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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 18/ मन्त्र 15
    ऋषिः - इरिम्बिठिः काण्वः देवता - आदित्याः छन्दः - पादनिचृदुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    पा॒क॒त्रा स्थ॑न देवा हृ॒त्सु जा॑नीथ॒ मर्त्य॑म् । उप॑ द्व॒युं चाद्व॑युं च वसवः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पा॒क॒ऽत्रा । स्थ॒न॒ । दे॒वाः॒ । हृ॒त्ऽसु । जा॒नी॒थ॒ । मर्त्य॑म् । उप॑ । द्व॒युम् । च॒ । अद्व॑युम् । च॒ । व॒स॒वः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पाकत्रा स्थन देवा हृत्सु जानीथ मर्त्यम् । उप द्वयुं चाद्वयुं च वसवः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पाकऽत्रा । स्थन । देवाः । हृत्ऽसु । जानीथ । मर्त्यम् । उप । द्वयुम् । च । अद्वयुम् । च । वसवः ॥ ८.१८.१५

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 18; मन्त्र » 15
    अष्टक » 6; अध्याय » 1; वर्ग » 27; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    पदार्थः

    (वसवः, देवाः) हे व्यापका विद्वांसः ! (पाकत्रा, स्थन) पक्वबुद्धयः स्थ यूयम् (द्वयुम्, अद्वयुम्, च) कपटिनमकपटिनं च (उप) उपेत्य (हृत्सु) हृदये (मर्त्यम्) जनम् (जानीथ) परिचिनुथ ॥१५॥

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    विषयः

    विद्वत्स्वभावं दर्शयति ।

    पदार्थः

    हे देवाः=विद्यादिदिव्यगुणभूषिता विद्वांसः । हे वसवः=सर्वत्र निवासकर्त्तारः ! वासका वा यूयम् । पाकत्रा=पाकाः “प्रथमार्थे त्राप्रत्ययः” परिपक्वमतयः । स्थन=स्थ । तस्मात् । हृत्सु=निजहृदयेषु । द्वयुम्=द्विप्रकारयुक्तं कपटिनम् । च पुनः । अद्वयुम्=तद्विलक्षणं कापट्यरहितं सरलं कपटिनम् । सत्यस्वभावम् । मर्त्यम्=मनुष्यम् । उप=उपगम्य । जानीथ=तत्र समीपं गत्वा तत्स्वभावं वित्त ॥१५ ॥

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    हिन्दी (4)

    पदार्थ

    (वसवः, देवाः) हे व्यापक विद्वानों ! आप (पाकत्रा, स्थन) परिपक्व बुद्धिवाले हैं, इससे (द्वयुम्, अद्वयुम्, च) छलवाले और शुद्ध स्वभाववाले मनुष्य के (उप) पास जाकर (हृत्सु) अन्तःकरण में (मर्त्यम्) प्रत्येक मनुष्य को (जानीथ) पहिचानते हैं ॥१५॥

    भावार्थ

    हे परिपक्व बुद्धिवाले विद्वान् पुरुषो ! आप छली, कपटी तथा शुद्धस्वभावयुक्त, दोनों प्रकार के मनुष्यों को मिलाप होने पर भले प्रकार जान लेते हैं, अतएव उचित है कि पुरुष परिश्रम से विद्यासम्पन्न हों, जिससे वे मित्र-अमित्र अर्थात् भले-बुरे को पहचानकर दुष्ट मनुष्यों से हानि न उठावें ॥१५॥

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    विषय

    विद्वानों का स्वभाव दिखलाते हैं ।

    पदार्थ

    (देवाः) हे विद्यादि दिव्यगुणभूषित (वसवः) सर्वत्र निवासकर्ता । सबके निवास देनेवाले विद्वान् जनों ! जिस कारण आप (पाकत्रा+स्थन) परिपक्व बुद्धि हैं अर्थात् आपकी बुद्धि सर्व कार्य्य में परिपक्व है, अतः (हृत्सु) अपने हृदयों में (द्वयुम्) जो द्विप्रकार युक्त अर्थात् कपटी है और जो (अद्वयुम्) कपटरहित निश्छल सत्यस्वभाव (मर्त्यम्) मनुष्य है, उन दोनों प्रकारों के मनुष्यों को आप (जानीथ) जानें ॥१५ ॥

