अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 4
ऋषिः - अथर्वा
देवता - चन्द्रमाः, इन्द्राणी
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - स्वस्त्ययन सूक्त
82
प्रेतं॑ पादौ॒ प्र स्फु॑रतं॒ वह॑तं पृण॒तो गृ॒हान्। इ॑न्द्रा॒ण्ये॑तु प्रथ॒माजी॒तामु॑षिता पु॒रः ॥
स्वर सहित पद पाठप्र । इ॒त॒म् । पा॒दौ॒ । प्र । स्फु॒र॒त॒म् । वह॑तम् । पृ॒ण॒त: । गृ॒हान् । इ॒न्द्रा॒णी । ए॒तु॒ । प्र॒थ॒मा । अजी॑ता । अमु॑षिता । पु॒र: ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रेतं पादौ प्र स्फुरतं वहतं पृणतो गृहान्। इन्द्राण्येतु प्रथमाजीतामुषिता पुरः ॥
स्वर रहित पद पाठप्र । इतम् । पादौ । प्र । स्फुरतम् । वहतम् । पृणत: । गृहान् । इन्द्राणी । एतु । प्रथमा । अजीता । अमुषिता । पुर: ॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
युद्ध का प्रकरण।
पदार्थ
(पादौ) हे हमारे दोनों पाँव (प्रेतम्) आगे बढ़ो, (प्रस्फुरतम्) फुरती करे जाओ, (पृणतः) तृप्त करनेवाले (गृहान्) कुटुम्बियों के पास [हमें] (वहतम्) पहुँचाओ। (प्रथमा) अपूर्व वा विख्यात (अजीता=अजिता) बिना जीती और (अमुषिता) विना लूटी हुई (इन्द्राणी) इन्द्र की शक्ति, महा सम्पत्ति (पुरः) [हमारे] आगे-आगे (एतु) चले ॥४॥
भावार्थ
१−महाप्रतापी शूरवीर पुरुषार्थी राजा विजय करके और बहुत धन प्राप्त करके सावधान होकर अपने घर को लौटे और अपने मित्रों में अनेक प्रकार से उन्नति करके सुखभोग करे ॥ २−जितेन्द्रिय पुरुष आत्मस्थ परमेश्वर के दर्शन से परोपकार करके सुख प्राप्त करे ॥४॥ (इ॒हेन्द्रा॒णी॒मुप॑ह्वये वरुणा॒नीं स्व॒स्तये॑) ऋ० १।२२।१२। इस मन्त्र में (इन्द्राणी) इन्द्र सूर्य वा वायु की शक्ति और (वरुणानी) वरुण जल की शक्ति ऐसा अर्थ श्रीमद्दयानन्दभाष्य में है ॥
टिप्पणी
४−प्र+इतम्। इण् गतौ−लोट्। युवां प्रकर्षेण गच्छतम्। पादौ। हे मम पादौ। स्फुरतम्। स्फुर स्फूर्तौ, चलने च−लोट्। शीघ्रं चलतम्। वहतम्। वह प्रापणे−लोट्, द्विकर्मकः। अस्मान् प्रापयतम्। पृणतः। पृण तर्पणे, तुदादिः−शतृ। तर्पयितॄन् सुखयितॄन् पुरुषान्। गृहान्। पुंलिङ्गम्। गेहे कः। पा० ३।१।१४४। इति ग्रह आदाने−क। दारान् दारादीन् गृहस्थान् प्रति। इन्द्राणी। इन्द्राणीन्द्रस्य पत्नी−निरु० ११।३७। इन्द्रस्य विभूतिः−इति दुर्गाचार्यस्तद्वृत्तौ। इन्द्रवरुणभवशर्व०। पा० ४।१।४९। इति इन्द्र−ङीष् आनुक् च। इन्द्रस्य ऐश्वर्यशालिनः पत्नी पालयित्री शक्तिः। महासमृद्धिः महालक्ष्मीः। एतु। इण्−गतौ। गच्छतु। प्रथमा। १।१२।१। अपूर्वा। प्रख्याता, उत्कृष्टा। अजीता। जि-क्त। सांहितिको दीर्घः। अनिर्जिता, अपराभूता। अमुषिता। मुष वधे, लुण्ठने−क्त। अनपहृता। पुरः। पुरस्तात्। अस्माकम् अग्रे ॥
विषय
परस्पर लड़ने-झगड़ने से बचना
पदार्थ
