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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 23 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 23/ मन्त्र 26
    ऋषिः - विश्वमना वैयश्वः देवता - अग्निः छन्दः - निचृदुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    म॒हो विश्वाँ॑ अ॒भि ष॒तो॒३॒॑ऽभि ह॒व्यानि॒ मानु॑षा । अग्ने॒ नि ष॑त्सि॒ नम॒साधि॑ ब॒र्हिषि॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    म॒हः । विश्वा॑न् । अ॒भि । स॒तः । अ॒भि । ह॒व्यानि॑ । मानु॑षा । अग्ने॑ । नि । स॒त्सि॒ । नम॑सा । अधि॑ । ब॒र्हिषि॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    महो विश्वाँ अभि षतो३ऽभि हव्यानि मानुषा । अग्ने नि षत्सि नमसाधि बर्हिषि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    महः । विश्वान् । अभि । सतः । अभि । हव्यानि । मानुषा । अग्ने । नि । सत्सि । नमसा । अधि । बर्हिषि ॥ ८.२३.२६

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 23; मन्त्र » 26
    अष्टक » 6; अध्याय » 2; वर्ग » 14; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    पदार्थः

    (अग्ने) हे शूर ! (महः, विश्वान्, सतः) सर्वान् महतः सज्जनान् (अभि) अभितः (मानुषा, हव्यानि) मानुषाणि हव्यानि अभि (अधि, बर्हिषि) यज्ञवेदिं च (नमसा) स्तुत्या (निषत्सि) अधितिष्ठसि ॥२६॥

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    विषयः

    तस्य प्रार्थनां दर्शयति ।

    पदार्थः

    हे अग्ने=ईश ! बर्हिषि+अधि=हृदयासने । त्वम् । नमसा=नमस्कारेण । निषत्सि=निषीद । महः=महतः । विश्वान्=सर्वान् । सतः=विद्यमानान् । अभि=अभितो निषीद । मानुषा=मनुष्यसम्बन्धीनि । हव्यानि । अभि=अभिव्याप्य निषीद ॥२६ ॥

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    हिन्दी (4)

    पदार्थ

    (अग्ने) हे शूर ! (महः, विश्वान्, सतः) सब बड़े सज्जनों के (अभि) प्रति (मानुषा, हव्यानि) मनुष्यसम्बन्धी हव्यों के प्रति (अधि, बर्हिषि) यज्ञ वेदी के प्रति आप (नमसा) स्तुति करने पर (निषत्सि) अवश्य उपस्थित होते हैं ॥२६॥

    भावार्थ

    उपयुक्त गुणसम्पन्न योद्धाओं को भी उचित है कि वे वैदिक यज्ञ को आस्तिकभाव का कर्म समझकर सब विद्वानों, हव्य पदार्थों तथा यज्ञवेदी के प्रति नम्रतापूर्वक आकर उपस्थित हों ॥२६॥

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    विषय

    उसकी प्रार्थना दिखलाते हैं ।

    पदार्थ

    (अग्ने) हे सर्वाधार ईश ! (बर्हिषि+अधि) तू मेरे हृदयासन के ऊपर (नमसा+नि+सत्सि) नमस्कार और आदर से बैठ । (वहः) महान् (विश्वान्) समस्त (सतः) विद्यमान पदार्थों के (अभि) चारों तरफ व्याप्त हो तथा (मानुषा+हव्यानि) मनुष्यसम्बन्धी पदार्थों के (अभि) चारों तरफ बैठ ॥२६ ॥

    भावार्थ

    परमात्मा यद्यपि सर्वत्र विद्यमान ही है, तथापि मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार प्रार्थना करता है और परमात्मा के सकल गुणों का वर्णन केवल अनुवादमात्र है ॥२६ ॥

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    विषय

    अग्नि तुल्य गुणों वाले प्रभु से प्रार्थनाएं।

    भावार्थ

    हे ( अग्नये ) अग्नि के समान तेजस्विन् ! स्वामिन् ! तू ( महतः विश्वान् सतः ) बड़े २ विश्वों और विद्यमान पदार्थों को ( अभि सत्सि ) व्यापता है। तू (मानुषा हव्या अभि सत्सि ) मनुष्यों के वचनों को स्वीकार करता है। हे प्रभो ! तू ( अधि बर्हिषि ) इस महान् संसार में (नमसा) बड़े भारी बल के साथ ( नि सत्सि ) यज्ञ में अन्नसहित अग्नि के समान विराजता है। ( २ ) उसी प्रकार सब पर ( नमसा ) शस्त्र बल से राष्ट्रप्रजाजन के ऊपर शासक रूप से विराजे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वमना वैयश्व ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्द:—१, ३, १०, १४—१६, १९—२२, २६, २७ निचृदुष्णिक्। २, ४, ५, ७, ११, १७, २५, २९, ३० विराडुष्णिक्। ६, ८, ९, १३, १८ उष्णिक्। १२, २३, २८ पादनिचृदुष्णिक्। २४ आर्ची स्वराडुष्णिक्॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    महान् अधिष्ठाता

    पदार्थ

    [१] (अभि) = चारों ओर (सतः) = विद्यमान (महः विश्वान्) = महान् विश्वों को [लोकों को] आप (निषत्सि) = निश्चय से अधिष्ठित करते हैं। तथा (मानुषा) = विचारशील पुरुषों से किये जानेवाले (हव्यानि) = हवि प्रदान [यज्ञ] आदि कर्मों को भी आप ही (अभि) [निषत्सि ] = अधिष्ठित करते हो । सब लोकों में व्याप्त हुए हुए आप उनका धारण व नियमन कर रहे हैं। आप ही इन विचारशील पुरुषों के यज्ञों को सिद्ध करते हैं। [२] हे (अग्ने) = परमात्मन्! आप (नमसा) = नमस् के द्वारा, जब भी उपासक आपके प्रति नमन को धारण करता है तो आप (बर्हिषि) = उसके वासनाशून्य हृदय में (अधि निषत्सि) = आधिक्येन स्थित होते हैं, वह उपासक हृदय में आपका दर्शन कर पाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु सब लोकों के नियामक हैं, सब यज्ञों के अधिष्ठाता हैं, विनीत पुरुष के हृदय में स्थित होते हैं, वहाँ प्रभु का दर्शन होता है।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Great Agni, you pervade everything in existence, you sanctify all yajnic materials of mankind and, honoured with reverence and oblations of havi, you vibrate on the holy grass and illuminate the heart of the yajamana.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमात्मा जरी सर्वत्र विद्यमानच आहे तरी माणूस आपल्या स्वभावानुसार प्रार्थना करतो. परमात्म्याच्या संपूर्ण गुणांचे वर्णन केवळ अनुवाद मात्र आहे. ॥२६॥

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