒नो अत्र॑ ॥५॥
स्वर सहित पद पाठभर॑त् । यदि॑ । विः । अतः॑ । वेवि॑जानः । प॒था । उ॒रुणा॑ । मनः॑ऽजवाः । अ॒स॒र्जि॒ । तूय॑म् । य॒यौ॒ । मधु॑ना । सो॒म्येन॑ । उ॒त । श्रवः॑ । वि॒वि॒दे॒ । श्ये॒नः । अत्र॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
भरद्यदि विरतो वेविजानः पथोरुणा मनोजवा असर्जि। तूयं ययौ मधुना सोम्येनोत श्रवो विविदे श्येनो अत्र ॥५॥
स्वर रहित पद पाठभरत्। यदि। विः। अतः। वेविजानः। पथा। उरुणा। मनःऽजवाः। असर्जि। तूयम्। ययौ। मधुना। सोम्येन। उत। श्रवः। विविदे। श्येनः। अत्र ॥५॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 26; मन्त्र » 5
अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 15; मन्त्र » 5
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अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 15; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे राजपुरुषा ! यद्यत्र भवद्भिर्मनोजवाः सेना असर्जि तर्ह्यतो यथा श्येनो विर्वेविजानः सन्नुरुणा पथा तूयं ययौ तथा यो राजा मधुना सोम्येन श्रवोऽन्नमुत सेनां भरत् स विजयं विविदे ॥५॥
पदार्थः
(भरत्) पुष्यात् (यदि) (विः) पक्षी (अतः) अस्मात् स्थानात् (वेविजानः) कम्पमानः (पथा) मार्गेण (उरुणा) बहुना (मनोजवाः) मनोवद्वेगाः (असर्जि) सृजति (तूयम्) तूर्णम् (ययौ) याति गच्छति (मधुना) मधुरेण (सोम्येन) सोमेष्वोषधीषु भवेन (उत) अपि (श्रवः) अन्नादिकम् (विविदे) विन्दति (श्येनः) हिंस्रो वेगवान् पक्षी (अत्र) अस्मिन् संसारे ॥५॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे राजजना ! भवन्तो यावच्छ्येनवद्वेगवतीं सेनां न कुर्वन्ति तावद्विजयधनलाभो भवितुमशक्यः ॥५॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे राजजनो ! (यदि) जो (अत्र) इस संसार में आप लोगों से (मनोजवाः) मन के सदृश वेगयुक्त सेनाओं को (असर्जि) बनाता है तो (अतः) इस स्थान से जैसे (श्येनः) हिंसा करनेवाला वेगयुक्त (विः) पक्षी (वेविजानः) कम्पता हुआ (उरुणा) बहुत (पथा) मार्ग से (तूयम्) शीघ्र (ययौ) जाता है, वैसे जो राजा (मधुना) मधुर (सोम्येन) सोम अर्थात् ओषधियों में उत्पन्न हुए रस से (श्रवः) अन्न आदि को (उत) और सेना को (भरत्) पुष्ट करे, वह विजय को (विविदे) प्राप्त होता है ॥५॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजजनो ! आप लोग जब तक वाजपक्षी के सदृश वेग युक्त सेना को नहीं करते हैं, तब तक विजय से धन का लाभ नहीं हो सकता है ॥५॥
विषय
मधुरता व ज्ञान
पदार्थ
[१] गतमन्त्र में जीव को भी 'वि' कहा है। यदि यह प्रकृष्ट बलवाले प्रभु से भयभीत होता हुआ वासनाओं से बचता है और सोम का रक्षण करता है, तो यह अपने अन्दर प्रभु के प्रकाश को देखनेवाला बनता है। (यदि) = यदि (विः) = जीव (अतः) = इस सर्वाधिक बलवाले प्रभु से (वेविजान:) = भय करता हुआ (भरत्) = अपने अन्दर सोम का रक्षण करता है, तो (उरुणा पथा) = विशाल मार्ग से गति द्वारा (मनोजवा:) = मन से भी अधिक वेगवान् वे प्रभु (असर्जि) = इसके साथ संसृष्ट होते हैं। सोमरक्षण द्वारा पवित्र मनवाला बनकर यह विशाल मार्ग से चलता है। इस उदार मार्ग का आक्रमण करता हुआ यह प्रभु को देखनेवाला बनता है। [२] यह (सोम्येन) = सोमरक्षण से उत्पन्न (मधुना) = माधुर्य के साथ (तूयं ययौ) = शीघ्रता से गतिवाला होता है। (उत) = और (श्येन:) = यह गतिशील जीव (अत्र) = इस जीवन में (श्रवः) = ज्ञान को (विविदे) = प्राप्त करता है। 'सोम' सुरक्षित होने पर, इसके जीवन को मधुर बनाता है और इसे गतिमय जीवनवाला बनाता हुआ ज्ञान सम्पन्न करता है।
