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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 26 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 26/ मन्त्र 6
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्र: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    ऋ॒जी॒पी श्ये॒नो दद॑मानो अं॒शुं प॑रा॒वतः॑ शकु॒नो म॒न्द्रं मद॑म्। सोमं॑ भरद्दादृहा॒णो दे॒वावा॑न्दि॒वो अ॒मुष्मा॒दुत्त॑रादा॒दाय॑ ॥६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऋ॒जी॒पी । श्ये॒नः । दद॑मानः । अं॒शुम् । प॒रा॒ऽवतः॑ । श॒कु॒नः । म॒न्द्रम् । मद॑म् । सोम॑म् । भ॒र॒त् । द॒दृ॒हा॒णः । दे॒वऽवा॑न् । दि॒वः । अ॒मुष्मा॑त् । उत्ऽता॑रात् । आ॒ऽदाय॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऋजीपी श्येनो ददमानो अंशुं परावतः शकुनो मन्द्रं मदम्। सोमं भरद्दादृहाणो देवावान्दिवो अमुष्मादुत्तरादादाय ॥६॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ऋजीपी। श्येनः। ददमानः। अंशुम्। पराऽवतः। शकुनः। मन्द्रम्। मदम्। सोमम्। भरत्। ददृहाणः। देवऽवान्। दिवः। अमुष्मात्। उत्ऽतरात्। आऽदाय ॥६॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 26; मन्त्र » 6
    अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 15; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे राजन् ! यथर्जीपी श्येनः शकुनः परावतो देशात् पतित्वा स्वाभीष्टं पदार्थं भरत् तथैव भवानंशुं मदं मन्द्रं सोमं ददमानो देवावानमुष्मादुत्तराद् दिवो विद्यामादाय दादृहाणो भवेत् ॥६॥

    पदार्थः

    (ऋजीपी) सरलगामी (श्येनः) प्रवृद्धवेगः (ददमानः) (अंशुम्) विज्ञानादिकं पदार्थम् (परावतः) दूरदेशात् (शकुनः) पक्षी (मन्द्रम्) प्रशंसनीयम् (मदम्) आनन्दकरम् (सोमम्) ऐश्वर्य्यम् (भरत्) धरति (दादृहाणः) वर्धमानः (देवावान्) बहवो देवा विद्वांसो विद्यन्ते यस्य सः (दिवः) विद्युत्प्रकाशात् (अमुष्मात्) परोक्षात् (उत्तरात्) (आदाय) ॥६॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! यथा पक्षिणो भूमेरुत्थायाऽन्तरिक्षमार्गेण गत्वाऽऽगत्य स्वप्रयोजनं साध्नुवन्ति तथैव देशदेशान्तरं विमानादिना गत्वा स्वप्रयोजनं साध्नुवन्तु ॥६॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे राजन् ! जैसे (ऋजीपी) सीधी चालवाला (श्येनः) बढ़े हुए वेग से युक्त (शकुनः) पक्षी (परावतः) दूर देश से गिर के अपने अपेक्षित पदार्थ को (भरत्) धारण करता है, वैसे ही आप (अंशुम्) विज्ञान आदि पदार्थ (मदम्) आनन्द करनेवाले (मन्द्रम्) प्रशंसा करने योग्य (सोमम्) ऐश्वर्य्य को (ददमानः) देते हुए (देवावान्) बहुत विद्वानों से युक्त (अमुष्मात्) परोक्ष (उत्तरात्) आनेवाले (दिवः) बिजुली के प्रकाश से विद्या को (आदाय) ग्रहण करके (दादृहाणः) बढ़ते हुए होवें ॥६॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे पक्षी पृथिवी से उड़ के अन्तरिक्ष के मार्ग से जाकर और आकर अपने प्रयोजन को सिद्ध करते हैं, वैसे ही देश-देशान्तर में विमान आदि से जाकर अपने प्रयोजन को सिद्ध करो ॥६॥

