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अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 17 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 9
    ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
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    तस्य॒व्रात्य॑स्य। यदा॑दि॒त्यम॑भिसंवि॒शन्त्य॑मावा॒स्यां चै॒व तत्पौ॑र्णमा॒सीं च॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । यत् । आ॒दि॒त्यम् । अ॒भि॒ऽसं॒वि॒शन्ति॑ । अ॒मा॒ऽवा॒स्या᳡म् । च॒ । ए॒व । तत् । पौ॒र्ण॒ऽमा॒सीम् । च॒॥१७.९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्यव्रात्यस्य। यदादित्यमभिसंविशन्त्यमावास्यां चैव तत्पौर्णमासीं च॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्य । व्रात्यस्य । यत् । आदित्यम् । अभिऽसंविशन्ति । अमाऽवास्याम् । च । एव । तत् । पौर्णऽमासीम् । च॥१७.९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 17; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] के−(आदित्यम्) प्रकाशमान गुण में (यत्) जब (अभिसंविशन्ति) वे [विद्वान्-मन्त्र ८] सब ओर से यथावत् प्रवेश करतेहैं, (तत् एव) तब ही (अमावास्याम्) साथ-साथ बसने की क्रिया में (च च) और (पौर्णमासीम्) पूरे नापने [निश्चय करने] की क्रिया में [वे प्रवेश करते हैं] ॥९॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग आप्तसंन्यासी अतिथि के सत्सङ्ग से परस्पर उपकार और पदार्थों की परीक्षा आदिविद्याएँ ग्रहण करें ॥९॥

    टिप्पणी

    ९−(यत्) यदा (आदित्यम्) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२।आङ्+दीपी दीप्तौ-यक्। पृषोदरादिरूपम्। आदीप्यमानं गुणम् (अभिसंविशन्ति) अभितःसर्वतः सम्यक् प्रविशन्ति। प्राप्नुवन्ति ते देवाः-म० ८ (अमावास्याम्) अ०७।७९।१। अमावस्यदन्यतरस्याम्। पा० ३।१।१२२। अमा+वस निवासे-ण्यत्, टाप्। अमा सहनिवसन्ति प्राणिनो यस्यां क्रियायां ताम् (च) (एव) (तत्) तदा (पौर्णमासीम्) अ०७।८०।१। पूर्ण+मसी परिणामे परिमाणे च-घञ्। पूर्णमासादण्। वा० पा० ४।२।३५।पूर्णमास-अण्। पूर्णो मासः परिमाणं परीक्षणं यस्यां क्रियायां ताम् (च) ॥

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    विषय

    अमृतत्वम्-आहुतिः

    पदार्थ

    १. (तस्य नात्यस्य) = उस व्रात्य के (समानं अर्थम्) = [सम् आनयति] पृथक् प्राणित करने के प्रयोजन को (देवाः परियन्ति) = सब देव-प्राकृतिक शक्तियाँ सर्वत: इसप्रकार प्राप्त होती हैं, जैसे (ऋतुव:) = ऋतुएँ (एतत् संवत्सरम्) = इस संवत्सर को (अनुपरियन्ति) = अनुक्रमेण प्रास होती हैं। ये (च) = और ये सब धातुएँ (वात्यम्) = व्रात्य को भी अनुकूलता से प्राप्त होती हैं। ऋतुओं की अनुकूलता से यह व्रात्य स्वस्थ बना रहता है। २. ये सब प्राकृतिक शक्तियाँ [देव] (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य के (यत् आदित्यं अभिसंविशन्ति) = ज्ञानसूर्य में अनुकूलता से प्रविष्ट होती है, (अमावास्यां च एव) = और निश्चय से उस व्रात्य की अमावास्या में-ज्ञानसूर्य व भक्तिरसरूप चन्द्र के समन्वय में प्रवेश करती हैं, (च तत्) = और तब (पौर्णमासीम) = पौर्णमासी में-जीवन को सोलह कलापूर्ण बनाने में, प्रवेश करती हैं, (तत्) = वे 'सब प्राकृतिक शक्तियों (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य को ज्ञानसूर्ययुक्त जीवनवाला बनाती है-इसके जीवन में ज्ञानसूर्य व भक्तिचन्द्र का समन्वय करना तथा इसे षोडश कला सम्पन्न जीवनवाला करना' (एषाम्) = इन देवों का (एकम्) = अद्वितीय कर्म है। यही (अमृतत्वम्) = अमृतत्व है। यही (आहुतिः एव) = परब्रह्म में व्रात्य का आहुत हो जाना है पूर्णरूप से अर्पित हो जाना।

    भावार्थ

    हम व्रात्य बनते हैं तो सब देव [प्राकृतिक शक्तियों] हमारे अनुकूल होते हुए हमें ज्ञानसूर्य से दीस जीवनवाला बनाते हैं। ये हमारे जीवन में ज्ञान व भक्ति के सूर्य और चन्द्र का सहवास कराते हैं तथा हमारे जीवन को सोलह कलापूर्ण करते हैं। यही अमृतत्व है, यही प्रभु के प्रति अर्पण है।

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    भाषार्थ

    (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रतपति तथा प्राणिवर्गों के हितकारी परमेश्वर के (अदित्यम्) आदित्य में, (यद्) जब (अभि संविशन्ति) दिव्यगुणी उपासक (मन्त्र ८) साक्षात् सम्यक् प्रवेश पाते हैं, (तद) तब वे (अमावास्याम्, च) कृष्णपक्ष से उपलक्षित पितृयाण मार्ग को (च) और या (पौर्णमासीम्) शुल्कपक्ष से उपलक्षित देवयान मार्ग को (अभि संविशन्ति) प्रथम प्राप्त होते है।

    टिप्पणी

    [आदित्यम्= सौरमण्डल, आदित्य से पैदा हुआ है और प्रलय में आदित्य में ही लीन होगा। आदित्य में स्थित आदित्यनामक (यजु० ३२।१) परमेश्वर, आदित्य द्वारा, सौरमण्डल का नियन्त्रण कर रहा है। योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्। ओ३म् खं ब्रह्म॥ (यजु० ४०।१७)। मुक्त जीवात्माएं, शुल्क पक्ष और कृष्णपक्ष अर्थात् देवयान मार्ग और पितृयाण मार्ग द्वारा, आदित्य में प्रवेश कर, आदित्यनामक परमेश्वर में रमण करती हैं। यथा "अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छति" (छा० उप० अध्या० ८। खं० ५)। इस खण्ड द्वारा प्रतीत होता है कि जीवात्मा, शरीर छोड़ कर, रश्मियों द्वारा ऊपर की ओर आक्रमण कर आदित्य को प्राप्त होते हैं। पितृयाणमार्गी भी या तो सीधे या परम्परया भवसागर से तैर जाते हैं। यथा "ततं तन्तुमन्वेके तरन्ति येषां दत्तं पित्र्यमायनेन" (अथर्व० ६।१२२।२), अर्थात् गृहस्थयज्ञ का विस्तार करने के पश्चात् कई गृहस्थी भी तैर जाते हैं, जो कि विधिपूर्वक पितृ-ऋण चुका देते हैं। आदित्य पद परमेश्वरवाचक भी है (यजु० ३२।१)। अभिसंविशन्ति = "आत्मनात्मानमभि सं विवेश" (यजु० ३२।११) द्वारा भी प्रतीत होता है कि मोक्ष में जीवात्मा, केवल आत्मस्वरूप से, परमात्मा में प्रवेश पाता है]।

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    विषय

    व्रात्य प्रजापति के सात व्यान।

    भावार्थ

    (यत्) जिस प्रकार (देवाः आदित्यम्) देव = किरणें सूर्य में प्रवेश करती हैं और जिस प्रकार (अमावास्याम्) अमावास्या में सब चन्द्रः कलाएं लुप्त हो जाती हैं या सूर्य और चन्द्र एक साथ रहते हैं और (पौर्णमासींम् च) जिस प्रकार पौर्णमासी में समस्त चन्द्र कलाएं एकत्र हो जाती है (तत्) उसी प्रकार ये समस्त देवगण मुमुक्षु ज्ञानी लोग (तस्य व्रात्यस्य) उस व्रात्य प्रजापति के (आदित्यम्) आदित्य के समान प्रकाशमान स्वरूप में (अभि सं विशन्ति) प्रवेश करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १, ५ प्राजापत्योष्णिहौ, २ आसुर्यनुष्टुभौ, ३ याजुषी पंक्तिः ४ साम्न्युष्णिक्, ६ याजुषीत्रिष्टुप्, ८ त्रिपदा प्रतिष्ठार्ची पंक्तिः, ९ द्विपदा साम्नीत्रिष्टुप्, १० सामन्यनुष्टुप्। दशर्चं सप्तदशं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vratya-Prajapati daivatam

    Meaning

    Whatever the forms and phases of that Vratya, they, all living beings, enter the Sun, the self-refulgent One, whether they enter Amavasya, the dark night by the path of the progenitors, or Paurnamasi, the full moon light by the path of the Divinities.

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    Translation

    Of that Vratya; as they enter into the sun on the new-moon's night, so that do on the full moon's night as well.

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    Translation

    Whatever intentions or things of that Vratya enter into the sun also enter into the Amavasya and Paurnamasi.

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    Translation

    When they follow the renowned virtues of the learned guest, they learn the art of cooperation and analyzing and examining things.

    Footnote

    They: The learned persons.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ९−(यत्) यदा (आदित्यम्) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२।आङ्+दीपी दीप्तौ-यक्। पृषोदरादिरूपम्। आदीप्यमानं गुणम् (अभिसंविशन्ति) अभितःसर्वतः सम्यक् प्रविशन्ति। प्राप्नुवन्ति ते देवाः-म० ८ (अमावास्याम्) अ०७।७९।१। अमावस्यदन्यतरस्याम्। पा० ३।१।१२२। अमा+वस निवासे-ण्यत्, टाप्। अमा सहनिवसन्ति प्राणिनो यस्यां क्रियायां ताम् (च) (एव) (तत्) तदा (पौर्णमासीम्) अ०७।८०।१। पूर्ण+मसी परिणामे परिमाणे च-घञ्। पूर्णमासादण्। वा० पा० ४।२।३५।पूर्णमास-अण्। पूर्णो मासः परिमाणं परीक्षणं यस्यां क्रियायां ताम् (च) ॥

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