Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 13 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 10
    ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - द्विपदा विराट् गायत्री छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    43

    य ए॒वाप॑रिमिताः॒पुण्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये । ए॒व । अप॑रिऽमिता: । पुण्या॑: । लो॒का: । तान् । ए॒व । तेन॑ । अव॑ । रु॒न्ध्दे॒ ॥१३.१०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य एवापरिमिताःपुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये । एव । अपरिऽमिता: । पुण्या: । लोका: । तान् । एव । तेन । अव । रुन्ध्दे ॥१३.१०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 13; मन्त्र » 10
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।

    पदार्थ

    (ये) जो (एव) निश्चयकरके (अपरिमिताः) असंख्य (पुण्याः) पवित्र (लोकाः) लोक [दर्शनीय समाज] हैं, (तान्) उनको (एव) निश्चय करके (तेन) उस [अतिथिसत्कार] से (अव रुन्द्धे) वह [गृहस्थ] सुरक्षित करता है ॥१०॥

    भावार्थ

    जब मनुष्य को बड़ेविद्वान् अतिथि से बहुत दिनों सत्सङ्ग करने का अवसर मिले, तो वह उससेब्रह्मविद्या, राज्यविद्या आदि अनेक शुभविद्याएँ प्राप्त करके उन्नति करे ॥९, १०॥

    टिप्पणी

    ९, १०−(अपरिमिताः)असंख्याताः (रात्रीः) (लोकाः) दर्शनीयाः॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    आतिथ्य से पुण्यलोकों की प्राप्ति

    पदार्थ

    १. (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान्) = सर्वत्र गतिवाले प्रभु को जानता हुआ (व्रात्य:) = व्रतीपुरुष (एकामरात्रिम) = एक रात (अतिथिः वसति) = अतिथि बनकर रहता है तो (तेन) = उस अतिथि से वह गृहस्थ (यः) = जो (पृथिव्याम्) = पृथिवी में (पुण्या: लोका:) = पुण्यलोक है (तान् एव) = उनको ही अवरुन्द्ध-अपने लिए सुरक्षित करता है। २. (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान् व्रात्यः) = सर्वत्र गतिवाले प्रभु को जाननेवाला व्रतीपुरुष (द्वितीयां रात्रिं अतिथि: वसति) = दूसरे रात भी अतिथिरूपेण रहता है तो (तेन) = उस आतिथ्य कर्म से ये अन्तरिक्षे (पुण्या: लोका:) = जो अन्तरिक्ष में पुण्यलोक हैं (तान् एव) = उनको निश्चय ही अवरुन्द्धे-अपने लिए सुरक्षित करता है। ३. (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान् व्रात्यः) = उस गति के स्रोत [इ गतौ] प्रभु को जाननेवाला व्रतीपुरुष (ततीयां रात्रिम्) = तीसरी रात भी (अतिथि: वसति) = अतिथिरूप में रहता है तो (तेन) = उस आतिथ्य कर्म से ये दिवि (पुण्या: लोका:) = जो द्युलोक में पुण्यलोक हैं (तान् एव) = अवरुन्द्धे-उनको अपने लिए निश्चय से सुरक्षित कर पाता है। ४, (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान् व्रात्यः) = गति के स्रोत प्रभु को जाननेवाला व्रतीपुरुष चतुर्थी रात्रिं (अतिथिः वसति) = चौथी रात भी अतिथिरूपेण रहता है तो (तेन) = उस आतिथ्य कर्म से ये (पुण्यानां पुण्याः लोका:) = जो पुण्यों के भी पुण्यलोक हैं-अतिशयेन पुण्यलोक हैं, (तान् एव अवरुन्द्ध) = उन्हें अपने लिए सुरक्षित कर लेता है । ५. (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान् व्रात्यः) = गति के स्रोत प्रभु को जाननेवाला व्रती (विद्वान् अपरमिता: रात्रीः अतिथि: वसति) = न सीमित-बहुत रात्रियों तक अतिथिरूपेण रहता है तो (तेन) = उस आतिथ्य कर्म से यह गृहस्थ (ये एवं अपरिमिता: पुण्याः लोका:) = जो भी अपरिमित पुण्यलोक हैं (तान् अवरुन्द्धे) = उन सबको अपने लिए सुरक्षित कर लेता है।