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    विषय

    दागृहाणो देवावान्

    पदार्थ

    [१] (ऋजीपी) = [ऋजु, प्यायी वृद्धौ] ऋजुता से मार्ग पर आगे बढ़नेवाला (श्येनः) = शंसनीय गतिवाला जीव (परावतः) = उस दूर से दूर वर्तमान 'सर्वोत्कृष्ट' प्रभु से (अंशुम्) = प्रकाश की किरण को (ददमान:) = ग्रहण करता हुआ [धारयन् सा०] (शकुन:) = शक्तिशाली बनता है और (मन्द्रम्) = स्तुत्य (मदम्) = हर्ष के जनक (सोमम्) = सोम को (भरत्) = अपने में धारण करता है। प्रभु से प्राप्त ज्ञान हमें वासनाओं से बचाता है। वासनाओं से बचकर हम शक्तिशाली बनते हैं और सोम के महत्त्व को समझते हुए उसे सुरक्षित रखते हैं। [२] यह सोम का भरण करनेवाला पुरुष (अमुष्माद्) = उस (उत्तरात्) = उत्कृष्ट (दिवः) = प्रकाशमय प्रभु से (आदाय) = ज्ञान को [प्रकाश को] प्राप्त करके (दादृहाण:) = खूब ही दृढ़ शरीरवाला तथा (देवावान्) = दिव्य गुणोंवाला बनता है। प्रभुप्रदत्त ज्ञान इसे दृढ़ शरीरवाला व दिव्यवृत्तिवाला बनाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोम को धारण करनेवाला व्यक्ति दृढ़ शरीरवाला तथा दिव्य गुणोंवाला बनता है।

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    विषय

    धर्मात्माओं का उन्नति पथ ।

    भावार्थ

    जिस प्रकार (ऋजीपी श्येनः शकुनिः अंशुं ददमानः मन्द्रं मदं सोमम् भरत्) सीधी गति से जाने वाला श्येन नाम पक्षी वेग को धारण करता हुआ अतिस्तुत्य मद और वीर्य को धारण करता है। उसी प्रकार (ऋजीपी) सरल, धर्म के मार्ग से जाने वाला (श्येनः) उत्तम आचारणवान् ज्ञानी पुरुष (परावतः) उस परम पद पर स्थित प्रभु (अंशुं ददमानः) उत्तम ज्ञान के प्रकाश को स्वयं धारण करता और अन्यों को प्रदान करता हुआ (शकुनः) अपने को उन्नत पद पर पहुंचाने में समर्थ, शक्तिमान्, शान्तिमान्, शमदम का अभ्यासी पुरुष (मन्द्रं) अति आनन्दजनक, प्रशंसनीय (मदम्) हर्ष और (सोमं) ऐश्वर्य, विभूति, ज्ञान और वीर्य को (अमुष्मात्) उस (उत्तरात्) सबसे उत्कृष्ट परम प्रभु से (आदाय) प्राप्त करके (भरत्) धारण करता है और स्वयं (ददृहाणः) उत्तरोत्तर दृढ़ और (देववान्) किरणों से युक्त सूर्य के तुल्य तेजस्वी और ‘देव’ विद्वानों विद्या के इच्छुक शिष्यों और इन्द्रियों का भी स्वामी हो जाता है। (२) राष्ट्र में—न्याय के सरल मार्ग से जाने और राष्ट्र को पालन और उपभोग करने वाला राजा ‘ऋजीपी’ है, बाज के समान बलशाली होने से ‘श्येन’ है वह (परावर्तः अंशुं ददमानः) दूर देश से भी कर लेता हुआ ऐश्वर्यं धारण करे, अपने से उत्तम ज्ञानी विजीगीषु से सहाय लेकर अपने को दृढ़ और वीर योद्धाओं का स्वामी बनावे ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः- १ पंक्तिः। २ भुरिक् पंक्तिः। ३, ७ स्वराट् पंक्तिः। ४ निचत्त्रिष्टुप। ५ स्वराट् त्रिष्टुप्। ६ त्रिष्टुप॥ सप्तर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो! जसे पक्षी पृथ्वीवरून उडून अंतरिक्षात फिरतात तसे देशदेशांतरी विमानाने जाणे-येणे करून आपले प्रयोजन सिद्ध करा. ॥ ६ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    The eagle bird of light, enjoying the company of heavenly planets, coming from far off country by simple paths, having taken from that distant region of light sweet celestial delights of soma energies of life, gives us that nectar and, taking the soma sweets of earth grows stronger and more generous.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The subject of royal army goes on.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O king ! a speedy bird hawk going straight to a distant place in the sky brings its target hunt. Same manner, giving high scientific knowledge and joy-giving wealth and having many great scholars in your company, you bring some specialized knowledge from a distant place where is electric light (consumption of power is the yardstick of material progress of any state-Ed.).

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O men! as the birds go from earth to the sky and come back having accomplished their object, in the same manner, you should also go to distant lands travelling by aero planes and accomplish your purposes.

    Foot Notes

    (ऋजीपी) सरलगामी । = Going straight. (अंशुम् ) विज्ञानादिकं पदार्थम् (अंशुम) अंशुः शमष्टमात्रो भवति अननायथं भवतीति वा (NKT 2,2,5) अचोणोऽत्र अमनाम (जीवनाय ) शान्तिकारकत्वाद् विज्ञानादिग्रहणम् । = Scientific knowledge and other things. (सोमम् ) ऐश्वर्य्यम् । = Wealth. (दिवः) विद्युत्प्रकाशात् । = From the light of electricity.

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