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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 31 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 31/ मन्त्र 7
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    उ॒त स्मा॒ हि त्वामा॒हुरिन्म॒घवा॑नं शचीपते। दाता॑र॒मवि॑दीधयुम् ॥७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त । स्म॒ । हि । त्वाम् । आ॒हुः । इत् । म॒घऽवा॑नम् । श॒ची॒ऽप॒ते॒ । दाता॑रम् । अवि॑ऽदीधयुम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत स्मा हि त्वामाहुरिन्मघवानं शचीपते। दातारमविदीधयुम् ॥७॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत। स्म। हि। त्वाम्। आहुः। इत्। मघऽवानम्। शचीऽपते। दातारम्। अविऽदीधयुम् ॥७॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 31; मन्त्र » 7
    अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 25; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः प्रतिज्ञापालकराजप्रजाधर्मविषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे शचीपते राजन् ! हि त्वां मघवानमविदीधयुं दातारं स्म विद्वांस आहुरुतापि सेवेरनतस्तमिदेव वयमपि सेवेमहि ॥७॥

    पदार्थः

    (उत) अपि (स्मा) एव। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (हि) यतः (त्वाम्) (आहुः) कथयन्ति (इत्) एव (मघवानम्) परमपूजितबहुधनम् (शचीपते) वाचः प्रज्ञायाः पालक (दातारम्) (अविदीधयुम्) द्यूतादिदुष्टकर्म्मरहितम् ॥७॥

    भावार्थः

    हे विद्वांसो ! यदि यूयं धर्म्याणि कर्माण्याचरत तर्हि युष्मास्वैश्वर्यं दातृत्वं च कदाचिन्न हीयेत ॥७॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर प्रतिज्ञा पालनेवाले राजप्रजाधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (शचीपते) वाणी और बुद्धि के पालन करनेवाले राजन् ! (हि) जिससे (त्वाम्) आपको (मघवानम्) अत्यन्त श्रेष्ठ बहुत धनवाले (अविदीधयुम्) जुआ आदि दुष्ट कर्म्मों से रहित (दातारम्) देनेवाला (स्म) ही विद्वान् लोग (आहुः) कहते हैं (उत) और सेवा भी करें, इससे (इत्) उन्हीं को हम लोग भी सेवें ॥७॥

    भावार्थ

    हे विद्वानो ! जो आप लोग धर्म्मयुक्त कर्म्मों का आचरण करें तो आप लोगों में ऐश्वर्य्य और दानकर्म्म कभी न नष्ट होवें ॥७॥

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    विषय

    मघवा, दाता व दीधयु

    पदार्थ

    [१] हे (शचीपते) = सब कर्मों व प्रज्ञानों के स्वामिन् प्रभो ! (उत) = और (त्वां हि) = आपको ही (इत्) = निश्चय से (आहु स्म) = कहते हैं कि (मघवानम्) = आप ज्ञानैश्वर्यवाले हैं। सब ऐश्वर्यों के स्वामी आप ही हैं। (दातारम्) = सब धनों व वसुओं के आप ही देनेवाले हैं। (अविदीधयुम्) = आप कभी न दीप्यमान हों, सो नहीं है, अर्थात् आप सदा दीप्यमान हैं। [२] आपकी उपासना करता हुआ मैं भी ऐश्वर्यशाली बनूँ, दाता बनूँ और सदा दीप्त जीवनवाला होऊँ । ऐश्वर्यशाली होकर अकस्मात् उस ऐश्वर्य का संग्रही [न कि दाता] बनकर मैं ज्ञान दीप्ति को विनष्ट कर बैठता हूँ। भावार्थ- मैं प्रभु को 'मघवा, दाता व दीधयु' शब्दों से स्मरण करता हुआ ऐश्वर्यशाली

    भावार्थ

    [वैश्य] बनूँ, देनेवाला [क्षत्रिय] होऊँ और इस प्रकार ज्ञानदीप्त [ब्राह्मण] बन पाऊँ । यह धन मेरे ज्ञान पर परदे के रूप में न हो जाए।

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    विषय

    परमेश्वर और राजा से प्रार्थना । और राजा के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    (उत) और (हि) भी हे (शचीपते) प्रज्ञा कर्म शक्ति और सेना के पालक ! स्वामिन् ! राजन् ! विद्वन् ! आत्मन् ! (त्वाम्) तुझ को विद्वान् लोग (दातारम्) दानशील (मघवानम्) ऐश्वर्यवान् और (अविदीधयुम्) भूतादि में द्रव्यनाश न करने वाला ही (आहुः) बतलाते हैं । वैसा ही वे अन्यों को रहने का उपदेश करते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः। इन्द्रो देवता॥ छन्दः- १, ७, ८, ९, १०, १४ गायत्री। २, ६, १२, १३, १५ निचृद्गायत्री । ३ त्रिपाद्गायत्री । ४, ५ विराड्गायत्री । ११ पिपीलिकामध्या गायत्री ॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे विद्वानांनो, जर तुम्ही धर्मयुक्त कर्माचे आचरण केले, तर तुमचे ऐश्वर्य व दातृत्व कधी नष्ट होणार नाही. ॥ ७ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O lord of beauty and grace, power, intelligence and will, sages of vision and devotion celebrate you as lord of infinite honour and excellence in existence, boundless giver and self-refulgent beyond imagination.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    A ruler is told to be sincere to his subjects.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O ruler ! you are master of ideal speech and wisdom. The scholars and people of right conduct call you the master of great wealth. They have observed you free from gambling and a philanthropist, who serves and looks after their cause and welfare. Let us also follow the similar path.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Ọ scholars and learned people! when you ever observe the right conduct in performing righteous actions, you are, bound to grow in prosperity, and the common people will never forget to give away contribution for your maintenance.

    Foot Notes

    (मधवानम् ) परमपूजितबहुधनम् । = Master of ideal and sumptuous wealth. (शचीपते) वाचः प्रज्ञाया: पालक । = Master of ideal speech and wisdom. (अविदीधयुम् ) द्यूतादिदुष्ट कम्मरहितम् । = Free from vices like gambling etc.

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