ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 51/ मन्त्र 7
क॒दा च॒न स्त॒रीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दा॒शुषे॑ । उपो॒पेन्नु म॑घव॒न्भूय॒ इन्नु ते॒ दानं॑ दे॒वस्य॑ पृच्यते ॥
स्वर सहित पद पाठक॒दा । च॒न । स्त॒रीः । अ॒सि॒ । न । इ॒न्द्र॒ । स॒श्च॒सि॒ । दा॒शुषे॑ । उप॑ऽउप । इत् । नु । म॒घ॒ऽव॒न् । भूयः॑ । इत् । नु । ते॒ । दान॑म् । दे॒वस्य॑ । पृ॒च्य॒ते॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे । उपोपेन्नु मघवन्भूय इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते ॥
स्वर रहित पद पाठकदा । चन । स्तरीः । असि । न । इन्द्र । सश्चसि । दाशुषे । उपऽउप । इत् । नु । मघऽवन् । भूयः । इत् । नु । ते । दानम् । देवस्य । पृच्यते ॥ ८.५१.७
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 51; मन्त्र » 7
अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 19; मन्त्र » 2
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अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 19; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Never are you unfruitful, never unchari-table, you are always with the giver, closer and closer, more and more, again and again, O lord of wealth and honour, and the charity of divinity ever grows higher and promotes the giver.
मराठी (1)
भावार्थ
ऐश्वर्याचा एकमात्र स्वामी असलेल्या परमेश्वराला समर्पण बुद्धीने केलेले, सत्पात्राला दिलेले दान त्यापेक्षा जास्त होऊन दात्याच्या सेवेत परत येते. ॥७॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे (इन्द्र) इन्द्र! आप (कदाचन) कदापि (दाशुषे) प्रदानशील हेतु (स्तरीः) निष्फल (न असि) नहीं होते; (सश्चसि) उसे सदा प्राप्त कराते हैं। हे (मघवन्) आदरणीय ऐश्वर्यवन्! (ते) आप के निमित्त किया (दानम्) दान (नु) निश्चय ही (नु) शीघ्र (भूयः इत्) और अधिक होकर (देवस्य) दाता के साथ (पृच्यते) सम्पृक्त होता है॥७॥
भावार्थ
ऐश्वर्य का एकमात्र स्वामी परमेश्वर ही है। उसे समर्पण बुद्धि से किया हुआ, सत्पात्र में दिया दान और अधिक होकर दाता की सेवा में लौटता है॥७॥
विषय
दाता प्रभु से याचना।
भावार्थ
हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! स्वामिन् ! प्रभो ! तू ( कदा चन ) कभी भी ( स्तरीः न ) हिंसक नहीं है, अथवा निर्दुग्ध गाय के समान मदानशील नहीं है। तू ( दाशुषे सश्चसि ) दानशील, यजमान आत्मसमर्पक के सदा साथ रहता है। ( मघवन् ) पूजित धन युक्त ! ( देव-स्य ते) दानशल तेरा ( दानं ) दिया धन ( उप-उप इत् नु पृच्यते ) बराबर प्राप्त होता है और ( भूयः उत् नु ) खूब अधिक मात्रा में प्राप्त होता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
श्रुष्टिगुः काण्व ऋषिः॥ इन्द्रो देवता। छन्दः— १, ३, ९ निचृद् बृहती। ५ विराड् बृहती। ७ बृहती। २ विराट् पंक्ति:। ४, ६, ८, १० निचृत् पंक्तिः॥ दशर्चं सूक्तम्॥
विषय
सदा 'सर्वद' प्रभु
पदार्थ
[१] हे प्रभो ! आप कदाचन कभी भी (स्तरी:) = हमारी हिंसा करनेवाले (न) = नहीं है अथवा आप हमारे लिए [वन्ध्य] गौ के समान नहीं है- आप हमारे लिए सदा आवश्यक वस्तु रूप दुग्ध को प्राप्त करानेवाले हैं। हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप (दाशुषे) = दाश्वान् पुरुष के लिए- दानशील पुरुष के लिए (सश्चसि) = प्राप्त होनेवाले हैं। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (देवस्य ते) = सब कुछ देनेवाले आपका (इत् नु) = निश्चय से (भूयः दानं) = खूब दान (उप उप इत् नु) = समीप और अत्यन्त समीप ही (पृच्यते) = हमारे साथ से संपृक्त होता है। हम आपके दानों का पात्र बनते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु हमें निरन्तर आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त कराते हैं।
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