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ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 53/ मन्त्र 3
अस्य॑ व्र॒तानि॒ नाधृषे॒ पव॑मानस्य दू॒ढ्या॑ । रु॒ज यस्त्वा॑ पृत॒न्यति॑ ॥
स्वर सहित पद पाठअस्य॑ । व्र॒तानि॑ । न । आ॒ऽधृषे॑ । पव॑मानस्य । दुः॒ऽध्या॑ । रु॒ज । यः । त्वा॒ । पृ॒त॒न्यति॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अस्य व्रतानि नाधृषे पवमानस्य दूढ्या । रुज यस्त्वा पृतन्यति ॥
स्वर रहित पद पाठअस्य । व्रतानि । न । आऽधृषे । पवमानस्य । दुःऽध्या । रुज । यः । त्वा । पृतन्यति ॥ ९.५३.३
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 53; मन्त्र » 3
अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 10; मन्त्र » 3
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अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 10; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(पवमानस्य अस्य) जगत्पवित्रयितुरनुशासनं (दूढ्या) कश्चिदपि दुश्चरित्रः (नाधृषे) बाधितुं न शक्नोति | यतः (यः त्वा पृतन्यति) यो भवत ईर्ष्यति तम् (रुज) अशक्ततां नयसि ॥३॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(पवमानस्य अस्य) जगत्पावक आपके नियमानुशासन को (दूढ्या) कोई भी दुराचारी (नाधृषे) बाधित नहीं कर सकता, क्योंकि (यः त्वा पृतन्यति) जो आपसे इर्ष्या करता है, उसको (रुज) आप शक्तिहीन कर देते हैं ॥३॥
भावार्थ
परमात्मा दुराचारियों का अधःपतन करते हैं और सदाचारियों को सदैव उन्नतिशील बनाते हैं ॥३॥
विषय
सोमरक्षण के नियमों का पालन
पदार्थ
[१] (अस्य पवमानस्य) = इस जीवन को पवित्र करनेवाले सोम के (व्रतानि) = रक्षण के साधनभूत कर्म-नियम 'नियमः पुण्यकं व्रतम्', (दूढ्या) = [दुर्धिया] दुर्बुद्धि के कारण मेरे से (न आधृषे) = धर्षण के लिये नहीं होते। अर्थात् मैं दुष्ट बुद्धि के कारण सोम के रक्षण के साधनभूत नियमों को नहीं तोड़ता । [२] जब सोमरक्षण के नियमों का पालन करता हुआ मैं सोम का रक्षण करता हूँ तो हे सोम ! (यः) = जो भी (त्वा पृतन्यति) = तेरे पर आक्रमण करता है, उसे तू (रुज) = नष्ट कर । रक्षित सोम हमारे सब शत्रुओं को नष्ट करके हमारा रक्षण करता है ।
भावार्थ
भावार्थ - हम सोमरक्षण के नियमों का पालन करते हुए सोम का रक्षण करें। यह हमारे सब शत्रुभूत रोगकृमियों व वासनाओं का विनाश करके हमारा रक्षण करेगा।
विषय
प्रजा-समृद्धयर्थ बलवान् राजा की स्थापना।
भावार्थ
(अस्य) इस (पवमानस्य) शत्रुओं को उच्छेद करके राज्य को निष्कण्टक करके अभिषिक्त होने वाले शासक के (व्रतानि) कार्य (दूढ्या) दुष्ट चित्त वाले जन से कभी (न दाषे) तिरस्कृत नहीं हो सकते। (यः त्वा पृतन्यति) जो तेरे प्रति सेना लेकर युद्ध करता है तू उस को पीड़ित कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अवत्सार ऋषिः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:- १, ३ निचृद् गायत्री। २, ४ गायत्री ॥ चतुर्ऋचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
The rules and laws of this mighty creative and dynamic power no one can resist with his adverse force. O Soma, whoever opposes you, break open and destroy.
मराठी (1)
भावार्थ
परमात्मा दुराचारी लोकांना दंड करतो. त्यांना शक्तिहीन करतो. त्यांचे अध:पतन होते. तो सदाचारी लोकांना उन्नत करतो. ॥३॥
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