अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 34/ मन्त्र 7
ऋषिः - अङ्गिराः
देवता - जङ्गिडो वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - जङ्गिडमणि सूक्त
60
न त्वा॒ पूर्वा॒ ओष॑धयो॒ न त्वा॑ तरन्ति॒ या नवाः॑। विबा॑ध उ॒ग्रो ज॑ङ्गि॒डः प॑रि॒पाणः॑ सुम॒ङ्गलः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठन। त्वा॒। पूर्वाः॑। ओष॑धयः। न। त्वा॒। त॒र॒न्ति॒। याः। नवाः॑। विऽबा॑धः। उ॒ग्रः। ज॒ङ्गि॒डः। प॒रि॒ऽपानः॑। सु॒ऽम॒ङ्गलः॑ ॥३४.७॥
स्वर रहित मन्त्र
न त्वा पूर्वा ओषधयो न त्वा तरन्ति या नवाः। विबाध उग्रो जङ्गिडः परिपाणः सुमङ्गलः ॥
स्वर रहित पद पाठन। त्वा। पूर्वाः। ओषधयः। न। त्वा। तरन्ति। याः। नवाः। विऽबाधः। उग्रः। जङ्गिडः। परिऽपानः। सुऽमङ्गलः ॥३४.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सबकी रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
(न) न तो (त्वा) तुझसे (पूर्वाः) पहिली और (न) न (त्वा) तुझसे (याः) जो (नवाः) नवीन (ओषधयः) ओषधें हैं, (तरन्ति) वे बढ़कर हैं। (जङ्गिडः) जङ्गिड [संचारक औषध] (विबाधः) [रोगों का] विशेष रोकनेवाला, (उग्रः) उग्र (परिपाणः) सर्वथा रक्षक और (सुमङ्गलः) बड़ा मङ्गलकारी है ॥७॥
भावार्थ
जङ्गिड औषध सब औषधों में श्रेष्ठ और बड़ा स्वास्थ्यकारक है ॥७॥
टिप्पणी
७−(न) निषेधे (त्वा) (पूर्वाः) आद्याः (न) (त्वा) (तरन्ति) अभिभवन्ति (याः) ओषधयः (नवाः) नूतनाः (विबाधः) विशेषेण बाधकः (उग्रः) प्रचण्डः (जङ्गिडः) म०१। संचारक औषधविशेषः (परिपाणः) सर्वतो रक्षकः (सुमङ्गलः) बहुमङ्गलकरः ॥
विषय
परिपाण: सुमंगल:
पदार्थ
१. (न) = न तो (त्वा) = तुझे (पूर्वाः ओषधयः) = पुरानी ओषधियों और (न त्वा) = न ही तुझे (या:) = जो (नवा:) = नई ओषधियाँ हैं वे (तरन्ति) = तैर पाती है। कई वस्तुएँ पुरानी होकर औषध के दृष्टिकोण से अधिक महत्त्ववाली हो जाती हैं और कईयों में ताजेपन में ही अधिक गुण होता है। वे ही यहाँ 'पूर्वाः तथा नवा:' शब्दों से कही गई हैं। इनमें से कोई भी जंगिड [वीर्य] की तुलना नहीं कर पाती। जंगिड इन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। २. यह (विवाधः) = विशेषरूप से रोगरूप शत्रुओं का बाधन करता है। (उग्रः) = अति तेजस्वी है। (जंगिड:) =-शत्रु-बाधन के लिए शरीर में खूब ही गति करता है। (परिपाण:) = यह सब ओर से रक्षित करनेवाला है और (सुमंगल:) = उत्तम मंगल का साधन है।
भावार्थ
शरीर में सुरक्षित वीर्य सर्वोत्तम औषध है। यह शत्रुओं का बाधन करता है और हमारा सर्वत: रक्षण करता है।
भाषार्थ
(पूर्वाः) पूर्वोत्पन्न (ओषधयः) ओषधियां (त्वा) तुझ से (तरन्ति न) बढ़कर नहीं हैं, (याः) और जो (नवाः) नवीन ओषधियां हैं, वे भी (त्वा) तुझ से (तरन्ति न) बढ़कर नहीं हैं। (जङ्गिडः) जङ्गिड औषध (विबाधः) रोगों को विशेषरूप से रोकती है, (उग्रः) प्रभाव में उग्र है, (परिपाणः) सब प्रकार से रक्षा करती है, (सुमंगलः) बड़ी मंगलकारिणी है।
विषय
जंगिड़ नामक रक्षक का वर्णन।
भावार्थ
(पूर्वाः) पूर्वकाल में या, तुझसे पूर्व उत्पन्न हुईं (ओषधयः) सन्तापदायी शक्तियां और (याः नवाः) जो नयी शक्तियां भी उत्पन्न हैं वे भी (त्वा) तुझको (न तरन्ति) पार नहीं करतीं। तू स्वयं (उग्रः) उग्र, अति तीव्र और बलवान् होकर (जंगिड़ः) शत्रुओं की शक्तियों को निगल जाने वाला (परिपाणः) सब ओर से अपनी रक्षा करता हुआ और (सुमङ्गलः) शुभ, मङ्गलस्वरूप होकर शत्रुओं को (विबाध) विविध प्रकार से पीड़ित कर, नाश कर।
टिप्पणी
(द्वि०) ‘नवा’ इति क्वचित्। ‘जङ्गिड’ इति सायणाभिमतः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अंगिरा ऋषिः। वनस्पतिलिंगोक्तो वा देवता। अनुष्टुभः। दशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Jangida Mani
Meaning
Neither the old medications nor the latest excel and out-date you, Jangida, being the preventive, the strong, the protector, the auspicious immunizes
Translation
Not the ancient plants, nor those of recent origin surpass you; strong resister and formidable jangida is an auspicious and effective defence.
Translation
The learned process this Jangida stationed on earth in “these ways. The learned ones endowed with complete knowledge know this Jangida as Angirah, the beat present in all the structures of the world.
Translation
Neither the herbs that have grown before thee, nor those that are new ones, can surpass thee in efficacy. Thou art, O Jangida, the tormentor of the evil forces, germs etc., fierce, consumer of all inimical elements, all-round protector, and showerer of fortune and happiness in a pleasant manner.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
७−(न) निषेधे (त्वा) (पूर्वाः) आद्याः (न) (त्वा) (तरन्ति) अभिभवन्ति (याः) ओषधयः (नवाः) नूतनाः (विबाधः) विशेषेण बाधकः (उग्रः) प्रचण्डः (जङ्गिडः) म०१। संचारक औषधविशेषः (परिपाणः) सर्वतो रक्षकः (सुमङ्गलः) बहुमङ्गलकरः ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal