Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 43 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 43/ मन्त्र 4
    ऋषिः - मेध्यातिथिः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    पव॑मान वि॒दा र॒यिम॒स्मभ्यं॑ सोम सु॒श्रिय॑म् । इन्दो॑ स॒हस्र॑वर्चसम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पव॑मान । वि॒दाः । र॒यिम् । अ॒स्मभ्य॑म् । सो॒म॒ । सु॒ऽश्रिय॑म् । इन्दो॒ इति॑ । स॒हस्र॑ऽवर्चसम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पवमान विदा रयिमस्मभ्यं सोम सुश्रियम् । इन्दो सहस्रवर्चसम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पवमान । विदाः । रयिम् । अस्मभ्यम् । सोम । सुऽश्रियम् । इन्दो इति । सहस्रऽवर्चसम् ॥ ९.४३.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 43; मन्त्र » 4
    अष्टक » 6; अध्याय » 8; वर्ग » 33; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (पवमान) हे सर्वस्य पवितः (इन्दो) प्रकाशमान (सोम) सौम्य परमात्मन् ! त्वं (अस्मभ्यम्) (सहस्रवर्चसम्) विविधदीप्तिमन्तम् (सुश्रियम्) सुशोभं (रयिम्) विभवं (विदाः) प्रापय ॥४॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (पवमान) हे सर्वपावक परमात्मन् ! (इन्दो) हे प्रकाशमान ! (सोम) हे सौम्य स्वभाववाले ! (अस्मभ्यम्) आप मेरे लिये (सहस्रवर्चसम्) अनेक प्रकार की दीप्तिवाले (सुश्रियम्) सुन्दर शोभा से युक्त (रयिम्) ऐश्वर्य को (विदाः) प्राप्त कराइये ॥४॥

    भावार्थ

    वही परमात्मा अनन्त प्रकार के अभ्युदयों का दाता है अर्थात् ब्रह्मवर्चसादि सब तेज उसी की सत्ता से उपलब्ध होते हैं ॥४॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    'सुश्री सहस्त्रवर्चस्' रयि

    पदार्थ

    [१] हे (पवमान) = पवित्र करनेवाले (सोम) = वीर्य तू (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (रयिम्) = रयि शक्ति को विदा प्राप्त करा । 'रयि' धन को कहते हैं। जीवन को धन्य बनानेवाली सभी चीजें धन हैं, रय हैं। सोम के रक्षण से ही इनकी प्राप्ति होती है । [२] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! तू हमारे लिये उस रयि को प्राप्त करा जो कि (सुश्रियम्) = उत्तम श्री [शोभा] को देनेवाली है और (सहस्त्रवर्चसम्) = अनन्त शक्ति को प्राप्त करानेवाली है । सोम से शोभा व शक्ति प्राप्त होती है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोम के रक्षण से हम शोभा व शक्ति सम्पन्न रयि को प्राप्त करते हैं।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    उससे सुखों और बलों की याचना।

    भावार्थ

    हे (पवमान) पावन ! (इन्दो) ऐश्वर्यवन् ! तू (अस्म-भ्यम्) हमें (सुश्रियं रयिम् विद) उत्तम कान्तियुक्त ऐश्वर्य प्राप्त करा। हे (सोम) सर्वप्रेरक ! तू (सहस्त्र वर्चसम् रयिम् विद) सहस्रों तेजों वाले ऐश्वर्य हमें दे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मेध्यातिथिर्ऋषिः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, २, ४, ५ गायत्री । ३, ६ निचृद् गायत्री॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Soma, gracious and blissful, pure and purifying divinity, bring us wealth, honour and excellence sanctified in truth, beauty and grace of the light and lustre of a thousand suns.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमात्माच अनंत प्रकारच्या अभ्युदयाचा दाता आहे. अर्थात् ब्रह्मवर्चस इत्यादी तेज त्याच्याच सान्निध्याने उपलब्ध होतात. ॥४॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top