    भावार्थ

    वे ही विद्वान् हैं, जो मनुष्यों की चेष्टा से उनकी हृदयस्थ बातें जान लेवें । कपटी और अकपटी जनों की मुखछवि भिन्न-२ होती है । अतः तत्त्ववित् पुरुष उनको शीघ्र जान लेते हैं ॥१५ ॥

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    विषय

    विद्वानों से अज्ञान और पापनाश की प्रार्थना।

    भावार्थ

    हे ( देवाः ) विद्वान् मनुष्यो ! हे ( वसवः ) माता पिता, गृहस्थादि आश्रमों में वास करने वाले मनुष्यो ! आप लोग ( पाकत्रा ) परिपक्व ज्ञान वाले तपस्वी जनों के अधीन ( स्थन ) होकर रहो और ( द्वयुं अद्वयुं च ) दो भावों से रहने वाले, कपटी और दो भावों से न रहकर एक भाव से रहने वाले निष्कपट ( मर्त्यं ) मनुष्य को ( हृत्सु उप जानीथ ) हृदयों तक में खूब जाना करो। मनुष्यों को उनके हृदयों से पहचाना करो। इति सप्तविंशो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    इरिम्बिठिः काण्व ऋषिः॥ देवताः—१—७, १०—२२ आदित्यः। ८ अश्विनौ। ९ आग्निसूर्यांनिलाः॥ छन्दः—१, १३, १५, १६ पादनिचृदुष्णिक्॥ २ आर्ची स्वराडुष्णिक् । ३, ८, १०, ११, १७, १८, २२ उष्णिक्। ४, ९, २१ विराडुष्णिक्। ५-७, १२, १४, १९, २० निचृदुष्णिक्॥ द्वात्रिंशत्यूचं सूक्तम्॥

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    विषय

    संसार में समझदार बनना

    पदार्थ

    [१] हे (देवाः) = देववृत्ति के पुरुषो! आप (पाकत्रास्थन) = परिपक्व ज्ञानवाले होवो, परिपक्व बुद्धिवाले बनो। अपरिपक्व ज्ञानवाला मनुष्य सदा दुःखी होता है। [२] हे (वसवः) = अपने निवास को उत्तम बनानेवाले ज्ञानी पुरुषो! आप (हृत्सु) = अपने हृदयों में (द्वयुं च) = छल छिद्रवाले पुरुष को व (अद्वयुं च) = निष्कपट (मर्त्यम्) = मनुष्य को (उप जानीथ) = जानते हो। यह ठीक है कि आप छली के छल की उद्घोषणा नहीं करते फिरते । परन्तु उसको ठीक रूप में जानकर उसके धोखे में नहीं आते।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम परिपक्व ज्ञानवाले बनें। छली के छल को अपने हृदय में जानते अवश्य हों। इस प्रकार धोखे से बचकर अपने निवास को उत्तम बनायें।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Vasus, brilliant and benevolent providers of peace and settlement for humanity, stand by those who are simple, honest and innocent. In your heart of hearts you know the nature and character of mortal humanity and closely discriminate between the double dealer and the person who is not a double dealer. Stand by the pure at heart, we pray.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे माणसांच्या प्रयत्नाने त्यांच्या हृदयातील गोष्टी जाणतात तेच विद्वान असतात. कपटी व अकपटी लोकांचा चेहरा वेगवेगळा असतो. त्यामुळे तत्त्वज्ञानी पुरुष त्यांना तात्काळ जाणतात.॥१५॥

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