१. (अध) = अब (यातुधान्य:) = औरों के लिए पीड़ा का आधान करनेवाली (स्त्रियाँ मिथ:) = परस्पर भी (विकेश्य:) = बिखरे हुए केशोंवाली (विघ्नताम्) = परस्पर (मारने) = पीटनेवाली होती हैं और (अराय्य:) = न देने की वृत्तिवाली ये यातुधानियाँ (वितहान्ताम) = विविध प्रकारों से परस्पर हिंसा करनेवाली होती हैं। २. इसप्रकार परस्पर लड़ती हुई तथा हिंसात्मक कर्मों में लगी हुई (यातुधानी:) = ये यातुधानियाँ (पुत्रम्) = पुत्र को (अत्तु) = खा जाती हैं, अर्थात् उनके जीवन को नष्ट कर देती हैं, (उत) = और (स्वसारम्) = अपनी बहिन को व नप्त्यम्-नाती को भी खा जाती हैं, अर्थात् उनके जीवन को भी नष्ट कर देती है।
भावार्थ
सन्तान को उत्तम बनाने के लिए आवश्यक है कि गृहपत्नियों परस्पर लड़ें नहीं । और हिंसात्मक कर्मों में भी प्रवृत्त न हों।
विशेष
सूक्त का संक्षिप्त विषय यह है कि प्रचारक ऐसी उत्तमता से प्रचार करे कि समाज से 'द्वयावी, किमीदी व यातुधान' दूर हो जाएँ। माताएँ भी यातुधानत्व को छोड़कर उत्तम कर्मों में लगी रहकर सन्तानों को उत्तम बनाएँ [१-४] । सन्तानों को उत्तम बनाने के लिए आवश्यक है कि इन्हें 'अभीवर्तमणि' के रक्षण की शिक्षा दी जाए। इसके रक्षण से जीवन को उत्तम बनाते हुए वे 'वसिष्ठ' अत्यन्त उत्तम निवासवाले बनेंगे। यह वसिष्ठ ही अगले सूक्त का ऋषि है।
भाषार्थ
(पादौ) हे दो पैरो ! (प्रेतम्) आगे बढ़ो, (प्रस्फुरतम् ) स्फूर्ति करो, (पृणतः) सेना के पालक शत्रु के ( गृहान् ) घरों की ओर ( वहतम्) हमें ले चलो, या पहुँचाओ। (प्रथमा ) मुखिया, (अजीता) वयोहानि को अप्राप्त, (अमुषिता) अपराजिता (इन्द्राणी) सम्राट् की पत्नी (पुरः ) आगे (एतु) चले।
टिप्पणी
[इन्द्र =सम्राट, इन्द्रश्च सम्राट् (यजु:० ८।३७) । इन्द्राणी = सम्राट् की पत्नी । साम्राज्य में यह महिलाओं में मुखिया है, सम्राट् की पत्नी होने से। सम्राट् शक्तिशाली है, उसकी पत्नी होने से इन्द्राणी भी शक्तिसम्पन्ना है, साम्राज्य की सब शक्तियाँ इसकी सहायिका हैं। यह सेना के आगे-आगे चलती है। इससे सैनिकों को स्फूर्ति मिलती है, उनका उत्साह बढ़ता है। अजीता=अ+ज्या वयोहानी (क्र्यादिः)। अमुषिता= अ + मुष स्तेये (क्र्यादिः)। शत्रु द्वारा छल-कपट से जिसकी शक्ति अपहृत नहीं हुई।]
विषय
सेना-सञ्चालन।
भावार्थ
शत्रु सेना को जीतकर उमंग से भरा अपनी सेना का प्रत्येक सैनिक ऐसा अपने तईं कहे कि (पादौ) हे मेरे दोनों पैरों ! ( प्रेतम् ) चलो, ( प्रस्फुरतम् ) जल्दी २ उठो, ( पृणतः ) अपनी प्रजा के पालक शत्रु राजा के ( गृहम् ) घरों तक ( वहतम् ) हमें ले चलो । ( इन्द्राणी ) मुख्य सेनापति की सेना ( प्रथमा ) जो कि सर्वश्रेष्ठ है (अजीता) जो कि जीति नहीं गई ( अमुषिता ) जिसका दिल चुराया नहीं गया अर्थात् जिसने कभी धैर्य त्याग नही किया वह सेना ( पुरः ) शत्रु के नगरों को ( एतु ) प्राप्त हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
स्वस्त्ययनकामोऽथर्वा ऋषिः। चन्द्रमा इन्द्राग्नी च देवता। १ पथ्यापंक्तिः, २, ३, ४ अनुष्टुभः। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Ruler’s Army
Meaning
Let the two columns of the army go forward, quick, fast and shining, take us to the house of the munificent master and ruler. And let the pioneering force, unconquered and unhurt lead us on back home.
