ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 98/ मन्त्र 7
ऋषिः - वसिष्ठः
देवता - इन्द्राबृहस्पती
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
बृह॑स्पते यु॒वमिन्द्र॑श्च॒ वस्वो॑ दि॒व्यस्ये॑शाथे उ॒त पार्थि॑वस्य । ध॒त्तं र॒यिं स्तु॑व॒ते की॒रये॑ चिद्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥
स्वर सहित पद पाठबृह॑स्पते । यु॒वम् । इन्द्रः॑ । च॒ । वस्वः॑ । दि॒व्यस्य॑ । ई॒शा॒थे॒ इति॑ । उ॒त । पार्थि॑वस्य । ध॒त्तम् । र॒यिम् । स्तु॒व॒ते । की॒रये॑ । चि॒त् । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य । धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्यूयं पात स्वस्तिभि: सदा नः ॥
स्वर रहित पद पाठबृहस्पते । युवम् । इन्द्रः । च । वस्वः । दिव्यस्य । ईशाथे इति । उत । पार्थिवस्य । धत्तम् । रयिम् । स्तुवते । कीरये । चित् । यूयम् । पात । स्वस्तिऽभिः । सदा । नः ॥ ७.९८.७
ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 98; मन्त्र » 7
अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 23; मन्त्र » 7
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अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 23; मन्त्र » 7
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(बृहस्पते) हे सर्वाधिपते ! (च, इन्द्रः) ऐश्वर्यवाँश्च ! (युवम्) त्वं (दिव्यस्य, वस्वः) द्युलोकगतैश्वर्य्यस्य (उत, पार्थिवस्य) पृथिवीगतस्य च (ईशाथे) ईश्वरोऽसि (स्तुवते, कीरये) व्ययार्थं प्रार्थयमानाय (रयिम्) धनं (धत्तम्) देहि (चित्) तथा च (यूयम्) भवान् (स्वस्तिभिः) मङ्गलवाग्भिः (सदा) शश्वत् (नः) अस्मान् (पात) रक्षतु ॥७॥ इत्यष्टनवतितमं सूक्तं त्रयोविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(बृहस्पते) हे सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामिन् ! (च) और (इन्द्र) हे परमैश्वर्ययुक्त परमात्मन् ! (युवम्) आप (दिव्यस्य, वस्वः) द्युलोक के ऐश्वर्य के (उत, पार्थिवस्य) और पृथिवी के ऐश्वर्य के (ईशाथे) ईश्वर हो। हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि (स्तुवते, कीरये) अपने भक्त के लिये (रयिम्) धन को (धत्तम्) देवें (चित्) और (यूयं) आप (स्वस्तिभिः) मङ्गलवाणियों से (सदा) सर्वदा (नः) हमारी (पात) रक्षा करें ॥७॥
भावार्थ
यहाँ परमात्मा में जो द्विवचन दिया है, वह इन्द्र और बृहस्पति के भिन्न-भिन्न होने के अभिप्राय से नहीं, किन्तु उत्पत्ति और स्थिति इन दो शक्तियों के अभिप्राय से अर्थात् स्वामित्व और प्रकाशकत्व इन दो शक्तियों के अभिप्राय से है, व्यक्तिभेद के अभिप्राय से नहीं। इसी अभिप्राय से आगे जाकर ‘यूयम्’ यह बहुवचन दिया। तात्पर्य्य यह है कि एक ही परमात्मा को यहाँ बृहस्पति और इन्द्र इन नामों से गुणभेद से वर्णन किया, जैसा कि एक ही ब्रह्म का “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” तै० २।१। यहाँ सत्यादि नामों से एक ही वस्तु का ग्रहण है, एवं यहाँ भी भिन्न-भिन्न नामों से एक ही ब्रह्म का ग्रहण हैं, दो का नहीं ॥७॥ यह ९८वाँ सूक्त और २३वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
पक्षान्तर में प्रभु की उपासना।
भावार्थ
व्याख्या देखो सू० ९७ । १० ॥ इति त्रयोविंशो वर्गः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वसिष्ठ ऋषिः॥ १–६ इन्द्रः। ७ इन्द्राबृहस्पती देवते। छन्द:— १, २, ६, ७ निचृत् त्रिष्टुप्। ३ विराट् त्रिष्टुप्। ४, ५ त्रिष्टुप्॥ षड्चं सूक्तम्॥
विषय
राष्ट्र की रक्षा
पदार्थ
पदार्थ- हे (बृहस्पते) = महान् (विश्व) = पालक ! हे (इन्द्रः च) = जीवात्मन् ! (युवम्) = आप दोनों, (दिव्यस्य उत पाथिवस्य वस्वः) = आकाश और भूमि के समस्त ऐश्वर्यों के ईशाथे प्रभु हो । आप दोनों (स्तुवते कीरये चित्) = स्तुतिशील विद्वान् को (रयिं धत्तम्) = ऐश्वर्य दो। हे विद्वान् जनो ! (यूयं स्वस्तभिः न सदा पात) = आप सदा ही उत्तम साधनों से हमारी रक्षा करो।
भावार्थ
भावार्थ- राजा व सेनापति राष्ट्र की भूमि-सीमा की रक्षा, भूमि तथा आकाश दो स्थानों में सुरक्षा - तन्त्र को स्थापित करके करें, तभी राष्ट्र समृद्ध व ऐश्वर्यशाली होगा। प्रजाजन ऐसे राष्ट्र रक्षक राजा व सेनापति का आदर करती है। अग्रिम सूक्त का ऋषि वसिष्ठ व देवता विष्णु तथा इन्द्राविष्णू हैं।
इंग्लिश (1)
Meaning
Brhaspati, lord of the vast universe, Indra, omnipotent and illustrious ruler, you are the lord of the beauty and majesty of the light of heaven and wealths of the earth. You alone rule and order these. Pray bear and bring light and wealth to bless the celebrant and the worshipper. O lord and divinities of nature and humanity, protect and promote us with all modes and means of peace, prosperity and excellence all ways all time.
मराठी (1)
भावार्थ
येथे परमेश्वराबद्दल जे द्विवचन दिलेले आहे ते इंद्र व बृहस्पती भिन्न भिन्न असण्याच्या अभिप्रायाने अर्थात - स्वामित्व व प्रकाशकत्व या दोन शक्तींच्या अभिप्रायाने आहे. व्यक्तिभेदाच्या अभिप्रायाने नव्हे. या दृष्टीनेच पुढे युयम् बहुवचन दिलेले आहे. तात्पर्य हे, की एकाच परमात्म्याला येथे बृहस्पती व इंद्र या नावाने गुणभेदाने वर्णिलेले आहे. जसे एकाच ब्रह्माला ‘सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म’ तै. २।१। येथे सत्य इत्यादी नावानी एकाच वस्तूचे ग्रहण होते व येथेही भिन्न भिन्न नावाने एकच ब्रह्माचे ग्रहण होते, दोन्हींचे नाही. ॥७॥
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