अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 8
ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य
देवता - त्रिपदा प्रतिष्ठार्ची
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
51
तस्य॒व्रात्य॑स्य। स॑मा॒नमर्थं॒ परि॑ यन्ति दे॒वाः सं॑वत्स॒रं वा ए॒तदृ॒तवो॑ऽनु॒परि॑यन्ति॒ व्रात्यं॑ च ॥
स्वर सहित पद पाठस॒मा॒नम् । अर्थ॑म् । परि॑ । य॒न्ति॒ । दे॒वा: । स॒म्ऽव॒त्स॒रम् । वै । ए॒तत् । ऋ॒तव॑: । अ॒नु॒ऽपरि॑यन्ति । व्रात्य॑म् । च॒॥१७.८॥
स्वर रहित मन्त्र
तस्यव्रात्यस्य। समानमर्थं परि यन्ति देवाः संवत्सरं वा एतदृतवोऽनुपरियन्ति व्रात्यं च ॥
स्वर रहित पद पाठसमानम् । अर्थम् । परि । यन्ति । देवा: । सम्ऽवत्सरम् । वै । एतत् । ऋतव: । अनुऽपरियन्ति । व्रात्यम् । च॥१७.८॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।
पदार्थ
(तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] के−(समानम्) एक से अर्थात् धार्मिक (अर्थम्) अर्थ [विचार] को (देवाः) विद्वान् लोग (परि) सब ओर से (यन्ति) प्राप्तकरते हैं, (च) और (व्रात्यम्) उस व्रात्य [सत्यव्रतधारी पुरुष] के (वै) निश्चयकरके (एतत्) इस प्रकार से (अनुपरियन्ति) पीछे घिर कर चलते हैं, [जैसे] (ऋतवः)ऋतुएँ (संवत्सरम्) वर्षकाल के [पीछे चलते हैं] ॥८॥
भावार्थ
जो सत्यव्रतधारीपरोपकारी संन्यासी हो, सब विद्वान् लोग उसी के न्याययुक्त वेदानुकूल मार्ग परचलें और सब मिलकर उसी से प्रीति करें, जैसे सब ऋतुएँ और महीने आदि वर्ष मेंमिले रहते हैं ॥८॥
टिप्पणी
८−(समानम्) सम्+अन जीवने-घञ्। यद्वा सम्+आङ्+णीञ् प्रापणे-ड।एकम्। धार्मिकम् (अर्थम्) उषिकुषिगार्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। ऋ गतिप्रापणयोः-थन्।विचारम्। प्रयोजनम् (परि) सर्वतः (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (देवाः) विद्वांसः (संवत्सरम्) द्वादशमासात्मकं कालम् (वै) निश्चयेन (एतत्) अनेन प्रकारेण (ऋतवः)वसन्तादयः (अनुपरियन्ति) अनुसृत्य सर्वतः प्राप्नुवन्ति (व्रात्यम्)सत्यव्रतधारिणं पुरुषम् (च) समुच्चये ॥
विषय
अमृतत्वम्-आहुतिः
पदार्थ
१. (तस्य नात्यस्य) = उस व्रात्य के (समानं अर्थम्) = [सम् आनयति] पृथक् प्राणित करने के प्रयोजन को (देवाः परियन्ति) = सब देव-प्राकृतिक शक्तियाँ सर्वत: इसप्रकार प्राप्त होती हैं, जैसे (ऋतुव:) = ऋतुएँ (एतत् संवत्सरम्) = इस संवत्सर को (अनुपरियन्ति) = अनुक्रमेण प्रास होती हैं। ये (च) = और ये सब धातुएँ (वात्यम्) = व्रात्य को भी अनुकूलता से प्राप्त होती हैं। ऋतुओं की अनुकूलता से यह व्रात्य स्वस्थ बना रहता है। २. ये सब प्राकृतिक शक्तियाँ [देव] (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य के (यत् आदित्यं अभिसंविशन्ति) = ज्ञानसूर्य में अनुकूलता से प्रविष्ट होती है, (अमावास्यां च एव) = और निश्चय से उस व्रात्य की अमावास्या में-ज्ञानसूर्य व भक्तिरसरूप चन्द्र के समन्वय में प्रवेश करती हैं, (च तत्) = और तब (पौर्णमासीम) = पौर्णमासी में-जीवन को सोलह कलापूर्ण बनाने में, प्रवेश करती हैं, (तत्) = वे 'सब प्राकृतिक शक्तियों (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य को ज्ञानसूर्ययुक्त जीवनवाला बनाती है-इसके जीवन में ज्ञानसूर्य व भक्तिचन्द्र का समन्वय करना तथा इसे षोडश कला सम्पन्न जीवनवाला करना' (एषाम्) = इन देवों का (एकम्) = अद्वितीय कर्म है। यही (अमृतत्वम्) = अमृतत्व है। यही (आहुतिः एव) = परब्रह्म में व्रात्य का आहुत हो जाना है पूर्णरूप से अर्पित हो जाना।
भावार्थ
हम व्रात्य बनते हैं तो सब देव [प्राकृतिक शक्तियों] हमारे अनुकूल होते हुए हमें ज्ञानसूर्य से दीस जीवनवाला बनाते हैं। ये हमारे जीवन में ज्ञान व भक्ति के सूर्य और चन्द्र का सहवास कराते हैं तथा हमारे जीवन को सोलह कलापूर्ण करते हैं। यही अमृतत्व है, यही प्रभु के प्रति अर्पण है।
भाषार्थ
(तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रतपति तथा प्राणिवर्गों के हितकारी परमेश्वर के (समानम्) एक (अर्थम्) प्रयोजन को, (च) और (व्रात्यम्) व्रतपति तथा प्राणिवर्गों के हितकारी परमेश्वर को (अनु) लक्ष्य कर के, (देवाः) दिव्यगुणी जन, तथा त्रिलोकी के दिव्य तत्त्व अर्थात् ग्रह-उपग्रह सूर्यचन्द्र, तारा-नक्षत्रगण आदि (परि यन्ति) मानो परिक्रमाएं कर रहे हैं, (एतत्) इस प्रकार परिक्रमा कर रहे हैं, (वै) निश्चय से जैसे कि (ऋतवः) ऋतुएं (संवत्सरम्, अनु) संवत्सर को लक्ष्य कर, (परि यन्ति) मानो संवत्सर की परिक्रमा कर रही हैं।
टिप्पणी
[अर्थम् - सृष्टि की रचना का प्रयोजन है, जीवात्माओं पर परमेश्वरीय अनुग्रह अर्थात् कृपा तथा कर्मफल प्रदान द्वारा मोक्ष। यथा "अनुग्रहः संगः" (तत्त्वसमास सांख्यसूत्र १७)। इस अनुग्रह की दृष्टि से जड़ जगत् की सृष्टि हुई है, ताकि जीवात्माएं भोग समाप्ति पर समयान्तर में मोक्ष पा सकें। यह मोक्ष ही एक प्रयोजन है दिव्यगुणी तथा देवी जड़-सृष्टि का। "भोगापवर्गार्थ दृश्यम्" (योग २।१८) अर्थात् यह रचना, भोग और अपवर्ग अर्थात् मोक्ष के लिए है। भोग का भी अन्तिम लक्ष्य मोक्ष ही है। प्राकृतिक जगत् भी स्वमोक्ष और परमेश्वर की प्राप्ति के निमित्त मानो प्रयत्नशील है। यथा, - "क्व प्रेप्सन् दीप्यत ऊर्ध्वो अग्निः क्व प्रेप्सन पवते मातरिश्वा। यत्र प्रप्सन्तीरभि यन्त्यावृतः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः" इत्यादि (अथर्व० १०।७।४-६), अर्थात् "कहां जाने की इच्छा करती हुई अग्नि, ऊर्ध्व-ज्वाला वाली हो कर प्रदीप्त होती है, कहाँ जाने की इच्छा वाला वायु सतत गति कर रहा है। जहां जाने की इच्छा वाले वायु-भंवर गति कर रहे हैं, उसे स्कम्भ तथा जगदाधार कहो, वह आनन्दस्वरूप ही है"। कतमः= क (सुख)+ तमप् (सर्वातिशायी, सुखस्वरूप)। प्रलयकाल में प्रकृति, सर्जन से मानो मोक्ष पाकर, अपने प्रभु में लीन हो जाती है ]
विषय
व्रात्य प्रजापति के सात व्यान।
भावार्थ
(संवत्सरं वा अनु) जिस प्रकार संवत्सर के आश्रय में (ऋतवः) ऋतुगण (परि यन्ति) रहते हैं उसी प्रकार (तस्य व्रात्यस्य) उस व्रात्य प्रजापति के विषय में भी जानना चाहिये कि (देवाः) समस्त दिव्य पदार्थ (समानम् अर्थम् व्रात्यं च परि यन्ति) अपने समान स्तुति योग्य पदार्थ और व्रात्य प्रजापति के आश्रय होकर रहते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१, ५ प्राजापत्योष्णिहौ, २ आसुर्यनुष्टुभौ, ३ याजुषी पंक्तिः ४ साम्न्युष्णिक्, ६ याजुषीत्रिष्टुप्, ८ त्रिपदा प्रतिष्ठार्ची पंक्तिः, ९ द्विपदा साम्नीत्रिष्टुप्, १० सामन्यनुष्टुप्। दशर्चं सप्तदशं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Vratya-Prajapati daivatam
Meaning
Of the Vratya, the divinities serve and accomplish the purpose, one common to all things. They go round and round like the cycle of the seasons going round the year, or like all of them circumambulating the Vratya itself.
Translation
Of that Vratya; the enlightened ones go around him with one and the same purpose, just as the seasons go around following the year as well as the Vratya.
Translation
With the same and similar objects Devah, the twelve Adityas go round the year and the seasons go round the year and also the Vratya.
Translation
The learned acquire the religious views of the philanthropic guest, and verily follow him as seasons do the year.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
८−(समानम्) सम्+अन जीवने-घञ्। यद्वा सम्+आङ्+णीञ् प्रापणे-ड।एकम्। धार्मिकम् (अर्थम्) उषिकुषिगार्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। ऋ गतिप्रापणयोः-थन्।विचारम्। प्रयोजनम् (परि) सर्वतः (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (देवाः) विद्वांसः (संवत्सरम्) द्वादशमासात्मकं कालम् (वै) निश्चयेन (एतत्) अनेन प्रकारेण (ऋतवः)वसन्तादयः (अनुपरियन्ति) अनुसृत्य सर्वतः प्राप्नुवन्ति (व्रात्यम्)सत्यव्रतधारिणं पुरुषम् (च) समुच्चये ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal