अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 34/ मन्त्र 1
ऋषिः - अङ्गिराः
देवता - जङ्गिडो वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - जङ्गिडमणि सूक्त
244
जा॑ङ्गि॒डोऽसि॑ जङ्गि॒डो रक्षि॑तासि जङ्गि॒डः। द्वि॒पाच्चतु॑ष्पाद॒स्माकं॒ सर्वं॑ रक्षतु जङ्गि॒डः ॥
स्वर सहित पद पाठज॒ङ्गि॒डः। अ॒सि॒। ज॒ङ्गि॒डः। रक्षि॑ता। अ॒सि॒। ज॒ङ्गि॒डः। द्वि॒ऽपात्। चतुः॑ऽपात्। अ॒स्माक॑म्। सर्व॑म्। र॒क्ष॒तु॒। ज॒ङ्गि॒डः ॥३४.१॥
स्वर रहित मन्त्र
जाङ्गिडोऽसि जङ्गिडो रक्षितासि जङ्गिडः। द्विपाच्चतुष्पादस्माकं सर्वं रक्षतु जङ्गिडः ॥
स्वर रहित पद पाठजङ्गिडः। असि। जङ्गिडः। रक्षिता। असि। जङ्गिडः। द्विऽपात्। चतुःऽपात्। अस्माकम्। सर्वम्। रक्षतु। जङ्गिडः ॥३४.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सबकी रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
[हे औषध !] तू (जङ्गिडः) जङ्गिड [संचार करनेवाला] (जङ्गिडः) जङ्गिड [संचार करनेवाला औषध] (असि) है, तू (जङ्गिडः) जङ्गिड [संचार करनेवाला] (रक्षिता) रक्षक (असि) है। (जङ्गिडः) जङ्गिड [संचार करनेवाला औषध] (अस्माकम्) हमारे (सर्वम्) सब (द्विपात्) दोपाये और (चतुष्पात्) चौपाये की (रक्षतु) रक्षा करे ॥१॥
भावार्थ
जङ्गिड उत्तम औषध विशेष शरीर में प्रविष्ट होकर रुधिर का संचार करके रोग को मिटाता है, मनुष्य उसके सेवन से स्वास्थ्य बढ़ावें ॥१॥
टिप्पणी
इस सूक्त का मिलान करो-अ०२।४।१-६॥१−(जङ्गिडः) अ०२।४।१। अजिरशिशिरशिथिल०। उ०१।५३। गमेर्यङ्लुगन्तात्-किरच् स च डित्, रस्य डः। जङ्गमः। रुधिरसंचारक औषधविशेषः (असि) (जङ्गिडः) (रक्षिता) रक्षकः (असि) (जङ्गिडः) (द्विपात्) पादद्वयोपेतं प्राणिजातम् (चतुष्पात्) पादचतुष्टयोपेतं गोमहिष्यादिकम् (अस्माकम्) (सर्वम्) (रक्षतु) पालयतु (जङ्गिडः) ॥
विषय
जङ्गिड
पदार्थ
१. हे वीर्य! तू (जङ्गिड:) = [जंगिरति] उत्पन्न हुए-हुए रोगों को निगल जानेवाला (असि) = है। (रक्षिता असि) = तू रक्षक है। सचमुच जङ्गिड:-[जयति गिरति] जीतनेवाला व शत्रुओं को निगल जानेवाला है। २. यह (जङ्गिड:) = जङ्गिड नामक वीर्यमणि (अस्माकम्) = हमारे (सर्वम्) = सब (द्विपात् चतुष्यात्) = मनुष्यों व पशुओं को (रक्षतु) = रक्षित करे।
भावार्थ
बीर्य शरीर में गति करता हुआ रोगरूप शत्रुओं का बाधन करता है, उत्पन्न रोगों को नष्ट करता है। इसप्रकार यह हमारा रक्षक है। इसी से इसे 'जङ्गिड' नाम से स्मरण किया गया है।
भाषार्थ
(जङ्गिडः असि) तेरा नाम जङ्गिड है, (जङ्गिडः) क्योंकि तू उत्पन्न रोगों को निगल जाती है; (रक्षिता असि) तू रक्षा करती है, (जङ्गिडः) उत्पन्न रोगों को निगल जाती है। (जङ्गिडः) जङ्गिड (अस्माकम्) हमारे (सर्वम्) सब (द्विपाद्) दो-पाद मनुष्यों (चतुष्पाद्) और चौपाए गौ आदि पशुओं की (रक्षतु) रोगों से रक्षा करे।
टिप्पणी
[जङ्गिडः= “जम्” उत्पन्नं रोगं “गिरति” निगिरति सः। रलयोरभेदः, डलयोरभेदः। जङ्गिरः= जङ्गिलः=जङ्गिडः। जम्+गिर (गॄनिगरणे)। जङ्गिड-औषध, कृषिजनित पदार्थों के रसों से प्राप्त होती है। यथा—“शणश्च मा जङ्गिडश्च विष्कन्धादभि रक्षताम्। अरण्यादन्य आभृतः कृष्या अन्यो रसेभ्यः” (अथर्व० २.४.५)। इस मन्त्र में शण (सन) और जङ्गिड का वर्णन है। शण तो जङ्गल से प्राप्त होता है, और कृषि के रसों से जङ्गिड प्राप्त होता है। विष्कन्ध रोग है— “सूखा रोग” अर्थात् शरीर या शरीरङ्ग का सूख जाना। स्कन्दिर गतौ, शोषणे च। शण के क्वाथ के साथ, जङ्गिड का सेवन विष्कन्ध रोग में सम्भवतः अत्युपकारी हो।]
