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अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 13 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - प्राजापत्या अनुष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    63

    ये पृ॑थि॒व्यांपुण्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये । पृ॒थि॒व्याम् । पुण्या॑: । लो॒का: । तान् । ए॒व । तेन॑ । अव॑ । रु॒न्ध्दे॒ ॥१३.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ये पृथिव्यांपुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये । पृथिव्याम् । पुण्या: । लोका: । तान् । एव । तेन । अव । रुन्ध्दे ॥१३.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 13; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।

    पदार्थ

    (पृथिव्याम्) पृथिवीपर (ये) जो (पुण्याः) पवित्र (लोकाः) लोक [दर्शनीय समाज] हैं, (तान्) उन समाजोंको (एव) निश्चय करके (तेन) उस [अतिथिसत्कार] से वह [गृहस्थ] (अव रुन्द्धे)सुरक्षित करता है ॥२॥

    भावार्थ

    विद्वान् गृहस्थ पुरुषआप्त सदाचारी अतिथि को एक दिन ठहरा कर उससे उपकारी भूमिविद्या ग्रहण करके लोगोंमें प्रतिष्ठा पावे ॥१, २॥

    टिप्पणी

    २−(ये) (पृथिव्याम्) भूम्याम् (पुण्याः) पवित्राः।उपकारिणः (लोकाः) दर्शनीयाः समाजाः (तान्) (एव) निश्चयेन (तेन) अतिथिसत्कारेण (अव रुन्द्धे) सुरक्षति ॥

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    विषय

    आतिथ्य से पुण्यलोकों की प्राप्ति

    पदार्थ

    १. (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान्) = सर्वत्र गतिवाले प्रभु को जानता हुआ (व्रात्य:) = व्रतीपुरुष (एकामरात्रिम) = एक रात (अतिथिः वसति) = अतिथि बनकर रहता है तो (तेन) = उस अतिथि से वह गृहस्थ (यः) = जो (पृथिव्याम्) = पृथिवी में (पुण्या: लोका:) = पुण्यलोक है (तान् एव) = उनको ही अवरुन्द्ध-अपने लिए सुरक्षित करता है। २. (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान् व्रात्यः) = सर्वत्र गतिवाले प्रभु को जाननेवाला व्रतीपुरुष (द्वितीयां रात्रिं अतिथि: वसति) = दूसरे रात भी अतिथिरूपेण रहता है तो (तेन) = उस आतिथ्य कर्म से ये अन्तरिक्षे (पुण्या: लोका:) = जो अन्तरिक्ष में पुण्यलोक हैं (तान् एव) = उनको निश्चय ही अवरुन्द्धे-अपने लिए सुरक्षित करता है। ३. (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान् व्रात्यः) = उस गति के स्रोत [इ गतौ] प्रभु को जाननेवाला व्रतीपुरुष (ततीयां रात्रिम्) = तीसरी रात भी (अतिथि: वसति) = अतिथिरूप में रहता है तो (तेन) = उस आतिथ्य कर्म से ये दिवि (पुण्या: लोका:) = जो द्युलोक में पुण्यलोक हैं (तान् एव) = अवरुन्द्धे-उनको अपने लिए निश्चय से सुरक्षित कर पाता है। ४, (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान् व्रात्यः) = गति के स्रोत प्रभु को जाननेवाला व्रतीपुरुष चतुर्थी रात्रिं (अतिथिः वसति) = चौथी रात भी अतिथिरूपेण रहता है तो (तेन) = उस आतिथ्य कर्म से ये (पुण्यानां पुण्याः लोका:) = जो पुण्यों के भी पुण्यलोक हैं-अतिशयेन पुण्यलोक हैं, (तान् एव अवरुन्द्ध) = उन्हें अपने लिए सुरक्षित कर लेता है । ५. (तत्) = इसलिए (यस्य गृहे) = जिसके घर में (एवं विद्वान् व्रात्यः) = गति के स्रोत प्रभु को जाननेवाला व्रती (विद्वान् अपरमिता: रात्रीः अतिथि: वसति) = न सीमित-बहुत रात्रियों तक अतिथिरूपेण रहता है तो (तेन) = उस आतिथ्य कर्म से यह गृहस्थ (ये एवं अपरिमिता: पुण्याः लोका:) = जो भी अपरिमित पुण्यलोक हैं (तान् अवरुन्द्धे) = उन सबको अपने लिए सुरक्षित कर लेता है।

    भावार्थ

    विद्वान् व्रात्य के आतिथ्य से गृहस्थ पुण्यलोकों को प्राप्त करता है। उन विद्वान् व्रात्यों की प्रेरणाएँ इन्हें पुण्य-मार्ग पर ले-चलती हुई पुण्यलोकों को प्राप्त कराती हैं।

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    भाषार्थ

    (तेन) अतिथि के उस एक रात के निवास के कारण, (पृथिव्याम्) पृथिवी में (ये) जो (पुण्याः लोकाः) पुण्य लोक हैं (तान्, एव) उन्हें ही, गृहस्थी (अव रुन्द्धे) अवरुद्ध कर लेता है, अपना लेता है, प्राप्त कर लेता है।

    टिप्पणी

    [अतिथि प्रथम रात्रि में गृहस्थी को, शारीरिक तथा पार्थिव भोगों सम्बन्धी सदुपदेश देकर, गृहस्थी के पार्थिव-जीवन को पुण्यमय करता है, जिस से गृहस्थी पृथिवी के पुण्य स्थानों तथा महात्माओं के पुण्याश्रयों के लिये रुचि वाला हो जाता है, और पुनर्जन्म में भी पुण्यात्माओं के घरों में जन्म धारण करता है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vratya-Prajapati daivatam

    Meaning

    He thereby secures for himself all those beautiful holy worlds which are on the earth.

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    Translation

    Secures thereby all the auspicious places that are on the earth.

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    Translation

    Thereby preserves for himself Those holy worlds which are on the earth.

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    Translation

    Secures for himself thereby the company of holy persons who know the science of agriculture.

    Footnote

    The learned Acharya teaches the householder how to cultivate land and grow more food. Loka means: Persons (लोकाः) लोकन्ते पश्यन्ति ते जनाः vide Maharshi Dayananda’s commentary Yajur, 40-3. Plural number denotes the sense of singular. The Acharya possesses the knowledge of Earth equal to the combined knowledge of many agricultural experts.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(ये) (पृथिव्याम्) भूम्याम् (पुण्याः) पवित्राः।उपकारिणः (लोकाः) दर्शनीयाः समाजाः (तान्) (एव) निश्चयेन (तेन) अतिथिसत्कारेण (अव रुन्द्धे) सुरक्षति ॥

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