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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 129 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 129/ मन्त्र 15
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिः छन्दः - प्राजापत्या गायत्री सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    45

    पल्प॑ बद्ध॒ वयो॒ इति॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पल्प॑ । बद्ध॒ । वय॒: । इति॑ ॥१२९.१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पल्प बद्ध वयो इति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पल्प । बद्ध । वय: । इति ॥१२९.१५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 129; मन्त्र » 15
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    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के लिये प्रयत्न का उपदेश।

    पदार्थ

    (पल्प) हे रक्षक ! (बद्ध) हे प्रबन्ध करनेवाले ! [पुरुष] (वयः इति) यह जीवन है ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य सावधान जितेन्द्रिय होकर पाप से बचने का उपाय करते रहें ॥१, १६॥

    टिप्पणी

    १−(पल्प) पानीविषिभ्यः पः। उ० ३।२३। पल गतौ रक्षणे च-पप्रत्ययः। हे रक्षक (बद्ध) कर्तरि क्त। हे प्रबन्धक (वयः) जीवनम् (इति) अवधारणे ॥

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    विषय

    क्रियाशीलता व व्रत-बन्धन

    पदार्थ

    १. (पल्प) = [पल् गतौ, पा रक्षणे] हे गति के द्वारा रक्षण करनेवाले! (बद्ध) = व्रतों के बन्धन में अपने को बाँधनेवाले जीव! तू अपना (इति) = यही लक्ष्य बना कि (वयः) = [वे तन्तुसन्ताने] मैंने अपने कर्मतन्तु को विच्छिन्न नहीं होने देना-इस कर्मतन्तु का विस्तार ही करना है। मैंने इस यज्ञ-तन्तु को जीवन में कभी विलुप्त नहीं होने देना। २. हे (अघा:) = पापो! आज तक तुम्हारे में फँसा हुआ यह (वः) = तुम्हारा व्यक्ति (बद्ध इति) = अब व्रतों के बन्धन में बँधा है, ऐसा समझ लो और अब इसे अपने वशीभूत करने की आशा छोड़ दो।

    भावार्थ

    हम क्रियाशील बनें, व्रतों के बन्धन में अपने को बाँधे और यज्ञ-तन्तु को विच्छिन्न न होने देने का निश्चय करें। पाप भी ये समझ लें कि अब मैं व्रतों के बन्धन में बँधा हूँ, अब वे मुझे अपने वशीभूत न कर सकेंगे।

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    भाषार्थ

    (पल्प) हे मांस के पुतले को पालनेवाले! (बद्ध) हे मांस के पिञ्जरे में बन्धे हुए! (वय इति) तू तो इस पिञ्जरे में से उड़ जानेवाले पक्षी के सदृश है।

    टिप्पणी

    [पल्प=पललं मांसं पाति पालयतीति। अथवा पल्प=pulp; soft fleshy part. “पल्प” पद द्वारा उसका वर्णन है जो कि शरीर को ही “आत्मस्वरूप” समझता है। उसे चेतावनी दी गई है कि तू इस शरीर से पृथक् है जो कि वासनाओं के कारण इस शरीर में बन्धा हुआ है, और समय पर इस पिञ्जरे से उड़ जानेवाला पक्षी है। इस प्रकार व्यक्ति को “आत्मस्वरूप” दर्शा कर उसकी आध्यात्मिक-भावना को परिपुष्ट किया गया है।]

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    विषय

    वीर सेना और गृहस्थ में स्त्री का वर्णन।

    भावार्थ

    (पक्कौ) पके (ब्रीहियवौ इति) धान और जौ चाहती हूं। गृहस्थ सदा पके धान और जौ के खेत की इच्छा करता है। व्रीहि अर्थात् वंशवृद्धि करने वाले पुरुष और पुरुष वीर्य-‘व्रीहि’ है और स्त्रियां युवतियां ‘यव’ हैं। वे दोनों परिपक्व वीर्य हों यही सबकी अभिलाषा है। सेनापक्ष में—‘व्रीहि’ धान्य सम्पत्ति या बृहत् राष्ट्र और ‘यव’ शत्रुनाशक वीर ये दोही पदार्थ सेनाओं को इष्ट हैं।

    टिप्पणी

    पल्य वद्ध वयो इति शं० पा०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथ ऐतशप्रलापः॥ ऐतश ऋषिः। अग्नेरायुर्निरूपणम्॥ अग्नेरायुर्यज्ञस्यायात यामं वा षट्सप्ततिसंख्याकपदात्मकं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    Bound in flesh and blood, you are a bird in the cage cage.

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    Translation

    O protector, O manager, this is life.

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    Translation

    O protector, O manager, this is life.

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    Translation

    O soul, the good and desirable things, achieved by the help of organs of actions, and knowledge, secured through the organs of speech or other senses are all for thee.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(पल्प) पानीविषिभ्यः पः। उ० ३।२३। पल गतौ रक्षणे च-पप्रत्ययः। हे रक्षक (बद्ध) कर्तरि क्त। हे प्रबन्धक (वयः) जीवनम् (इति) अवधारणे ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মনুষ্যপ্রয়ত্নোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (পল্প) হে রক্ষক! (বদ্ধ) হে প্রবন্ধক! [পুরুষ] (বয়ঃ ইতি) ইহাই/এটাই জীবন ॥১৫॥

    भावार्थ

    মনুষ্য সচেতন জিতেন্দ্রিয় হয়ে পাপ থেকে রক্ষার উপায় করুক ॥১৫, ১৬॥

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    भाषार्थ

    (পল্প) হে মাংসের পুতুল পালনকারী! (বদ্ধ) হে মাংসে খাঁচায় আবদ্ধ ! (বয় ইতি) তুমি তো এই খাঁচা থেকে উড়ে যাওয়া পক্ষীর সদৃশ।

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