विषय
जंगिड़ नामक रक्षक का वर्णन।
भावार्थ
हे जंगिड ! वनस्पते ! आश्रय वृक्ष के समान प्रजाके रक्षक ! तू (जंगिडः असि) जंगिड अर्थात् शत्रुओं के निगलने वाला अतएव (जंगिडः) ‘तू सचमुच’ जंगिड है। तू (जंगिडः) जंगिड होकर ही (रक्षिता असि) प्रजा का रक्षक है (अस्माकम्) हमारे (द्विपात्) दो पाये और (चतुष्पाद्) चौपाये (सर्वम्) सबको (जंगिडः रक्षतु) जंगिड ही रक्षा करे। ‘जगिड’ के विषय में विशेष विवरण देखो अथर्व० का० २। सू० ४॥ ‘जातानां निगरणकर्त्ता असि अतो’ ‘जंगिड’ इत्युच्यते। यद्वा जंगम्यत शत्रून् बाधितुम् इति जंगिडः। *अथवा जनेर्जयतेर्वाडप्रप्ताये ‘ज’ इति भवति। जं गिरतीति जंगिरः। कपिलकादित्वात् लत्वम्। पूर्वपदस्थस्य सुपो लुगभावश्च्छान्दसः। खच् प्रत्ययो वा द्रष्टव्यः। इति सायणः॥ उत्पन्न हुए प्राणियों को निगलने वाला या शत्रुओं पर चढ़ाई करने वाला या विजयी लोगों को भी निगलने वाला वीर पुरुष ‘जंगिड’ कहाता है।
टिप्पणी
गभेर्यङ्लुन्ताद्रूपसिद्धिः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अंगिरा ऋषिः। वनस्पतिलिंगोक्तो वा देवता। अनुष्टुभः। दशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Jangida Mani
Meaning
O Jangida, you are Jangida, devourer of disease. You are Jangida, the protector. May Jangida protect our bipeds and our quadrupeds.
Subject
The Jangida plant : For protection
Translation
O jangida, you are devourer of evil plotters. You are a protector, O jafigida. May the jangida protect our all the bipeds and the quadrupeds.
Translation
O man, you doing heroic deeds through Darbha, taking it in your use you never be down or troubled in spirit. You having your control on others with: splendor illumine the four quarters like the sun.
Translation
O Jangida herb, thou art the consumer of all destructive forces in the form of germs, the secret weapons like mines etc., employed by the enemies. O jangida, thou art the protector. Let jangida guard all our men and cattle.
Footnote
The superfine properties of Jangida are also worth research. They are mentioned to be so potent in removing so many fatal diseases.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
इस सूक्त का मिलान करो-अ०२।४।१-६॥१−(जङ्गिडः) अ०२।४।१। अजिरशिशिरशिथिल०। उ०१।५३। गमेर्यङ्लुगन्तात्-किरच् स च डित्, रस्य डः। जङ्गमः। रुधिरसंचारक औषधविशेषः (असि) (जङ्गिडः) (रक्षिता) रक्षकः (असि) (जङ्गिडः) (द्विपात्) पादद्वयोपेतं प्राणिजातम् (चतुष्पात्) पादचतुष्टयोपेतं गोमहिष्यादिकम् (अस्माकम्) (सर्वम्) (रक्षतु) पालयतु (जङ्गिडः) ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal