ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 57/ मन्त्र 6
अ॒र्वाची॑ सुभगे भव॒ सीते॒ वन्दा॑महे त्वा। यथा॑ नः सु॒भगास॑सि॒ यथा॑ नः सु॒फलास॑सि ॥६॥
स्वर सहित पद पाठअ॒र्वाची॑ । सु॒ऽभ॒गे॒ । भ॒व॒ । सीते॑ । वन्दा॑महे । त्वा॒ । यथा॑ । नः॒ । सु॒ऽभगा॑ । अस॑सि । यथा॑ । नः॒ । सु॒फला॑ । अस॑सि ॥
स्वर रहित मन्त्र
अर्वाची सुभगे भव सीते वन्दामहे त्वा। यथा नः सुभगाससि यथा नः सुफलाससि ॥६॥
स्वर रहित पद पाठअर्वाची। सुऽभगे। भव। सीते। वन्दामहे। त्वा। यथा। नः। सुऽभगा। अससि। यथा। नः। सुऽफला। अससि ॥६॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 57; मन्त्र » 6
अष्टक » 3; अध्याय » 8; वर्ग » 9; मन्त्र » 6
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अष्टक » 3; अध्याय » 8; वर्ग » 9; मन्त्र » 6
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे सुभगे ! यथाऽर्वाची सीते सीतास्ति तथा त्वं भव यथा भूमिः सुभगास्ति तथा त्वं नोऽससि यथा भूमिः सुफलास्ति तथा त्वं नोऽससि, अतो वयं त्वा वन्दामहे ॥६॥
पदार्थः
(अर्वाची) याऽर्वागधोऽञ्चति (सुभगे) सुष्ठ्वैश्वर्य्यवर्द्धिके (भव) (सीते) हलादिकर्षणावयवायोनिर्मिता (वन्दामहे) कामयामहे (त्वा) त्वाम् (यथा) (नः) अस्माकम् (सुभगा) सौभाग्ययुक्ता (अससि) असि। अत्र बहुलं छन्दसीति शपो लुगभावः। (यथा) (नः) अस्माकम् (सुफला) शोभनानि फलानि यस्यां सा (अससि) ॥६॥
भावार्थः
अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। हे मनुष्या ! यथा सुष्ठु सम्पादिता क्षेत्रभूमिरुत्तमानि शस्यानि जनयति तथैव ब्रह्मचर्य्येण प्राप्तविद्यः सुसन्तानान् सूते यथा भूमिराज्यमैश्वर्य्यकरं वर्त्तते तथा परस्परं प्रीतौ स्त्रीपुरुषौ महैश्वर्य्यौ भवतः ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥६॥
पदार्थ
हे (सुभगे) उत्तम प्रकार ऐश्वर्य्य की बढ़ानेवाली (यथा) जैसे (अर्वाची) नीचे को चलनेवाली (सीते) हल आदि के खींचनेवाले अवयव लोहे से बनाई गयी सीता है, वैसे आप (भव) हूजिये और जैसे भूमि (सुभगा) सौभाग्य से युक्त है वैसे तू (नः) हम लोगों की (अससि) है और (यथा) जैसे भूमि (सुफला) उत्तम फलों से युक्त है, वैसे तू (नः) हम लोगों की (अससि) है, इससे हम लोग (त्वा) तेरी (वन्दामहे) कामना करते हैं ॥६॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जैसे उत्तम प्रकार सम्पादित खेत की धरती उत्तम अन्नों को उत्पन्न करती है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य से विद्या को प्राप्त हुआ जन उत्तम सन्तानों को उत्पन्न करता है और जैसे भूमि का राज्य ऐश्वर्य्यकारक है, वैसे परस्पर प्रसन्न स्त्री और पुरुष बड़े ऐश्वर्य्यवाले होते हैं ॥६॥
विषय
सीता
पदार्थ
[१] हे (सीते) = भूमिकर्षिके [द०] - हल की फाली! तू (अर्वाची भव) = [अर्वाक् अञ्चति] भूमि में पर्याप्त नीचे जानेवाली हो। कुछ गहरी ही भूमि खुदेगी तो उसकी उपजाऊ शक्ति बढ़ेगी, सूर्य की किरणों का अधिक भूभाग तक सम्पर्क होगा, यह सम्पर्क उसे उपजाऊ बनाएगा। हे (सुभगे) = उत्तम ऐश्वर्य की कारणभूत (सीते त्वा वन्दामहे) = तेरा हम स्तवन- गुणवर्णन करते हैं। इस स्तवन से तेरे महत्त्व को समझकर हम तेरा ठीक प्रयोग करते हैं। [२] यह हम इसलिए करते हैं कि (यथा) = जिससे तू (नः) = हमारे लिए (सुभगा) = उत्तम ऐश्वर्य को देनेवाली (अससि) = होती है, (यथा) = जिससे (नः) = हमारे लिये (सुफला) = उत्तम फलोंवाली (अससि) = होती है।
