Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 34 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 34/ मन्त्र 5
    ऋषि: - अथर्वा देवता - मधुवनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - मधु विद्या
    32

    परि॑ त्वा परित॒त्नुने॒क्षुणा॑गा॒मवि॑द्विषे। यथा॒ मां का॒मिन्यसो॒ यथा॒ मन्नाप॑गा॒ असः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परि॑ । त्वा॒ । प॒रि॒ऽत॒त्नुना॑ । इ॒क्षुणा॑ । अ॒गा॒म् । अवि॑ऽद्विषे । यथा॑ । माम् । का॒मिनी॑ । अस॑: । यथा॑ । मत् । न । अप॑ऽगाँ: । अस॑: ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परि त्वा परितत्नुनेक्षुणागामविद्विषे। यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परि । त्वा । परिऽतत्नुना । इक्षुणा । अगाम् । अविऽद्विषे । यथा । माम् । कामिनी । अस: । यथा । मत् । न । अपऽगाँ: । अस: ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 34; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (परितत्नुना) बहुत फैली हुई (इक्षुणा) लालसा के साथ [अथवा, ऊख जैसी मधुरता के साथ] (अविद्विषे) वैर छोड़ने के लिये (त्वा) तुझको (परि) सब ओर से (अगाम्) मैंने पाया है। (यथा) जिससे तू (माम् कामिनी) मेरी कामना करनेवाली (असः) होवे और (यथा) जिससे तू (मत्) मुझसे (अपगाः) बिछुड़नेवाली (न)(असः) होवे ॥५॥

    भावार्थ - जब ब्रह्मचारी पूर्ण अभिलाषा से विद्या के लिये प्रयत्न करता है, तो कठिन से कठिन भी विद्या उसको अवश्य मिलती और अभीष्ट आनन्द देती है ॥५॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा २।३०।१ और ६।८।१-३ में भी है ॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    O love, O honeyed sweetness of life, with open expanding arms of honey sweets of love and faith I come to embrace you never to allow jealousy, bitterness or enmity to come in and vitiate our love so that you too ever abide with me in love and never forsake me.


    Bhashya Acknowledgment
    Top