भावार्थ
भावार्थ– सोमरक्षण से ही प्रभु के साथ मेल होता है। इसी प्रकार जीवन मधुर व ज्ञान सम्पन्न होता है।
विषय
श्येन, विद्वान्वत् आत्मतत्व का वर्णन ।
भावार्थ
(यदि) जिस प्रकार (विः श्येनः) वेग से युक्त पक्षी बाज, (अतः वेविजानः) इस पृथिवी लोक से पक्षों को कंपाता हुआ (हरत्) वेग से गमन करता है और (उरुणा पथा मनोजवाः असर्जि) बड़े भारी आकाश-मार्ग से मन के समान वेगवान् हो जाता है और (तूयं ययौ) बहुत शीघ्र ही चला जाता है और (श्रवः विविदे) ख्याति प्राप्त करता या श्रवण योग्य शब्द उत्पन्न करता है उसी प्रकार (यदि) जब (श्येनः) ज्ञानवान् पुरुष (विः) तेजस्वी, वा (विः) संसार के सुखों का भोक्ता होकर (वेविजानः) उद्विग्न होकर उनको कंपादे, फाड़दे, अवधूत, असंग हो जावे वा (विरतः) विषयों से विरत हो जावे और (उरुणा पथा) महान् ज्ञानमार्ग से (भरत्) गति करे तब वह (मनोजवाः असर्जि) मन से ही यथा संकल्पित लोकों को जाने में समर्थ हो जाता है । वह (सोम्येन मधुना) परमानन्द सुख देने वाले मधुर ज्ञान द्वारा (तूयं ययौ) शीघ्र ही उस पद तक पहुंचता है। वह (श्येनः) उत्तम गति प्राप्त करके (अत्र) वहां (श्रवः) श्रवण योग्य परम ज्ञानमय ब्रह्म को प्राप्त करता है । (३) राजा के पक्ष में—(वे विजानः) स्व और पर दोनों पक्षों को कंपाता हुआ पक्षी के समान जब जाता है तब वह मनोवेग से जाने वाली सेनाओं को पैदा करे । (सोम्येन मधुना) ऐश्वर्य प्राप्त करने योग्य सैन्यबल वा ओषध्यादि से युक्त अन्नादि सहित वेग से आगे बढ़े। (अत्र) इस लोक में (श्रवः विविदे) यश और ऐश्वर्य प्राप्त करे । और (श्येनः) प्रशंसनीय आचरण वाला प्रसिद्ध हो ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः- १ पंक्तिः। २ भुरिक् पंक्तिः। ३, ७ स्वराट् पंक्तिः। ४ निचत्त्रिष्टुप। ५ स्वराट् त्रिष्टुप्। ६ त्रिष्टुप॥ सप्तर्चं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे राजजनांनो, तुम्ही लोक जोपर्यंत बाजपक्ष्याप्रमाणे वेगयुक्त सेना तयार करीत नाहीत, तोपर्यंत विजय प्राप्त करून धनाचा लाभ घेऊ शकत नाही. ॥ ५ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
When the bird of the wings of light, vibrating as sunrays, flying fast as thought by the wide paths of space brings and releases food and energy here, and then from here itself flies back fast with earthly, sweets of soma juices (to bring them back, reinvigorated), thus this eagle wins thanks and praise from earthly humanity.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The role and functions of the state army are mentioned.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O Officers of the State ! if you build a mind-like swift and impetuous army, and the king who mixes sweet of Soma and other herbs with food, and supplies that to the men of the army, he achieves victory over his foes. The enemy flees away from him in fear like the trembling birds.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O officers of the state ! unless and until you build an army swift like the hawk, you can not achieve the victory or acquire wealth.
Foot Notes
(वेविजानः) कम्पमानः । = Trembling. (तूयम् ) तूर्णम् । तूयम् इति क्षत्रनाम (NG 2, 15)। = Soon, swiftly. (श्रवः) अन्नादिकम् । = Food and other things.
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