भावार्थ
भावार्थ- हम सीता [लांगल पद्धति] के महत्त्व को समझकर गहराई तक भूमि को जोतें,जिससे उत्तम कृषि होकर हमारा ऐश्वर्य बढ़े।
विषय
उत्तम रीति से कृषि का उपदेश ।
भावार्थ
हे (सीते) हल के अग्रभाग, फाली ! हे (सुभगे) उत्तम ऐश्वर्यवति ! तू (अर्वाची) भूतल के नीचे जाने हारी (भव) हो । (त्वा वन्दामहे) तेरे ऐसे गुणों का हम वर्णन करें (यथा) जिससे तू (नः सुभगा अससि) सुख सौभाग्य देने वाली हो और (यथानः सुफला अससि) जिस प्रकार तू हमें उत्तम अन्न समृद्धि रूप फल देने वाली हो। हल की फाली से उत्तम रूप से खेत जोतने पर ही फसल की उत्तमता निर्भर है। इसलिये हल की फाली के नाना गुणों का अनुशीलन करना चाहिये। (२) गृह पक्ष में—हे (सीते = सिते) प्रेमपाश में बद्ध एवं शुभ्र गुणों से युक्त ! (सुभगे) सौभाग्यवति स्त्री ! तू (अर्वाची भव) हमारे प्रति आकृष्ट हो (त्वा वन्दामहे) तेरे गुण वर्णन और सत्कार करें। जिससे उत्तम ऐश्वर्य और अंग, उत्तम रूप और कुल युक्त और उत्तम सन्तान वाली हो। स्त्री के उत्पादक अंगों का दोषरहित होना ही सन्तान की उत्तमता में कारण है। प्रेम से बंधने वाली स्त्री सीता है। सुखपूर्वक सेवने, पति को सुख देने और कल्याण गुणों से युक्त स्त्री ‘सुभगा’ है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः॥ १–३ क्षेत्रपतिः। ४ शुनः। ५, ८ शुनासीरौ। ६, ७ सीता देवता॥ छन्द:– १, ४, ६, ७ अनुष्टुप् । २, ३, ८ त्रिष्टुप् । ५ पुर-उष्णिक्। अष्टर्चं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमावाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. हे माणसांनो ! जशी उत्तम प्रकारे संपादित केलेली शेतजमीन उत्तम अन्न उत्पन्न करते, तसेच ब्रह्मचर्याने विद्या प्राप्त केलेले लोक उत्तम प्रकारच्या संतानांना निर्माण करतात. जशी भूमीच राज्याला ऐश्वर्ययुक्त करते, तसे परस्पर प्रसन्न स्त्री - पुरुष अत्यंत ऐश्वर्यवान होतात. ॥ ६ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O charming furrow, be straight and deeply well drawn. We love and celebrate you so that you bring us good fortune, so that you bring us the best fruit of our labour and endeavour.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject of agriculture goes on.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O lucky augmenter of good wealth; my wife! you should be humble like the furrow. You should be like. the people, who make the land prosperous. You act fruitful to us' like the earth. Therefore, we desire you.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Here is a simile in the mantra. The earth when well-cultivated produces good crop, in the same manner, a man who has received good education through the observance of Brahmacharya (continence) gives birth to good children. The kingdom of the land is the important cause of great prosperity. In the same manner, husband and wife who love each other become prosperous.
Foot Notes
(सीते) हलादिकर्षणावयवायोनिर्मिता । = Furrow. (वन्दामहे ) कामयामहे । = Desire.
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