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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 43 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 43/ मन्त्र 2
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - मन्त्रोक्ताः, ब्रह्म छन्दः - त्र्यवसाना शङ्कुमती पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - ब्रह्मा सूक्त
    46

    यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह। वा॒युर्मा॒ तत्र॑ नयतु वा॒युः प्र॒णान्द॑धातु मे। वा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत्र॑। ब्र॒ह्म॒ऽविदः॑। यान्ति॑। दी॒क्षया॑। तप॑सा। स॒ह। वा॒युः। मा॒। तत्र॑। न॒य॒तु॒। वा॒युः। प्रा॒णान्। द॒धा॒तु॒। मे॒। वा॒यवे॑। स्वाहा॑ ॥४३.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह। वायुर्मा तत्र नयतु वायुः प्रणान्दधातु मे। वायवे स्वाहा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत्र। ब्रह्मऽविदः। यान्ति। दीक्षया। तपसा। सह। वायुः। मा। तत्र। नयतु। वायुः। प्राणान्। दधातु। मे। वायवे। स्वाहा ॥४३.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 43; मन्त्र » 2
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    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (यत्र) जिस [सुख] में (ब्रह्मविदः) ब्रह्मज्ञानी........ [मन्त्र १]। (वायुः) वायु [पवन के समान शीघ्रगामी परमात्मा] (मा) मुझको (तत्र) वहाँ (नयतु) पहुँचावे, (वायुः) वायु [परमात्मा] (मे) मुझे (प्राणान्) प्राणों को (दधातु) देवे, (वायवे) वायु [परमात्मा] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] होवे ॥२॥

    भावार्थ

    मन्त्र १ के समान है ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(वायुः) वायुसमानशीघ्रगामी परमात्मा (वायुः) (प्राणान्) जीवनसाधनानि (दधातु) ददातु (मे) मह्यम् (वायवे) शीघ्रगामिने परमात्मने (स्वाहा) सुवाणी। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    भाषार्थ

    (दीक्षया) व्रतों-नियमों और (तपसा सह) तपश्चर्या के साथ वर्तमान (ब्रह्मविदः) ब्रह्मवेत्ता लोग (यत्र) जहाँ (यान्ति) जाते हैं, (तत्र) वहाँ (वायुः) वायुवत् प्राणप्रदाता परमेश्वर (मा) मुझे (नयतु) पहुँचाए, ले चले। तदर्थ (वायुः) प्राणप्रदाता परमेश्वर (मे) मुझ में (प्राणान्) प्राणों को (दधातु) स्थापित और परिपुष्ट करे। (वायवे) प्राणप्रदाता परमेश्वर के लिए (स्वाहा) मैं सर्वस्व समर्पण करता हूँ।

    टिप्पणी

    [वायुः= परमेश्वर (मन्त्र १ की व्याख्या देखो। तथा “वाति गच्छति जानाति वेति वायुः, पवनः परमेश्वरो वा” (उणा० १.१) दयानन्द भाष्य। प्राणशक्ति के बिना दीक्षा और तप नहीं हो सकते। दीक्षा और तप के बिना वहाँ पहुँचना असम्भव है, जहाँ कि ब्रह्मवेत्ता लोग, मोक्ष पा कर, जाते और विचरते हैं।]

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    विषय

    वायु-प्राण

    पदार्थ

    १. (यत्र) = जहाँ (ब्रह्मविदः) = ब्रह्मज्ञानी पुरुष (दीक्षया तपसा सह) = व्रतसंग्रह व तप के द्वारा (यान्ति) = जाते हैं, (वायु:) = निरन्तर गति के द्वारा बुराइयों का संहार करनेवाला प्रभु [वा गतिगन्धनयोः] (मा) = मुझे (तत्र नयन्तु) = वहाँ प्राप्त कराए। २. इसी दृष्टिकोण से (वायु:) = यह वायुनामक प्रभु (मे) = मेरे लिए प्(राणान् दधातु) = प्राणों का धारण करें। प्राणशक्ति के बिना उत्तम लोकों ने क्या प्राप्त होना? (वायवे स्वाहा) = इस वायु नामक प्रभु के लिए हम अपना अर्पण करते हैं।

    भावार्थ

    वायु के समान निरन्तर गतिवाले प्रभु प्राणशक्ति दें। इस प्राणशक्ति के होने पर व्रती व तपस्वी बनकर मैं प्रभु को जानें और उत्तम लोक को प्राप्त करूँ।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brahma Supreme

    Meaning

    Where men dedicated to Brahma go, with Diksha, total commitment, and Tapas, relentless discipline, there may Vayu, life’s life breath divine, lead me and bless me with pranic energy. Homage to Vayu in truth of word and deed.

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    Translation

    Whither the realizers of the Divine Supreme go with consecration and austerity, may the cosmic wind lead me thither; may the cosmic wind grant me vital breaths. I dedicate it to the cosmic wind.

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    Translation

    Let Agni, the fire become the source of giving me intelligence and let it lead me to that state which the men knowing God and endowed with austerity and observance of vow occupy. I appreciate Agni.

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    Translation

    May the Powerful God or strong man like air, lead me to .... austerity. May God or the powerful person invest me with vital breaths. I pray to God or the powerful man for it.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(वायुः) वायुसमानशीघ्रगामी परमात्मा (वायुः) (प्राणान्) जीवनसाधनानि (दधातु) ददातु (मे) मह्यम् (वायवे) शीघ्रगामिने परमात्मने (स्वाहा) सुवाणी। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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