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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 19 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 19/ मन्त्र 4
    ऋषिः - वव्रिरात्रेयः देवता - अग्निः छन्दः - भुरिगुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    प्रि॒यं दु॒ग्धं न काम्य॒मजा॑मि जा॒म्योः सचा॑। घ॒र्मो न वाज॑जठ॒रोऽद॑ब्धः॒ शश्व॑तो॒ दभः॑ ॥४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्रि॒यम् । दु॒ग्धम् । न । काम्य॑म् । अजा॑मि । जा॒म्योः । सचा॑ । घ॒र्मः । न । वाज॑ऽजठरः । अद॑ब्धः । शश्व॑तः । दभः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रियं दुग्धं न काम्यमजामि जाम्योः सचा। घर्मो न वाजजठरोऽदब्धः शश्वतो दभः ॥४॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रियम्। दुग्धम्। न। काम्यम्। अजामि। जाम्योः। सचा। घर्मः। न। वाजऽजठरः। अदब्धः। शश्वतः। दभः ॥४॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 19; मन्त्र » 4
    अष्टक » 4; अध्याय » 1; वर्ग » 11; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    वाजजठरोऽदब्धः शश्वतो दभो घर्मो न प्रियं दुग्धं न सचा जाम्योः काम्यमजामि तेन मया सह यूयमप्येदं कुरुत ॥४॥

    पदार्थः

    (प्रियम्) (दुग्धम्) (न) इव (काम्यम्) कमनीयम् (अजामि) प्राप्नोमि (जाम्योः) अत्तव्यान्नप्रदयोर्द्यावापृथिव्योः (सचा) सम्बन्धेन (घर्मः) प्रतापः (न) इव (वाजजठरः) वाजो क्षुद्वेगो जठरे यस्मात्सः (अदब्धः) अहिंसनीयः (शश्वतः) निरन्तरोऽव्याप्तः (दभः) दभ्नाति हिनस्ति येन सः ॥४॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः । ये सूर्य्यप्रकाशवद् व्याप्तविद्या दुग्धवत्प्रियवचसो धर्मं कामयमाना जनास्सन्ति ते भूमिवत्सर्वेषां रक्षका भवन्ति ॥४॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    (वाजजठरः) क्षुधा का वेग उदर में जिससे हो (अदब्धः) जो नहीं हिंसा करने योग्य (शश्वतः) निरन्तर व्याप्त (दभः) और जिससे नाश करता है उस (घर्मः) प्रताप के (न) सदृश वा (प्रियम्) प्रिय (दुग्धम्) दुग्ध के (न) सदृश (सचा) सम्बन्ध से (जाम्योः) खाने योग्य अन्न को देनेवाले प्रकाश और पृथिवी के (काम्यम्) कामना करने योग्य पदार्थ को (अजामि) प्राप्त होता हूँ, इससे मेरे साथ आप लोग भी इसको करो ॥४॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के प्रकाश के सदृश विद्या से व्याप्त, दुग्ध के सदृश प्रिय वचनवाले और धर्म्म की कामना करते हुए जन हैं, वे पृथ्वी के सदृश सब के रक्षक होते हैं ॥४॥

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    विषय

    न्याय से शासनकर्त्ता की स्वस्थ शरीरवत् वृद्धि । वायु से धौंके हुए अग्नि के तुल्य । नायक की बलवान् सहयोगी से वृद्धि ।

    भावार्थ

    भा०—जिस प्रकार बालक ( जाम्याः सचा ) उत्पन्न करने वाले माता पिता के बीच में स्थित ( प्रियं अजामि काम्यं ) प्रिय निर्दोष कामना करने योग्य ( दुग्धं न ) दुग्ध को प्राप्त करके बढ़ता है और जिस प्रकार ( जाम्योः सचा धर्मः न ) भूमि और आकाश दोनों के बीच में सेचनसमर्थ मेघ वा सूर्य ( दुग्धं काम्यं प्राप्य वर्धते ) उत्तम जल को पाकर बढ़ता है, और जिस प्रकार (वाज-जठरः) अन्न को पेट में पचाने वाला पुरुष बढ़ता है उसी प्रकार ( धर्मः न ) सूर्यवत् तेजस्वी, (वाज-जठरः ) ऐश्वर्य को अपने वश कर भोगने वाला, ( अ-दब्धः ) शत्रुओं से पीड़ित न होकर ( शश्वतः ) नित्य न्याय से स्थिर, (दभः) दुष्टों को दण्ड देने वाला होकर ( जाम्योः सचा) बहिन भाईवत् य भगिनीवत् विराजने वाली धर्मसभा, राजसभा वा प्रजासभा और राजसभा इन दोनों के (सचा ) बीच समान भाव से मध्यस्थ होकर ( दुग्धं न ) दूध के तुल्य हर्षादि से प्राप्त ( काम्यं ) कामना करने योग्य ( प्रियं ) सर्व प्रिय (अजामि) निर्दोष निर्णय को प्राप्त करके निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वव्रिरात्रेय ऋषिः । अग्निर्देवता ॥ छन्दः -१ गायत्री । २ निचृद्-गायत्री । ३ अनुष्टुप् । ४ भुरिगुष्णिक् । ५ निचृत्पंक्तिः ॥ पञ्चर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    माता-पिता के निरीक्षण में

    पदार्थ

    [१] (जाम्योः सचा) = जन्म देनेवाले माता-पिता के साथ उनके सम्पर्क में रहता हुआ मैं (प्रियम्) = प्रीणित करनेवाले (दुग्धं न) = दुग्ध के समान (काम्यम्) = चाहने योग्य ज्ञान को (अजामि) = प्राप्त होता हूँ [अज गतौ] । माता-पिता ने निरीक्षण में रहनेवाला सन्तान अवाञ्छनीय बातों को नहीं सीखता। वह कमनीय ज्ञान को ही प्राप्त करता है । [२] (घर्मः न) = यह [ sunshine] सूर्य के प्रकाश के समान होता है, ज्ञान से चमकता है। (वाजजठरः) = शक्ति को अपने जठर में लिये हुए होता है, शक्तिशाली होता है । (अदब्धः) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं से हिंसित नहीं होता। (शश्वतः) = प्लुतगतिवाला होता है तथा (दभः) = शत्रुओं का हिंसक होता है। वस्तुतः यह निरन्तर क्रियाशीलता ही इसे शत्रुओं का संहार करने में समर्थ करती है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- माता-पिता के निरीक्षण में रहनेवाला सन्तान उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त करता है, प्रशस्त जीवनवाला होता है ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे सूर्यप्रकाशाप्रमाणे विद्यावान, दुधाप्रमाणे मधुर वचनी व धर्माची कामना करणारे लोक असतात ते पृथ्वीप्रमाणे रक्षक असतात. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Friend and associate of heaven and earth, intrepidable, eternal, dynamic, like the vital fire of the body which assimilates all it receives for energy, I, living fire of existence, receive and assimilate all I love as delicious milk and remain unconquered.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    For teachings the enlightened persons are described.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    I have good appetite of a healthy person, am inviolable, and engaged in good actions. Ceaselessly like the destructive force or dear like the milk. I attain whatever is desirable on the earth and heaven because they produce or contain food materials. You should also do the same with me.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    There is a simile used in the mantra. Those men are the protectors of all. like the earth who pervade (are knowers of ) all sciences. As the sun light is dear to all like the milk, the followers of Dharma (righteousness) are also liked.

    Foot Notes

    (जाम्योः) अत्तव्यात्रप्रदयोर्द्यावापृथिव्योः । जमु अदने (म्वा.)। = Givers of food materials of the earth and heaven. (दभः) दम्नाति हिनस्ति येन सः । दम्नोति वधकर्मा (NG 2, 19 ) = Destructive. (अजामि) प्राप्नोमि । धर्म इति अहर्नाम् ( NG 1, 19)। = Attain, achieve.

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