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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 43 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 43/ मन्त्र 2
    ऋषिः - मेध्यातिथिः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    तं नो॒ विश्वा॑ अव॒स्युवो॒ गिर॑: शुम्भन्ति पू॒र्वथा॑ । इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम् । नः॒ । विश्वाः॑ । अ॒व॒स्युवः॑ । गिरः॑ । शु॒म्भ॒न्ति॒ । पू॒र्वऽथा॑ । इन्दु॑म् । इन्द्रा॑य । पी॒तये॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तं नो विश्वा अवस्युवो गिर: शुम्भन्ति पूर्वथा । इन्दुमिन्द्राय पीतये ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम् । नः । विश्वाः । अवस्युवः । गिरः । शुम्भन्ति । पूर्वऽथा । इन्दुम् । इन्द्राय । पीतये ॥ ९.४३.२

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 43; मन्त्र » 2
    अष्टक » 6; अध्याय » 8; वर्ग » 33; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (तम् इन्दुम्) तं प्रकाशमानं परमात्मानं (अवस्युवः नः विश्वाः गिरः) रक्षेच्छवोऽस्माकं सर्वा गिरः (इन्द्राय पीतये) जीवात्मनः तृप्तये (पूर्वथा) प्राग्वत् (शुम्भन्ति) स्तुतिभिर्विराजयन्ति ॥२॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (तम् इन्दुम्) उस प्रकाशमान परमात्मा को (अवस्युवः नः विश्वाः गिरः) रक्षा को चाहनेवाली मेरी सम्पूर्ण वाणियें (इन्द्राय पीतये) जीवात्मा की तृप्ति के लिये (पूर्वथा) पहले की तरह (शुम्भन्ति) स्तुतियों से विराजमान करती हैं ॥२॥

    भावार्थ

    वही परमात्मा मनुष्य की पूर्ण तृप्ति के लिये पर्याप्त होता है। अन्य शब्द-स्पर्शादि विषय इसको कदाचित्त् भी तृप्त नहीं कर सकते ॥२॥

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    विषय

    इन्द्राय पीतये

    पदार्थ

    [१] (तं इन्दुम्) = उस शक्तिशाली सोम को (नः) = हमारी (विश्वाः) = सब (अवस्युवः) = रक्षण की कामनावाली (गिरः) = स्तुति - वाणियाँ (पूर्वथा) = पालन व पूरण के प्रकार से (शुम्भन्ति) = अलंकृत करती हैं । स्तुति - वाणियाँ प्रभु के स्मरण के द्वारा हमारे जीवन में वासनाओं को नहीं पैदा होने देती । वासनाओं के अभाव में सोम हमारे शरीर में सुरक्षित रहता हुआ उसका पालन व पूरण करता है [पृ पालनपूरणयोः] । यह सोम शरीर का रोगों से पालन [बचाव ] करता है। मन का पूरण करता है, मन में वासनाओं को नहीं आने देता। [२] वासनाओं के अभाव में यह सोम (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिये होता है । तथा (पीतये) = सब प्रकार से हमारे रक्षण के लिये होता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु उपासना के द्वारा शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम प्रभु प्राप्ति के लिये तथा रक्षण के लिये साधन बनता है ।

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    विषय

    प्रभु की स्तुति और प्रार्थनाएं।

    भावार्थ

    (इन्द्राय पीतये) ऐश्वर्ययुक्त राष्ट्र एवं आत्मा के पालन के लिये वा बड़े ऐश्वर्य के उपभोग के लिये (नः) हमारी (अवस्युवः रक्षार्थी वा प्रीतियुक्त (गिरः) स्तुतियें (तं) उस (इन्दुम्) ऐश्वर्ययुक्त, स्नेहार्द्र को (पूर्वथा) पूर्ववत् (शुम्भन्ति) सुशोभित करती हैं !

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मेध्यातिथिर्ऋषिः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, २, ४, ५ गायत्री । ३, ६ निचृद् गायत्री॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    That Soma of beauty, bliss and glory, all our senses, in search of protection and advancement, adore and glorify as ever before for the spiritual joy of the soul.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमात्मा माणसाच्या पूर्णतृप्तीसाठी पर्याप्त असतो. इतर शब्द स्पर्श इत्यादी विषय त्याला तृप्त करू शकत नाहीत. ॥२॥

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