Translation
Move forward, O both our feet. Be quick, Hurry up. Carry the liberal donors to their houses, Let the resplendent lady, unconquered and unrobbed, move in the fore-front as leader.
Translation
Let us, the army returning after celebrating vietry over the enemies, go forward, let our feet press on quickly, let us reach the house of the king and let Indrani; the contingent directly operated by the commanding Chief, foremost, unconquerred lead the way.
Translation
Go forward, feet, press quickly on, take us to the houses of our rich relatives. Let unconquered, unplundered, foremost riches lead the way.
Footnote
This verse is spoken by the General of an army marching home after defeating the army of enemy.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−प्र+इतम्। इण् गतौ−लोट्। युवां प्रकर्षेण गच्छतम्। पादौ। हे मम पादौ। स्फुरतम्। स्फुर स्फूर्तौ, चलने च−लोट्। शीघ्रं चलतम्। वहतम्। वह प्रापणे−लोट्, द्विकर्मकः। अस्मान् प्रापयतम्। पृणतः। पृण तर्पणे, तुदादिः−शतृ। तर्पयितॄन् सुखयितॄन् पुरुषान्। गृहान्। पुंलिङ्गम्। गेहे कः। पा० ३।१।१४४। इति ग्रह आदाने−क। दारान् दारादीन् गृहस्थान् प्रति। इन्द्राणी। इन्द्राणीन्द्रस्य पत्नी−निरु० ११।३७। इन्द्रस्य विभूतिः−इति दुर्गाचार्यस्तद्वृत्तौ। इन्द्रवरुणभवशर्व०। पा० ४।१।४९। इति इन्द्र−ङीष् आनुक् च। इन्द्रस्य ऐश्वर्यशालिनः पत्नी पालयित्री शक्तिः। महासमृद्धिः महालक्ष्मीः। एतु। इण्−गतौ। गच्छतु। प्रथमा। १।१२।१। अपूर्वा। प्रख्याता, उत्कृष्टा। अजीता। जि-क्त। सांहितिको दीर्घः। अनिर्जिता, अपराभूता। अमुषिता। मुष वधे, लुण्ठने−क्त। अनपहृता। पुरः। पुरस्तात्। अस्माकम् अग्रे ॥
बंगाली (3)
पदार्थ
(পাদৌ) হে আমার উদ্যয় পদ! (প্রেতং) সম্মুখে অগ্রসর হও (প্রস্ফুরতং) স্ফুর্তি করিতে থাক (পৃণতঃ) তৃপ্তি সাধক (গৃহান্) আত্মীদের নিকট আমাদিগকে (বহতং) পৌছাও। (প্রথমা) অপূর্ব (অঙ্গীতা) অজেয় (অমুষিতা) অলুণ্ঠিত (ইন্দ্ৰাণী) ইন্দ্রের শক্তি (পুরঃ) আমাদের পুরোভাগে (ত্ৰতু) চলুক।।
भावार्थ