    भावार्थ

    विद्वान् व्रात्य के आतिथ्य से गृहस्थ पुण्यलोकों को प्राप्त करता है। उन विद्वान् व्रात्यों की प्रेरणाएँ इन्हें पुण्य-मार्ग पर ले-चलती हुई पुण्यलोकों को प्राप्त कराती हैं।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (ते) अतिथि के उन असंख्यात या अनिश्चित संख्या वाली रात्रियों के कारण, (ये, एव) जो ही (अपरिमिताः) अनिश्चित परिणाम वाले (पुण्याः लोकाः) पुण्यलोक हैं, (तान् एव) उन्हें ही गृहस्थी (अवरुद्धे) अपनाता है, प्राप्त करता है।

    टिप्पणी

    [एवम् विद्वान्= पूर्व सूक्तों में कथित योगमुद्रासम्पन्न आदि विद्वान्। ऐसा विद्वान् गृहस्थी के घर में जितनी भी रातें वास करेगा, गृहस्थी को सदुपदेशों द्वारा पुण्यकर्मा तथा पुण्यात्मा बना कर, उसे पुण्य, पुण्यतर, और पुण्यतम लोकों के लिए अधिकार सम्पन्न कर देगा। अतः ऐसे व्रती तथा उपकारी अतिथि के सत्संग के लिए गृहस्थी को सदा आकांक्षावान् होना चाहिये। इन मन्त्रों द्वारा पुनर्जन्म भी सूचित किया है, तथा यह भी दर्शाया है कि पृथिवी के अतिरिक्त और भी नाना लोक हैं जिन में पुण्यकर्मा आत्माएं बस रही हैं, और जो कि पुण्यलोक होने के कारण अधिकाधिक सुखों के धाम हैं। वैदिक साहित्य के अनुसार उपरि उपरि ७ भुवन हैं जो कि उत्तरोत्तर पुण्य, पुण्यतर और पुण्यतम हैं, और तदनुसार अधिकाधिक सुखों के धाम हैं। वे हैं भूः, भुवः स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्। इस सम्बन्ध में महर्षि दयानन्द का विचार निम्नलिखित है:- "पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, नक्षत्र और सूर्य इन का "वसु" नाम इस लिये है कि इन्हीं में सब पदार्थ तथा प्रजा वसती हैं, और ये ही सब को बसाते हैं। जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुष्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्य होंगे ? परमेश्वर का कोई भी काम निष्प्रयोजन नहीं होता, तो क्या इतने असंख्य लोकों में मनुष्यादि सृष्टि न हो तो सफल कभी हो सकता है ? अन्य लोकों में मनुष्यादि सृष्टि की•••• कुछ कुछ आकृति में भेद होने का सम्भव है"। (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास ८)]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    अतिथि यज्ञ का फल।

    भावार्थ

    (तत् यस्य० अपरिमिताः रात्रीः अतिथिः गृहे वसति ये एव अपरिमिताः पुण्याः लोकाः०) जिसके घर पर इस प्रकार विद्वान् व्रात्य प्रजापति अपरिमित, अनेक रात्रियें निवास करता है तो वह गृहपति जो अपरिमित, असंख्य पुण्य लोक हैं उनको भी अपने वश कर लेता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    २ प्र० साम्नी उष्णिक्, १ द्वि० ३ द्वि० प्राजापत्यानुष्टुप्, २-४ (प्र०) आसुरी गायत्री, २ द्वि०, ४ द्वि० साम्नी बृहती, ५ प्र० त्रिपदा निचृद् गायत्री, ५ द्वि० द्विपदा विराड् गायत्री, ६ प्राजापत्या पंक्तिः, ७ आसुरी जगती, ८ सतः पंक्तिः, ९ अक्षरपंक्तिः। चतुर्दशर्चं त्रयोदशं पर्यायसूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vratya-Prajapati daivatam

    Meaning

    Thereby he secures for himself unlimited beautiful holy worlds in existence.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Secures thereby all the indefinite auspicious places whatsoever.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Preserves thereby for himself those holy worlds which are unlimited.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Secures for himself thereby the company of unlimited holy persons.

    Footnote

    The Acharya possesses the knowledge of manifold sciences, and instructs the householder in them.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ९, १०−(अपरिमिताः)असंख्याताः (रात्रीः) (लोकाः) दर्शनीयाः॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top