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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 47 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 47/ मन्त्र 17
    ऋषिः - प्रस्कण्वः देवता - सूर्यः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-४७
    52

    प्र॒त्यङ्दे॒वानां॒ विशः॑ प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षीः। प्र॒त्यङ्विश्वं॒ स्वर्दृ॒शे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र॒त्यङ् । दे॒वाना॑म् । विश॑: । प्र॒त्यङ् । उत् । ए॒षि॒ । मानु॑षी: ॥ प्र॒त्यङ् । विश्व॑म् । स्व॑: । दृ॒शे ॥४७.१७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रत्यङ्देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषीः। प्रत्यङ्विश्वं स्वर्दृशे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रत्यङ् । देवानाम् । विश: । प्रत्यङ् । उत् । एषि । मानुषी: ॥ प्रत्यङ् । विश्वम् । स्व: । दृशे ॥४७.१७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 47; मन्त्र » 17
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    १३-२१। परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे सूर्य !] (देवानाम्) गतिशील [चन्द्र आदि लोकों] की (विशः) प्रजाओं को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर, (मानुषीः) मानुषी [मनुष्यसम्बन्धी पार्थिव प्रजाओं] को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर और (विश्वम्) सब जगत् को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर (स्वः) सुख से (दृशे) देखने के लिये (उत्) ऊँचा होकर (एहि) तू प्राप्त होता है ॥१७॥

    भावार्थ

    सूर्य गोल आकार बहुत बड़ा पिण्ड है, इसलिये वह सब लोकों के सन्मुख दीखता है, और सब लोक उसके आकर्षण प्रकाशन आदि से सुख पाते हैं, ऐसे ही परमात्मा के सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान् होने से उसके नियम पर चलकर सब सुखी रहते हैं ॥१७॥

    टिप्पणी

    १३-२१−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० १३।२।१६-२४ ॥

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    विषय

    देव व मानव बनकर प्रभु-दर्शन

    पदार्थ

    १. हे सूर्य! तू (देवानां विश:) = प्रत्यक-देवों की प्रजाओं के प्रति गति करता हुआ (उदेषि) = उदित होता है, अर्थात् सूर्य का प्रकाश प्रजाओं को दिव्य गुणोंवाला व दैवी वृत्तिवाला बनाता है। सूर्य के प्रकाश में रहनेवाले लोग दिव्य गुणोंवाले बनते हैं। सूर्य का प्रकाश मन पर अत्यन्त स्वास्थ्यजनक प्रभाव डालता है। २. (मानुषी: प्रत्यङ् उदेषि) = मानव-प्रजाओं के प्रति गति करता हुआ तू उदित होता है। सूर्य का प्रकाश हमें मानुष बनाता है-'मत्वा कर्माणि सीव्यति'-विचारपूर्वक कर्म करनेवाला बनाता है। सूर्य के प्रकाश में विचरनेवाले व्यक्ति समझकर काम करते हैं। अथवा यह प्रकाश हमें मनुष्य बनाता है [मानुष Human] अक्रूरवृत्तिवाला बनाता है। सामान्यतः हिंसावृत्ति के पशु व असुर रात्रि के अन्धकार में ही कार्य करते हैं। सूर्य का प्रकाश उनके लिए प्रतिकूल होता है। ३. (स्व:दृशे) = उस स्वयं देदीप्यमान ज्योति 'ब्रह्म' के दर्शन के लिए तू (विश्वं प्रत्यङ् ) = सबके प्रति गति करता हुआ उदय होता है। इस उदय होते हुए सूर्य के अन्दर द्रष्टा को प्रभु की महिमा का आभास मिलता है। यह सूर्य उसे प्रभु की विभूति के रूप में दिखता है।

    भावार्थ

    सूर्य का प्रकाश देव बनाता है, एक सच्चा मानव बनाता है और हमारे लिए यह प्रभु के दर्शन का आधार बनता है।

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    भाषार्थ

    हे परमेश्वर! आप (प्रत्यङ्) प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त हैं, आप (देवानां विशः) दिव्यकोटि के उपासकों के हृदयों में (उदेषि) उदित होते हैं। (प्रत्यङ्) आप प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त हैं, (मानुषीः) श्रवण मनन निदिध्यासनाभ्यासी जनों के हृदयों में भी (उदेषि) उदित होते हैं। (प्रत्यङ्) आप प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त हैं, (विश्वम्) और विश्व को (स्वर्दृशे) आप निज आनन्दमय स्वरूप दर्शा रहे हैं।

