अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 34/ मन्त्र 5
ऋषिः - अङ्गिराः
देवता - जङ्गिडो वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - जङ्गिडमणि सूक्त
50
स ज॑ङ्गि॒डस्य॑ महि॒मा परि॑ णः पातु वि॒श्वतः॑। विष्क॑न्धं॒ येन॑ सा॒सह॒ संस्क॑न्ध॒मोज॒ ओज॑सा ॥
स्वर सहित पद पाठसः। ज॒ङ्गि॒डस्य॑। म॒हिमा॑। परि॑। नः॒। पा॒तु॒। वि॒श्वतः॑। विऽस्क॑न्धम्। येन॑। स॒सह॑। सम्ऽस्क॑न्धम्। ओजः॑। ओज॑सा ॥३४.५॥
स्वर रहित मन्त्र
स जङ्गिडस्य महिमा परि णः पातु विश्वतः। विष्कन्धं येन सासह संस्कन्धमोज ओजसा ॥
स्वर रहित पद पाठसः। जङ्गिडस्य। महिमा। परि। नः। पातु। विश्वतः। विऽस्कन्धम्। येन। ससह। सम्ऽस्कन्धम्। ओजः। ओजसा ॥३४.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सबकी रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
(जङ्गिडस्य) जङ्गिड [संचार करनेवाले औषध] की (सः) वह (महिमा) महिमा (नः) हमें (विश्वतः) सब ओर से (परिपातु) पालती रहे। (येन) जिस [महिमा] से (ओजः) पराक्रमरूप उस [जङ्गिड] ने (ओजसा) बलपूर्वक (विष्कन्धम्) विष्कन्ध [विशेष सुखानेवाले वात रोग] को और (संस्कन्धम्) संस्कन्ध [सब शरीर में व्यापनेवाले महावात रोग] को (सासह) दबाया है ॥५॥
भावार्थ
जङ्गिड औषध के उपयोग से सब प्रकार के वात रोग मिटते हैं ॥५॥
टिप्पणी
५−(सः) पूर्वोक्तः (जङ्गिडस्य) संचारकमहौषधस्य (महिमा) महत्वम् (नः) अस्मान् (परिपातु) पालयतु (विश्वतः) सर्वतः (विष्कन्धम्) वि+स्कन्दिर् गतिशोषणयोः-घञ्, दस्य धः। विशेषेण शोषकं वातरोगम् (येन) महिम्ना (सासह) अभिबभूव (संस्कन्धम्) समस्तशरीरव्यापकं वातरोगम् (ओजः) पराक्रमरूपो जङ्गिडः (ओजसा) प्रभावेण ॥
विषय
'विष्कन्ध व संस्कन्ध' दूषण
पदार्थ
१. (जङ्गिडस्य) = रोगरूप शत्रुओं के बाधन के लिए शरीर में गति करनेवाले जंगिड [वीर्य] की (स:) = वह (महिमा) = महिमा (न:) = हमें (विश्वत:) = सब ओर से (परिपातु) = रक्षित करे, २. (येन) = जिस महिमा से यह (ओजः) = शक्तिरूप जंगिडमणि (ओजसा) = ओजस्विता के साथ (विष्कन्धं संस्कन्धम्) = विष्कन्ध व संस्कन्ध नामक वात रोगों को (सासह) = पराभूत करता है। विष्कन्ध' में स्कन्ध फटते से प्रतीत होते हैं, 'संस्कन्ध' में कन्धे जुड़-से गये प्रतीत होते हैं। वीर्यशक्ति ठीक होने पर ये रोग भाग जाते हैं।
भावार्थ
शरीर में सुरक्षित वीर्य 'विष्कन्ध व संस्कन्ध' नामक भयंकर वातरोगों को उन्मूलित कर देता है।
भाषार्थ
(जङ्गिडस्य) जङ्गिड-औषध की (सः) वह (महिमा) महिमा (विश्वतः) सब ओर से, और सब प्रकार से (नः) हमारी (परि पातु) पूर्ण रक्षा करे। (येन) जिस महिमा के कारण, (ओजः) ओजोमय जङ्गिड औषध ने (ओजसा) निज प्रभाव द्वारा (विष्कन्धम्) विविध अङ्गों के सूखा रोग को, तथा (संस्कन्धम्) समग्र शरीरव्यापी सूखा रोग को (सासह) पराभूत किया है।
विषय
जंगिड़ नामक रक्षक का वर्णन।
भावार्थ
(सः) वह (जङ्गिडस्य) पूर्वोक्त शत्रुविजयी राजा का (महिमा) महान् सामर्थ्य है जो (नः) हमें (विश्वतः परिपातु) सब ओर से रक्षा करे। (येन) जिस सामर्थ्य से (विष्कन्धं) सेना के पृथक् पृथक् निवेशों या दस्तों को और (संस्कन्धम् ओजः) शत्रु सेना के संयुक्त सेनाबल के वीर्य को भी अपने (ओजसा) वीर्य से (सासह) धर दबाता है।
टिप्पणी
(तृ०) ‘ससहे’ इति क्वचित्। ‘सासहा’ (च०) ‘आजोजसा’ इति पैप्प० सं०। ‘येन सहसं—’ इति सायणाभिमतः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अंगिरा ऋषिः। वनस्पतिलिंगोक्तो वा देवता। अनुष्टुभः। दशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Jangida Mani
Meaning
That is the greatness of vigorous and lustrous Jangida by which it may, we wish and pray, protect us all round all ways, the same lustre and grandeur by which it fights and roots out Vishkandha and Samskandha, partial as well as the total debility of the body system.
Translation
May such great power of the jañgide protect us all around, wherewith it overcomes viskandha (splitting pain in shoulders) and intense sanskandha (curing in the shoulders) with its might.
Translation
This Jangida is in truth an antidote of piercing pain, it is the of diseases, this Jangida is victorious and let it prolong our life.
Translation
That is the great importance of Jangida, that it may protect us from all sides. It is its efficacious power, by which it is able to suppress fatal diseases like acute rheumatism in the neck and the shoulder.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(सः) पूर्वोक्तः (जङ्गिडस्य) संचारकमहौषधस्य (महिमा) महत्वम् (नः) अस्मान् (परिपातु) पालयतु (विश्वतः) सर्वतः (विष्कन्धम्) वि+स्कन्दिर् गतिशोषणयोः-घञ्, दस्य धः। विशेषेण शोषकं वातरोगम् (येन) महिम्ना (सासह) अभिबभूव (संस्कन्धम्) समस्तशरीरव्यापकं वातरोगम् (ओजः) पराक्रमरूपो जङ्गिडः (ओजसा) प्रभावेण ॥
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