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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 69 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 69/ मन्त्र 11
    ऋषिः - मधुच्छन्दाः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-६९
    57

    के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑। समु॒षद्भि॑रजायथाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    के॒तुम् । कृ॒ण्वन् । अ॒के॒तवे॑ । पेश॑: । म॒र्या॒: । अ॒पे॒शसे॑ ॥ सम् । उ॒षत्ऽभि॑: । अ॒जा॒य॒था॒: ॥६९.११॥


    स्वर रहित मन्त्र

    केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    केतुम् । कृण्वन् । अकेतवे । पेश: । मर्या: । अपेशसे ॥ सम् । उषत्ऽभि: । अजायथा: ॥६९.११॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 69; मन्त्र » 11
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ९-११ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (मर्याः) हे मनुष्यो ! (अकेतवे) अज्ञान हटाने के लिये (केतुम्) ज्ञान को और (अपेशसे) निर्धनता मिटाने के लिये (पेशः) सुवर्ण आदि धन को (कृण्वन्) उत्पन्न करता हुआ वह [परमात्मा-म० ९, १०] (उषद्भिः) प्रकाशमान गुणों के साथ (सम्) अच्छे प्रकार (अजायथाः) प्रकट हुआ है ॥११॥

    भावार्थ

    मनुष्य प्रयत्न करके परमात्मा को विचारते हुए सृष्टि के पदार्थों से उपकार लेकर ज्ञानी और धनी होवें ॥११॥

    टिप्पणी

    ९-११−एते मन्त्रा आगताः-अ० २०।२६।४-६ तथा ४७।१०-१२ ॥

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    विषय

    देखो व्याख्या, अथर्व० २०.२६.४-६॥

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    भाषार्थ

    (मर्याः) हे उपासक जनो! तुम परमेश्वर के प्रति कहो कि हे परमेश्वर! आप (अकेतवे) प्रज्ञानरहित उपासक के लिए, (केतुम्) प्रज्ञान (कृण्वन्) प्रकट करते हुए, और (अपेशसे) रूपरहित उपासक के लिए (पेशः) नया रूप प्रकट करते हुए, (उषद्भिः) उषाकालों के साथ-साथ (सम् अजायथाः) सम्यक् प्रकार प्रकट हो जाइए।

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    विषय

    राजा, सेनापति, परमेश्वर।

    भावार्थ

    (९-११) इन तीन मन्त्रों की व्याख्या देखो कां० २०। २४। ४-६॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मधुच्छन्दा ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। द्वादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Children of the earth, know That who creates light and knowledge for the ignorant in darkness and gives form and beauty to the formless and chaotic, and regenerate yourselves by virtue of the men of knowledge and passion for action.

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    Translation

    O men, you imparting knowledge to him who is deprived of it and providing with wealth the man who has no wealth, emerge strong with shining zeal.

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    Translation

    O men, you imparting knowledge to him who is deprived of it and providing with wealth the man who has no wealth, emerge strong with shining zeal.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ९-११−एते मन्त्रा आगताः-अ० २०।२६।४-६ तथा ४७।१०-१२ ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মন্ত্রাঃ ৯-১১ পরমেশ্বরগুণোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (মর্যাঃ) হে মনুষ্যগন ! (অকেতবে) অজ্ঞান দূর করার জন্য (কেতুম্) জ্ঞানকে এবং (অপেশসে) নির্ধনতা দূর করার জন্য (পেশঃ) সুবর্ণ আদি ধনকে (কৃণ্বন্) করে সেই [পরমাত্মা-মন্ত্র০ ৯, ১০] (উষদ্ভিঃ) প্রকাশমান গুণসমূহের সাথে (সম্) ভালোভাবে (অজায়থাঃ) প্রকট হয়েছেন ॥১১॥

    भावार्थ

    মনুষ্য প্রচেষ্টা করে পরমাত্মার বিচার করে সৃষ্টির পদার্থসমূহ থেকে উপকার গ্রহণ করে জ্ঞানী ও ধনী হবে/হোক ॥১১॥

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    भाषार्थ

    (মর্যাঃ) হে উপাসকগণ! তোমরা পরমেশ্বরের প্রতি বলো, হে পরমেশ্বর! আপনি (অকেতবে) প্রজ্ঞানরহিত উপাসকের জন্য, (কেতুম্) প্রজ্ঞান (কৃণ্বন্) প্রকট করে, এবং (অপেশসে) রূপরহিত উপাসকের জন্য (পেশঃ) নতুন রূপ প্রকট করে, (উষদ্ভিঃ) ঊষাকালের সাথে-সাথে (সম্ অজায়থাঃ) সম্যক্ প্রকারে প্রকট হন।

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