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    विषय

    ईश्वर।

    भावार्थ

    हे परमेश्वर ! तू (देवानां विशः) देवों, विद्वानों और दिव्य सूर्यादि नक्षत्र लोकों में विद्यमान एवं उत्तम गुणों वाली (विशः) प्रजानों के (प्रत्यङ्) प्रति और (मानुषीः विशः प्रत्यङ्) मननशील मानुष प्रजाओं के प्रति और (विश्वं प्रत्यङ्) समस्त संसार के प्रति साक्षात् (दृशे) दर्शन देने के लिये (स्वः) सुख स्वरूप ही हो। अर्थात् विद्वान्, मननशील सर्व साधारण प्रजाओं को भी साक्षात् दीख जाते हो। (स्वः) तुम सदा सुखमय मोक्षस्वरूप ही हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १-३ सुकक्षः। ४–६, १०-१२ मधुच्छन्दाः। ७-९ इरिम्बिठिः। १३-२१ प्रस्कण्वः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। एकविंशतृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Lord Light of the world, to the noblest powers of nature and humanity, to the people in the business of life, to the people in general, you rise directly and reveal your presence directly in their heart and soul so that the world may see the light divine directly through their experience.

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    Translation

    O-All-impelling God, you manifest your powers in the cosmic order direct to the luminous bodies and the subjects of enlightened persons and Straight to the mankind and straight to the world for showing the happiness and light.

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    Translation

    O-All-impelling God, you manifest your powers in the cosmic order direct to the luminous bodies and the subjects of enlightened persons and straight to the mankind and Straight to the world for showing the happiness and light.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १३-२१−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० १३।२।१६-२४ ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    ১৩-২১ আধ্যাত্মোপদেশঃ ॥

    भाषार्थ

    [হে সূর্য !] (দেবানাম্) গতিশীল [চন্দ্র আদি লোক-সমূহের] (বিশঃ) প্রজাদের (প্রত্যঙ্) সন্মুখ হয়ে, (মানুষীঃ) মানুষী মনুষ্য সম্বন্ধী [পার্থিব প্রজাদের] (প্রত্যঙ্) সন্মুখ হয়ে এবং (বিশ্বম্) সব জগতের (প্রত্যঙ্) সন্মুখ হয়ে (স্বঃ) সুখপূর্বক (দৃশে) দেখার জন্য (উৎ) উচ্চ হয়ে (এষি) তুমি প্রাপ্ত হও॥১৭॥

    भावार्थ

    সূর্য অনেক বড়ো গোলকার পিণ্ড, এইজন্য তা সব লোক-সমূহকে সন্মুখে দেখে, এবং সব লোক সূর্যের আকর্ষণ প্রকাশ/আলো আদি দ্বারা সুখ প্রাপ্ত হয়, এভাবেই পরমাত্মার সর্বব্যাপী এবং সর্বশক্তিমান্ হওয়ায় উনার নিয়মের অনুগামী হয়ে সবাই সুখী থাকে ॥১৭॥

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    भाषार्थ

    হে পরমেশ্বর! আপনি (প্রত্যঙ্) প্রত্যেক পদার্থের মধ্যে ব্যাপ্ত, আপনি (দেবানাং বিশঃ) দিব্যকোটির উপাসকদের হৃদয়ে (উদেষি) উদিত হন। (প্রত্যঙ্) আপনি প্রত্যেক পদার্থের মধ্যে ব্যাপ্ত, (মানুষীঃ) শ্রবণ, মনন, নিদিধ্যাসনাভ্যাসীদের হৃদয়ের মধ্যেও (উদেষি) উদিত হন। (প্রত্যঙ্) আপনি প্রত্যেক পদার্থে ব্যাপ্ত, (বিশ্বম্) এবং বিশ্বকে (স্বর্দৃশে) আপনি নিজ আনন্দময় স্বরূপ প্রত্যক্ষ করাচ্ছেন।

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