ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 6/ मन्त्र 6
भ॒द्रा ते॑ अग्ने स्वनीक सं॒दृग्घो॒रस्य॑ स॒तो विषु॑णस्य॒ चारुः॑। न यत्ते॑ शो॒चिस्तम॑सा॒ वर॑न्त॒ न ध्व॒स्मान॑स्त॒न्वी॒३॒॑ रेप॒ आ धुः॑ ॥६॥
स्वर सहित पद पाठभ॒द्रा । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽअ॒नी॒क॒ । स॒म्ऽदृक् । घो॒रस्य॑ । स॒तः । विषु॑णस्य । चारुः॑ । न । यत् । ते॒ । शो॒चिः । तम॑सा । वर॑न्त । न । ध्व॒स्मानः॑ । त॒न्वि॑ । रेपः॑ । आ । धु॒रिति॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
भद्रा ते अग्ने स्वनीक संदृग्घोरस्य सतो विषुणस्य चारुः। न यत्ते शोचिस्तमसा वरन्त न ध्वस्मानस्तन्वी३ रेप आ धुः ॥६॥
स्वर रहित पद पाठभद्रा। ते। अग्ने। सुऽअनीक। सम्ऽदृक्। घोरस्य। सतः। विषुणस्य। चारुः। न। यत्। ते। शोचिः। तमसा। वरन्त। न। ध्वस्मानः। तन्वि। रेपः। आ। धुरिति धुः॥६॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 6; मन्त्र » 6
अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 5; मन्त्र » 1
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अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 5; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथेश्वरतया राजगुणानाह ॥
अन्वयः
हे स्वनीकाग्ने ! या ते घोरस्य सतो विषुणस्य चारुर्भद्रा संदृगस्ति यत्ते शोचिस्तमसा ध्वस्मानो न वरन्त या ते तन्वि नीतिस्तया रेपो न आ धुः स त्वमस्माकं राजा भव ॥६॥
पदार्थः
(भद्रा) कल्याणकारिणी (ते) तव (अग्ने) विद्युदिव वर्त्तमान (स्वनीक) उत्तमसैन्य (संदृक्) समानदृष्टिः (घोरस्य) दुष्टस्य (सतः) सत्पुरुषस्य (विषुणस्य) विषमस्य (चारुः) (न) (यत्) (ते) (शोचिः) दीप्तिः (तमसा) रात्र्या (वरन्त) निवारयन्ति (न) (ध्वस्मानः) ध्वंसकाः शत्रवः (तन्वि) विस्तीर्णा (रेपः) अपराधम् (आ) (धुः) समन्ताद् दध्युः ॥६॥
भावार्थः
यस्य राज्ञः पक्षपातरहिता प्रवृत्तिर्यस्य विस्तीर्णा नीतिरविहता वर्त्तते तस्य राज्ये कोऽप्यपराधं कर्त्तुं नेच्छेत् ॥६॥
हिन्दी (3)
विषय
अब ईश्वरता लेकर राजगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (स्वनीक) उत्तम सेनायुक्त (अग्ने) बिजुली के समान वर्त्तमान ! जो (ते) आपकी (घोरस्य) दुष्ट (सतः) श्रेष्ठ पुरुष की तथा (विषुणस्य) विषम की (चारुः) सुन्दर (भद्रा) कल्याण करनेवाली (संदृक्) समान दृष्टि है (यत्) जो (ते) आपका (शोचिः) प्रकाश (तमसा) रात्रि से (ध्वस्मानः) नाश करनेवाले शत्रु (न) नहीं (वरन्त) निवारण करते हैं, जो आपकी (तन्वि) विस्तीर्ण नीति उससे (रेपः) अपराध (न) नहीं (आ, धुः) सब प्रकार धारण करे, वह आप हम लोगों के राजा हूजिये ॥६॥
भावार्थ
जिस राजा की पक्षपातरहित प्रवृत्ति और जिसकी विस्तीर्ण नीति अविच्छिन्न वर्त्तमान है, उसके राज्य में कोई भी अपराध करने की इच्छा न करे ॥६॥
विषय
भद्रा संदृक्
पदार्थ
[१] गतमन्त्र के 'मितद्रु' के लिये ही कहते हैं कि हे (अग्ने) = प्रगतिशील स्वनीक उत्तम तेजस्वितावाले [अनीक-extreme brightness] जीव! (घोरस्य सतः) = अपनी तीव्र ज्योति के कारण शत्रुओं के लिये भयंकर होते हुए भी (ते) = तेरी (संदृक्) = दृष्टि भद्रा कल्याणकारिणी है। (विषुणस्य) = चारों ओर व्याप्त होनेवाली ज्योतिवाले तेरी दृष्टि (चारु:) = रमणीय है, अर्थात् शत्रु भयंकर ज्ञान ज्योतिवाला यह पुरुष कल्याणकारिणी रमणीय दृष्टि से ही सबको देखता है। [२] (यत्) = जो (ते) = तेरी (शोचिः) = ज्ञानदीप्ति है, उसे कोई भी (नमसा) = अन्धकार से (न वरन्त) = आच्छादित करनेवाले नहीं होते, अर्थात् इसका ज्ञान वासनान्धकार से आवृत नहीं हो जाता। तथा (ध्वस्मानः) = ध्वंसक वृत्तिवाले राक्षसी भाव (तन्वी) = इसके शरीर में (रेपः न आधुः) = दोषों का आधान नहीं करते, अर्थात् इसका शरीर रोगादि से आक्रान्त नहीं होता और मन वासनाओं से अभिभूत नहीं होता।
भावार्थ
भावार्थ- ज्ञानी पुरुष तेजस्वी व शत्रु भयंकर होता हुआ कल्याणकारिणी व रमणीय दृष्टि से सब को देखता है। इसका ज्ञान वासनान्धकार से आवृत नहीं होता और इसका शरीर नीरोग बना रहता है।
विषय
अग्नि, सूर्यवत् तेजस्वी नायक ।
भावार्थ
हे (अग्ने) तेजस्विन् ! अग्रणी ! राजन् ! विद्वन् ! हे (स्वनीक) उत्तम सेना के स्वामिन् ! (घोरस्य) घोर, अति भयानक (सतः) और साथ ही अति सज्जन (विषुणस्य) राष्ट्र में व्यापक सामर्थ्यवान् (ते) आपकी (चारुः) उत्तम (संदृक्) समान, निष्पक्षपात दृष्टि (भद्रा) सबका कल्याण करने वाली हो । (यत्) जिसके कारण (ध्वस्मानः) विध्वंस करने वाले प्रजा-नाशक लोग (ते शोचिः) तेरे तेज को (तमसा) अन्धकार के तुल्य प्रजोत्पीड़न, अन्याय अत्याचारादि से (न वरन्त) नहीं ढक सकते और वे (तन्वि) किसी के या तेरे शरीर पर भी (रेपः) अपना हत्यादि पापमय प्रयोग (न आदधुः) नहीं कर सकते ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः ॥ अग्निर्देवता ॥ छन्दः– १, ३, ५, ८, ११ विराट् त्रिष्टुप । ७ निचृत्त्रिष्टुप् । १० त्रिष्टुप् । २, ४, ९ भुरिक् पंक्तिः । ६ स्वराट् पंक्तिः ॥
मराठी (1)
भावार्थ
जो राजा भेदभाव करीत नाही व ज्याची नीती दृढ आहे, त्याच्या राज्यात कुणीही अपराध करण्याची इच्छा करीत नाही. ॥ ६ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Agni, lord blissful of light, love and justice, commanding divine force and power, fearsome, eternally true and manifesting in infinite variety of the world of change, equal, kind and gracious is your eye by which you watch every living being. No evil forces can cover with darkness the light that is yours, nor can any devil and destroyer attribute any sin or smear or partiality to your body of law and justice.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The attributes of a king are told.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O man ! you possess good arms, and are our king. You deliver justice to a fierce wicked persons. You are a good man and a man of moody nature, beautiful and auspicious, whose splendor can not be destroyed by violent foes even under darkness of the night. Your liberal policy makes men refrain from sinful acts.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
In the reign of a king who is impartial in his dealings and whose policy is liberal and non-obtrusive, none should desire to commit sins and crimes.
Foot Notes
(स्वनीक) उत्तमसैन्य। = Possessing good army. (रेप:) अपराधम् । = Fault, sin. (ध्वस्मान:) हवंसकाः शत्रवः । = Violent foes. (शोचिः) दीप्ति:। = Splendor.
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