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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 2/ मन्त्र 4
    ऋषि: - अथर्वा देवता - चन्द्रमा और पर्जन्य छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - रोग उपशमन सूक्त
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    यथा॒ द्यां च॑ पृथि॒वीं चा॒न्तस्तिष्ठ॑ति॒ तेज॑नम्। ए॒वा रोगं॑ चास्रा॒वं चा॒न्तस्ति॑ष्ठतु॒ मुञ्ज॒ इत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यथा॑ । द्याम् । च॒ । पृ॒थि॒वीम् । च॒ । अ॒न्तः । तिष्ठ॑ति । तेज॑नम् । ए॒व । रोग॑म् । च॒ । आ॒ऽस्रा॒वम् । च॒ । अ॒न्तः । ति॒ष्ठ॒तु॒ । मुञ्ज॑: । इत् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यथा द्यां च पृथिवीं चान्तस्तिष्ठति तेजनम्। एवा रोगं चास्रावं चान्तस्तिष्ठतु मुञ्ज इत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यथा । द्याम् । च । पृथिवीम् । च । अन्तः । तिष्ठति । तेजनम् । एव । रोगम् । च । आऽस्रावम् । च । अन्तः । तिष्ठतु । मुञ्ज: । इत् ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 4
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    पदार्थ -
    (यथा) जैसे (तेजनम्) प्रकाश (द्यां च) सूर्यलोक (च) और (पृथिवीम्) पृथिवीलोक के (अन्तः) बीच में (तिष्ठति) रहता है, (एव) वैसे ही (मुञ्जः) शोधनेवाला परमेश्वर [वा औषध] (इत्) भी (रोगं च) शरीरभङ्ग (च) और (आस्रावम्) रुधिर के बहाव वा घाव के (अन्तः) बीच में (तिष्ठतु) स्थित होवे ॥४॥

    भावार्थ - जो मनुष्य अपने बाहिरी और भीतरी क्लेशों में (मुञ्ज) हृदयसंशोधक परमेश्वर का स्मरण रखते हैं, वे दुःखों से पार होकर तेजस्वी होते हैं। अथवा जैसे सद्वैद्य (मुञ्ज) संशोधक औषधि से बाहिरी और भीतरी रोग का प्रतीकार करता है, वैसे ही आचार्य विद्याप्रकाश से ब्रह्मचारी के अज्ञान का नाश करता है ॥४॥ सायणभाष्य में (तेजनम्) नपुंसकलिङ्ग को [तेजनः] पुंलिङ्ग मानकर [वेणुः] अर्थात् बाँस अर्थ किया है वह असंगत है ॥


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    Meaning -
    O ruler, O physician, O teacher, just as sharp catalytic light energy abides in heaven, on earth and in the firmament and destroys antilife elements, similarly let the power of the arrow, the medicinal munja grass, the twisted munja girdle of the disciple, strengthen and protect humanity’s security and peace, health of the individual and society, and the intellectual and moral health of the disciple against evil, weakness, disease and wasteful flow out.


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