আমাদের উভয় পদ সম্মুখে অগ্রসর হউক, স্ফূর্তি করিতে থাকুক। তৃপ্তি সাধক আত্মীদের নিকট আমাদিগকে পৌছাও। অপূর্ব অজেয় আলুণ্ঠিত মহা সম্পদ আমাদের পুরোভাগে চলুক।।
मन्त्र (बांग्ला)
প্রেতং পাদৌ প্র স্ফুরতং বহুতং পৃণতো গৃহান্ ইন্দ্ৰাণ্যেতু প্রথমা জীতামুষিতা পুরঃ।।
ऋषि | देवता | छन्द
অর্থবা (স্বস্ত্যয়নকামঃ)। ইন্দ্রাণী। অনুষ্টুপ্
मन्त्र विषय
(যুদ্ধপ্রকরণম্) যুদ্ধের প্রকরণ
भाषार्थ
(পাদৌ) হে আমাদের পাদদ্বয় ! (প্রেতম্) সম্মুখে অগ্রসর হও, (প্রস্ফুরতম্) তীব্রভাবে অগ্রসর হও, (পৃণতঃ) তৃপ্তকারী (গৃহান্) আত্মীয়ের নিকট [আমাদের] (বহতম্) পৌঁছে দাও। (প্রথমা) অপূর্ব বা বিখ্যাত (অজীতা=অজিতা) অপরাজিত এবং (অমুষিতা) অনপহৃত (ইন্দ্রাণী) ইন্দ্রের শক্তি, মহা সম্পত্তি (পুরঃ) [আমাদের] সামনে-সামনে (এতু) চলুক ॥৪॥
भावार्थ
১−মহাপ্রতাপী বীর পুরুষার্থী রাজা বিজয় লাভ করে এবং বহু ধন প্রাপ্ত করে সাবধানতাপূর্বক নিজের গৃহে ফিরবেন এবং নিজের মিত্রদের অনেক প্রকারের উন্নতি করিয়ে সুখভোগ করবেন ॥ ২−জিতেন্দ্রিয় পুরুষ আত্মস্থ পরমেশ্বরের দর্শন দ্বারা পরোপকার করে সুখ প্রাপ্ত করবেন/করুক ॥৪॥ (ই॒হেন্দ্রা॒ণী॒মুপ॑হ্বয়ে বরুণা॒নীং স্ব॒স্তয়ে॑) ঋ০ ১।২২।১২। এই মন্ত্রে (ইন্দ্রাণী) ইন্দ্র সূর্য বা বায়ুর শক্তি এবং (বরুণানী) বরুণ জলের শক্তি এরূপ অর্থ শ্রীমদ্দয়ানন্দভাষ্যে রয়েছে।।
भाषार्थ
(পাদৌ) হে পদদ্বয় ! (প্রেত) অগ্ৰগামী হও, (প্রস্ফুরতম্) স্ফূর্তি করো, (পৃণতঃ) সেনার পালক শত্রুর (গৃহান্) ঘরের দিকে (বহতম্) আমাদের নিয়ে চলো, বা পৌঁছে দাও। (প্রথমা) মুখ্য, (অজীতা) বার্ধক্যকে/নির্বলতাকে অপ্রাপ্ত, (অমুষিতা) অপরাজিতা (ইন্দ্রাণী) সম্রাটের পত্নী (পুরঃ) আগে (এতু) চলুক/গমন করুক।
टिप्पणी
[ইন্দ্র=সম্রাট্, ইন্দ্রশ্চ সম্রাট্ (যজুঃ০ ৮।৩৭)। ইন্দ্রাণী= সম্রাটের পত্নী। সাম্রাজ্যে ইনি মহিলাদের প্রধান, সম্রাটের পত্নী হওয়ায়। সম্রাট শক্তিশালী, উনার পত্নী হওয়ায় ইন্দ্রাণীও শক্তিসম্পন্না, সাম্রাজ্যের সমস্ত শক্তি এনার সহায়িকা। ইনি সেনাদের সামনে-সামনে চলে। ফলে সৈনিকরা স্ফূর্তি প্রাপ্ত হয়, তাঁদের উৎসাহ বৃদ্ধি পায়। অজীতা= অ+জ্যা বয়োহানৌ (ক্র্যাদিঃ)। অমুষিতা= অ+মুষ স্তেয়ে (ক্র্যাদিঃ)। শত্রুর ছলনা-কপটতার দ্বারা যার শক্তি পরাজিত হয়নি।]
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal