अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 34/ मन्त्र 5
परि॑ त्वा परित॒त्नुने॒क्षुणा॑गा॒मवि॑द्विषे। यथा॒ मां का॒मिन्यसो॒ यथा॒ मन्नाप॑गा॒ असः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठपरि॑ । त्वा॒ । प॒रि॒ऽत॒त्नुना॑ । इ॒क्षुणा॑ । अ॒गा॒म् । अवि॑ऽद्विषे । यथा॑ । माम् । का॒मिनी॑ । अस॑: । यथा॑ । मत् । न । अप॑ऽगाँ: । अस॑: ॥
स्वर रहित मन्त्र
परि त्वा परितत्नुनेक्षुणागामविद्विषे। यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः ॥
स्वर रहित पद पाठपरि । त्वा । परिऽतत्नुना । इक्षुणा । अगाम् । अविऽद्विषे । यथा । माम् । कामिनी । अस: । यथा । मत् । न । अपऽगाँ: । अस: ॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
विद्या की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थ
(परितत्नुना) बहुत फैली हुई (इक्षुणा) लालसा के साथ [अथवा, ऊख जैसी मधुरता के साथ] (अविद्विषे) वैर छोड़ने के लिये (त्वा) तुझको (परि) सब ओर से (अगाम्) मैंने पाया है। (यथा) जिससे तू (माम् कामिनी) मेरी कामना करनेवाली (असः) होवे और (यथा) जिससे तू (मत्) मुझसे (अपगाः) बिछुड़नेवाली (न) न (असः) होवे ॥५॥
भावार्थ
जब ब्रह्मचारी पूर्ण अभिलाषा से विद्या के लिये प्रयत्न करता है, तो कठिन से कठिन भी विद्या उसको अवश्य मिलती और अभीष्ट आनन्द देती है ॥५॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा २।३०।१ और ६।८।१-३ में भी है ॥
टिप्पणी
५−परि। सर्वतोभावेन। त्वा। त्वाम् मधुलतां विद्याम्। परि-तत्नुना। दाभाभ्यां नुः। उ० ३।३२। इति बाहुलकात्। तनु विस्तारे−नु प्रत्ययः। सर्वत्रव्याप्तेन। इक्षुणा। इषेः वसुः। उ० ३।१५७। इति इषु इच्छायाम्−क्सु। अभिलाषेण, यद्वा। गुडतृणेन प्रेमरूपेण। अगाम्। इण् गतौ−लुङ्। प्राप्तवानस्मि। अवि-द्विषे। न+वि+द्विष वैरे−भावे क्विप्। वैरत्यागार्थम्। यथा। येन प्रकारेण। माम्। ब्रह्मचारिणम्। कामिनी। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति काम−इनि। ङीप्। अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः। पा० २।३।७०। इति द्वितीया। माम् कामयमाना। असः। १।१६।४। त्वम् भवेः, भूयाः। मत्। मत्तः। न। निषेधे। अप-गाः। आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। पा० ३।२।७४। इति अप+गाङ् गतौ−विच्। अपयानशीला, प्रस्थानशीला, वियोगिनी ॥
विषय
माधुर्य का प्रेरक इक्षुदण्ड
पदार्थ
१. पति पत्नी से कहता है कि (त्वा) = तुझे (परितनुना ) = चारों ओर फैलनेवाले (इक्षणा) = इस इक्षुदण्ड के साथ (अविद्विषे) = सब प्रकार की अनीति को दूर करने के लिए (परि आगाम्) = सब ओर से प्राप्त हुआ हूँ, (यथा) = जिससे तू भी (मां कामिनी) = मुझे चाहनेवाली, मुझसे प्रीति करनेवाली (असः) = हो, (यथा) = जिससे (मत्) = मुझसे (अपगा:) = दूर जानेवाली तु (न अस:) = न हो। २. इक्षुदण्ड को लेकर आने का भाव इतना ही है कि इक्षुदण्ड से माधुर्य की प्रेरणा लेकर आना। जब पति पत्नी के साथ सदा मधुर व्यवहार करने का व्रत लेकर उपस्थित होता है तभी वह पत्नी से भी यह आशा करता है कि वह उसी के प्रति प्रेमवाली होगी और कभी उससे दूर होने का ध्यान न करेगी। ३. यह पंक्ति राजा व राष्ट्रसभा के लिए भी विनियुक्त हो सकती है। इसीप्रकार आचार्य व छात्र के लिए भी।
भावार्थ
पति का मधुर व्यवहार पत्नी को उसके प्रति प्रेमवाला बनाए।
विशेष
सूक्त की भावना एक पंक्ति में यही है कि हम मधुर-ही-मधुर बनें। ऐसा बनने के लिए आवश्यक है कि हम अपने में शक्ति धारण करें। शक्ति का हास ही हमें खिझने की वृत्तिवाला बनाता है, अत: अथर्वा की कामना है -
भाषार्थ
[हे जाया !] (परितत्नुना) परितत अर्थात् सब ओर फैले हुए (इक्षुणा) गन्ने के साथ (त्वा) तेरी मैंने (परि अगाम्) परिक्रमा की है (अविद्विषे) पारस्परिक विद्वेष मिटाने के लिये, तथा (यथा) जिस प्रकार कि (माम्) मेरी (कामिनी) कामनावाली (असः) तू हो जा, (यथा) जिस प्रकार कि (मत् ) मुझसे (अपगाः) अपगत हो जानेवाली, मुझे त्यागकर चले जानेवाली (न असः) तू न हो।
टिप्पणी
[सूक्त भावना का उपसंहार– सूक्त के अध्ययन से प्रतीत होता है कि पति-पत्नी में परस्पर कलह है। जिसमें पति कारण बना है, अतः पत्नी पति से रूठी हुई है। पति उसे स्वानुकल करना चाहता है । इसलिये वह अपने-आपको मधुर-व्यवहारवाला बनाता है, और पत्नी को निश्चय कराता है कि मैं तेरे प्रति मधुर व्यवहारवाला हो गया हूँ। एतदर्थ वह मधुररसवाले गन्ने के साथ, पत्नी की परिक्रमा करता है। परिक्रमा पूज्य व्यक्ति की की जाती है। इस द्वारा वह पत्नी को अपनी पूज्या मानता है। "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" (मनु), और दोनों में अनुकूलता पुनः हो जाती है।]
विषय
मधुलता के दृष्टान्त से ब्रह्म विद्या और मातृशक्ति का वर्णन।
भावार्थ
हे प्रिय पत्नि ! ( त्वा ) तुझको (परितत्नुना) सब ओर फैलते हुए विस्तृत (इक्षुणा) गन्ने के समान मधुर या ईक्षण=दर्शन फैलते करने वाले नयन या इच्छाशील चित्त से तेरे सहयोग में मैं ( अविद्विषे ) तुझसे कभी द्वेष न करने एवं सदा प्रेम व्यवहार करने के लिए ही ( परि आगाम् ) सब प्रकार से प्राप्त होता हूं और ऐसा व्यवहार करूं कि यथा ) जिस प्रकार तू ( मां ) मुझको ( कामिनी ) कामना करने हारी ( असः ) हो और ( यथा ) जिस प्रकार तू ( मत् ) मुझसे ( अपगाः ) दूर, पृथक् ( न असः ) न हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः । मधुवनस्पतिर्देवता । मधुवनस्पतिस्तुतिः । अनुष्टुप् छन्दः । पञ्चर्चं, मधुद्यमणिसूक्तम् ।
इंग्लिश (4)
Subject
Life’s Honey
Meaning
O love, O honeyed sweetness of life, with open expanding arms of honey sweets of love and faith I come to embrace you never to allow jealousy, bitterness or enmity to come in and vitiate our love so that you too ever abide with me in love and never forsake me.
Translation
To banish malice, I have surrounded you with sugar cane (iksu) spreading all around, so that you may be desirous of me and may never go away from me.:-
Translation
O bride, I accept you for my pleasant life like the creeping sugar-cane so that you may be desirous of me and may not go far from me,
Translation
O Knowledge, I have gathered thee from all sources, with a vast, ardent desire, to inspire love. Mayest thou be in love with me, never to forsake me.
Footnote
त्वा may refer to a wife. Husband addresses her to love him, and never to depart from him.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−परि। सर्वतोभावेन। त्वा। त्वाम् मधुलतां विद्याम्। परि-तत्नुना। दाभाभ्यां नुः। उ० ३।३२। इति बाहुलकात्। तनु विस्तारे−नु प्रत्ययः। सर्वत्रव्याप्तेन। इक्षुणा। इषेः वसुः। उ० ३।१५७। इति इषु इच्छायाम्−क्सु। अभिलाषेण, यद्वा। गुडतृणेन प्रेमरूपेण। अगाम्। इण् गतौ−लुङ्। प्राप्तवानस्मि। अवि-द्विषे। न+वि+द्विष वैरे−भावे क्विप्। वैरत्यागार्थम्। यथा। येन प्रकारेण। माम्। ब्रह्मचारिणम्। कामिनी। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति काम−इनि। ङीप्। अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः। पा० २।३।७०। इति द्वितीया। माम् कामयमाना। असः। १।१६।४। त्वम् भवेः, भूयाः। मत्। मत्तः। न। निषेधे। अप-गाः। आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। पा० ३।२।७४। इति अप+गाङ् गतौ−विच्। अपयानशीला, प्रस्थानशीला, वियोगिनी ॥
बंगाली (3)
पदार्थ
(পরিতৎনুনা) বহু বিস্তৃত (ইক্ষুণা) মধুর রসের সহিত (অবিদ্বিষে) শত্রুতা ত্যাগের জন্য (ত্বা) তোমাকে (পরি) সব দিক হইতে (অগাং) পাইয়াছি। (য়থা) যাহাতে তুমি (মাম্ কামিণী) আমার কামনা কারীণী (অসঃ) হও (য়থা) যাহাতে তুমি (মৎ) আমা হইতে (অপগাঃ) বিমুক্ত (ন) না (অসঃ) হও।।
भावार्थ
হে বিদ্যা! তোমাকে আমি কামনা করিতেছি, তুমি আমাকে পরিত্যাগ করিও না। শত্রুতা ত্যাগের জন্য মধুর রসের সহিত তোমাকে সব দিক হইতেই পাইয়াছি।।
मन्त्र (बांग्ला)
পরি ত্বা পরিতৎনুনে ক্ষুণাগামবিদ্বেষে। য়তা মাং কামিন্যসো যথা মন্নাপগা অসঃ।।
ऋषि | देवता | छन्द
অর্থবা। মধুবনস্পতিঃ। অনুষ্টুপ্
मन्त्र विषय
(বিদ্যাপ্রাপ্ত্যুপদেশঃ) বিদ্যা প্রাপ্তির উপদেশ
भाषार्थ
(পরিতত্নুনা) বহু বিস্তৃত (ইক্ষুণা) লালসার সাথে [অথবা আখের ন্যায় মধুরতার সাথে] (অবিদ্বিষে) বিদ্বেষ/শত্রুতা ত্যাগের জন্য (ত্বা) তোমাকে (পরি) সব দিক থেকে (অগাম্) আমি লাভ/প্রাপ্ত করেছি। (যথা) যার দ্বারা/যাতে তুমি (মাম্ কামিনী) আমার কামনাকারী (অসঃ) হও এবং (যথা) যাতে তুমি (মৎ) আমার থেকে (অপগাঃ) বিচ্যুত (ন) না (অসঃ) হও ॥৫॥
भावार्थ
যখন ব্রহ্মচারী পূর্ণ অভিলাষা দ্বারা বিদ্যার জন্য প্রযত্ন করেন, তখন কঠিন থেকে কঠিনতর বিদ্যাও তিনি অবশ্যই প্রাপ্ত হয় এবং অভীষ্ট আনন্দ দান করেন ॥৫॥ এই মন্ত্রের দ্বিতীয় অর্ধেক ২।৩০।১ এবং ৬।৮।১-৩ মন্ত্রেপ রয়েছে ॥
भाषार्थ
[হে পত্নী !] (পরিতত্নুনা) পরিতত অর্থাৎ চারিদিকে বিস্তৃত (ইক্ষুণা) আখের সাথে (ত্বা) তোমার আমি (পরি অগাম্) পরিক্রমা করেছি (অবিদ্বিষে) পারস্পরিক বিদ্বেষ নিবারণের/দূর করার জন্য, এবং (যথা) যাতে (মাম্) আমার (কামিনী) কামনাকারী (অসঃ) তুমি হও/হয়ে যাও, (যথা) যাতে (মত্) আমাকে (অপগাঃ) ত্যাগ করে গমনকারী (ন অসঃ) তুমি না হও।
टिप्पणी
[সূক্ত ভাবনার উপসংহার--সূক্তের অধ্যয়নে প্রতীত হয় যে, পতি-পত্নীর মধ্যে পরস্পর কলহ। যেখানে পতি কারণ হয়েছে, অতঃ পত্নী পতির প্রতি রেগে আছে। পতি তাঁকে স্বানুকূল করতে চায়। এইজন্য সে নিজেকে মধুর মতো আচরণকারী করে, এবং পত্নীকে নিশ্চিত করায় যে, আমি তোমার প্রতি মধুর মতো আচরণকারী হয়ে গেছি। এই অর্থে সে মধুর মতো রসালো আখের সাথে, পত্নীর পরিক্রমা করে। পরিক্রমা পূজ্য ব্যক্তির করা হয়। এর দ্বারা সে পত্নীকে নিজের পূজ্যা মানে "যত্র নার্যস্তু পূজ্যন্তে রমন্তে তত্র দেবতাঃ" (মনু), এবং দুজনের মধ্যে অনুকূলতা পুনরায় হয়ে যায়।]
हिंगलिश (1)
Subject
Sweet Temperament : Madhu Vidya
Word Meaning
I should be able to remove the atmosphere of ill will / selfishness, negativity by my overbearing sweet behavior like a चारों ओर फैले हुए वैर , ईर्ष्या को मैं अपने स्वयं के मिठास भरे आचरण से स्वयं फैलते हुए ईख के जंगल के समान घेर कर दूर कर दूं.
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