ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 28/ मन्त्र 2
हवं॑ त इन्द्र महि॒मा व्या॑न॒ड् ब्रह्म॒ यत्पासि॑ शवसि॒न्नृषी॑णाम्। आ यद्वज्रं॑ दधि॒षे हस्त॑ उग्र घो॒रः सन्क्रत्वा॑ जनिष्ठा॒ अषा॑ळ्हाः ॥२॥
स्वर सहित पद पाठहव॑म् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । म॒हि॒मा । वि । आ॒न॒ट् । ब्रह्म॑ । यत् । पासि॑ । श॒व॒सि॒न् । ऋषी॑णाम् । आ । यत् । वज्र॑म् । द॒धि॒षे । हस्ते॑ । उ॒ग्र॒ । घो॒रः । सन् । क्रत्वा॑ । ज॒नि॒ष्ठाः॒ । अषा॑ळ्हः ॥
स्वर रहित मन्त्र
हवं त इन्द्र महिमा व्यानड् ब्रह्म यत्पासि शवसिन्नृषीणाम्। आ यद्वज्रं दधिषे हस्त उग्र घोरः सन्क्रत्वा जनिष्ठा अषाळ्हाः ॥२॥
स्वर रहित पद पाठहवम्। ते। इन्द्र। महिमा। वि। आनट्। ब्रह्म। यत्। पासि। शवसिन्। ऋषीणाम्। आ। यत्। वज्रम्। दधिषे। हस्ते। उग्र। घोरः। सन्। क्रत्वा। जनिष्ठाः। अषाळ्हाः ॥२॥
ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 28; मन्त्र » 2
अष्टक » 5; अध्याय » 3; वर्ग » 12; मन्त्र » 2
Acknowledgment
अष्टक » 5; अध्याय » 3; वर्ग » 12; मन्त्र » 2
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः स राजा कीदृशो भवेदित्याह ॥
अन्वयः
हे शवसिन्नुग्रेन्द्र ! यद्यन्ते महिमा हवं ब्रह्म व्यानड् येन त्वमृषीणां हवं पासि यद्यं वज्रं हस्ते आ दधिषे घोरः सन् क्रत्वाऽषाळ्हो जनिष्ठाः स त्वमस्माभिः सत्कर्त्तव्योऽसि ॥२॥
पदार्थः
(हवम्) प्रशंसनीयं वाग्व्यवहारम् (ते) तव (इन्द्र) दुष्टविदारक (महिमा) प्रशंसा समूहः (वि) विशेषेण (आनट्) अश्नोति व्याप्नोति (ब्रह्म) धनम् (यत्) यः (पासि) (शवसिन्) बहुविधं शवो बलं विद्यते यस्य तत्सम्बुद्धौ (ऋषीणाम्) वेदार्थविदाम् (आ) (यत्) यम् (वज्रम्) (दधिषे) दधसि (हस्ते) करे (उग्र) तेजस्विस्वभाव (घोरः) यो हन्ति सः (सन्) (क्रत्वा) प्रज्ञया कर्मणा वा (जनिष्ठाः) जनय (अषाळ्हाः) असोढव्याः शत्रुसेनाः ॥२॥
भावार्थः
हे मनुष्या ! यः शस्त्राऽस्त्रप्रयोगकर्त्ता धनुर्वेदादिशास्त्रवित्प्रशस्तसेनो भवेद्यस्य पुण्या कीर्तिर्वर्त्तेत स एव शत्रुहनने प्रजापालने समर्थो भवति ॥२॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (शवसिन्) बहुत प्रकार के बल और (उग्र) तेजस्वी स्वभाव युक्त (इन्द्र) दुष्टों के विदारनेवाला राजा ! (यत्) जो (ते) आप का (महिमा) प्रशंसा समूह (हवम्) प्रशंसनीय वाणियों के व्यवहार को और (ब्रह्म) धन को (व्यानट्) व्याप्त होता है तथा आप (ऋषीणाम्) वेदार्थवेत्ताओं के (हवम्) प्रशंसनीय वाणी व्यवहार की (पासि) रक्षा करते हो और (यत्) जिस (वज्रम्) शस्त्रसमूह को (हस्ते) हाथ में (आ, दधिषे) अच्छे प्रकार धारण करते हो और (घोरः) मारनेवाले (सन्) होकर (क्रत्वा) प्रज्ञा वा कर्म से (अषाळ्हाः) न सहने योग्य शत्रु सेनाओं को (जनिष्ठाः) प्रगट करो अर्थात् ढिठाई उन की दूर करो सो तुम हम लोगों से सत्कार पाने योग्य हो ॥२॥
भावार्थ
हे मनुष्यो ! जो शस्त्र और अस्त्रों के प्रयोगों का करने धनुर्वेदादिशास्त्रों का जानने और प्रशंसायुक्त सेनावाला हो और जिस की पुण्यरूपी कीर्त्ति वर्त्तमान है, वही शत्रुओं के मारने और प्रजाजनों के पालने में समर्थ होता है ॥२॥
विषय
ज्ञान धन का रक्षक राजा । उसका घोर वज्र और वह स्वयं असह्य हो ।
भावार्थ
हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! हे विद्वन् ! दुष्टनाशक ! ( ते महिमा ) तेरा महान् सामर्थ्य ( हवं ) उत्तम वाणी के व्यवहार, तथा यज्ञ और संग्राम को भी ( वि आनड् ) व्याप्त है । ( यत् ) जिससे हे (शवसिन् ) बलवन् ! तू ( ऋषीणाम् ) ऋषियों, वेदज्ञ विद्वानों के (हवं, ब्रह्म) स्तुत्य ब्रह्मज्ञान और देश के धन की भी ( पासि ) रक्षा करता है। हे ( उग्र ) तेजस्विन् ! ( यत् ) जो ( वज्रं हस्ते दधिषे ) शस्त्रास्त्र बल को अपने हाथ में धारण करता है वह तू ( घोरः सन् ) शत्रु को मारने में समर्थ होकर ( क्रत्वा ) अपने ज्ञान और कर्मसामर्थ्य से ( अषाढ: ) अन्यों के लिये असह्य ( जनिष्ठाः ) हो जाता है । अथवा (अषाढः ) असह्य, न पराजित होने वाली सेनाओं को प्रकट करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वसिष्ठ ऋषिः॥ इन्द्रा देवता ॥ छन्दः – १, २, ५ निचृत्त्रिष्टुप् । ३ भुरिक् पंक्तिः । ४ स्वराट् पंक्तिः॥ पञ्चर्चं सूक्तम्॥
विषय
राजा शत्रुओं के लिए भयानक हो
पदार्थ
पदार्थ- हे (इन्द्र) = ऐश्वर्यवन् ! (ते महिमा) = तेरा सामर्थ्य (हवं) = यज्ञ और संग्राम को भी (वि आनड्) = व्याप्त है। (यत्) = जिससे, हे (शवसिन्) = बलवन् ! तू (ऋषीणाम्) = ऋषियों के (हवं, ब्रह्म) = स्तुत्य ज्ञान की भी (पासि) = रक्षा करता है। हे (उग्र) = तेजस्विन् ! (यत्) = जो (वज्रं हस्ते दधिषे) = शस्त्रास्त्र बल को हाथ में धारण करता है वह, तू (घोरः सन्) = शत्रुनाश में समर्थ होकर (क्रत्वा) = अपने कर्म से (अषाढः) = अन्यों के लिये असह्य हो (जनिष्ठाः) = अजेय सेनाओं को प्रकट कर ।
भावार्थ
भावार्थ- कुशल राजा अपने ज्ञान एवं कर्म द्वारा शक्ति का बहुत संग्रह करे, जिससे शत्रु काँप उठे तथा राष्ट्र पर आक्रमण करने का साहस न कर सके। आक्रमणकारी शत्रु पर इन्द्र के समान भयंकर वज्रपात करे।
मराठी (1)
भावार्थ
हे माणसांनो ! जो शस्त्र व अस्त्रांचा प्रयोगकर्ता, धनुर्वेद इत्यादी शास्त्रांचा जाणकार, प्रशंसित सेना बाळगणारा असेल, ज्याची कीर्ती सर्वत्र पसरलेली असेल तोच शत्रूंना मारण्यास व प्रजेचे पालन करण्यास समर्थ असतो. ॥ २ ॥
इंग्लिश (1)
Meaning
O lord of might, since you protect and preserve the voice of the seers of divine vision, your grandeur vests in the holy voice and holy projects of humanity. Awful lord of blazing lustre, when you wield the thunderbolt in hand in a state of divine passion for action you rise invincible for any power of the world.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal