अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 69/ मन्त्र 4
त्वं सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ स॒द्यो वृ॒द्धो अ॑जायथाः। इन्द्र॒ ज्यैष्ठ्या॑य सुक्रतो ॥
स्वर सहित पद पाठत्वम् । सु॒तस्य॑ । पी॒तये॑ । स॒द्य: । वृ॒द्ध: । अ॒जा॒य॒था॒: ॥ इन्द्र॑ । ज्यैष्ठ्या॑य । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो ॥६९.४॥
स्वर रहित मन्त्र
त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः। इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो ॥
स्वर रहित पद पाठत्वम् । सुतस्य । पीतये । सद्य: । वृद्ध: । अजायथा: ॥ इन्द्र । ज्यैष्ठ्याय । सुक्रतो इति सुऽक्रतो ॥६९.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
१-८ पराक्रमी मनुष्य के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थ
(सुक्रतो) हे श्रेष्ठ कर्म और बुद्धिवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े प्रतापी मनुष्य] (त्वम्) तू (सद्यः) शीघ्र (सुतस्य) तत्त्वरस के (पीतये) पीने के लिये और (ज्येष्ठ्याय) प्रधानपन के लिये (वृद्धः) वृद्धियुक्त पण्डित (अजायथाः) हुआ है ॥४॥
भावार्थ
जो मनुष्य तीव्रबुद्धि होकर शीघ्र तत्त्व को ग्रहण करते हैं, वे ही संसार में बड़े पद के योग्य होते हैं ॥४॥
टिप्पणी
४−(त्वम्) (सुतस्य) निष्पादितस्य तत्त्वरसस्य (पीतये) पानाय। ग्रहणाय (सद्यः) शीघ्रम् (वृद्धः) वृद्धियुक्तः पण्डितः (अजायथाः) प्रसिद्धोऽभवः (इन्द्र) महाप्रतापिन् मनुष्य (ज्यैष्ठ्याय) गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च। पा० ।१।१२४। ज्येष्ठ-ष्यञ्। प्रधानत्वप्राप्तये (सुक्रतो) श्रेष्ठकर्मबुद्धियुक्त ॥
विषय
सोम-रक्षण द्वारा वृद्धि व ज्येष्ठता की प्राप्ति
पदार्थ
१. हे (सुक्रतो) = उत्तम कर्मसंकल्प व ज्ञानवाले जीव! (त्वम्) = तू (सुतस्य पीतये) = इस उत्पन्न हुए-हुए सोम के पान के लिए हो-सोम का तू शरीर में ही रक्षण करनेवाला बन। इस सोम रक्षण से तू (सद्य:) = शीघ्र (वृद्धः) = बढ़ी हुई शक्तियोंवाला (अजायथा:) = हो जाता है। इससे तेरा शरीर स्वस्थ बनता है, मन (ज्येष्ठयाय) = ज्येष्ठता के लिए होता है। ब्राह्मण बनकर तू ज्ञान से ज्येष्ठ बनता है, क्षत्रिय बनकर बल के दृष्टिकोण से ज्येष्ठ होता है और वैश्य के रूप में बढ़े हुए धन धान्यवाला होता है।
भावार्थ
सोम-रक्षण ही वृद्धि व ज्येष्ठता का मूल है।
भाषार्थ
(सुक्रतो इन्द्र) हमारे उपासना-कर्म को सुफल करनेवाले हे परमेश्वर! (त्वम्) आप (वृद्धः) श्रेष्ठ गुणों में सबसे बढे़ हुए पुराण पुरुष हैं। आप (सुतस्य) निष्पन्न भक्तिरस की (पीतये) स्वीकृति के लिए तथा (ज्यैष्ठ्याय) सर्वश्रेष्ठ मोक्ष के प्रदान के निमित्त, (सद्यः) शीघ्र ही (अजायथाः) प्रकट हो जाते हैं।
विषय
राजा, सेनापति, परमेश्वर।
भावार्थ
(इन्द्र त्वं) हे जीव ! हे राजन् ! तू (सुतस्य) प्राप्त राष्ट्र के (पीतये) पालन या भोग के लिये, हे (सुक्रतो) शुभ प्रज्ञा और कर्म करने हारे ! (ज्यैष्ठ्याय) संबन्ध से महान पद प्राप्त करने के लिये (सद्यः) सदा (वृद्धः) शक्तियों में महान् होकर (अजायथाः) रह। परमेश्वर के पक्ष में—हे परमेश्वर ! पुत्र के समान अपने उपासकों को (पीतये) अपने भीतर लीन, अपने आनन्द में मग्नकर लेने के लिये तू सदा ही (वृद्धः अजायथाः) महान् है क्योंकि (ज्येष्ठाय) तू ही सबसे ज्येष्ठ या सबसे बड़ा है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मधुच्छन्दा ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। द्वादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Indra, noble soul of purity and yajnic meditation, hero of a hundred acts of goodness, for a drink of the soma of Lord Indra’s creation, rising to new honour and grandeur every day, take a new birth into higher knowledge every moment.
Translation
O almighty Divinity, you are possessor of nice omniscience. You mature in strength even now manifest your preeminence for guarding the cosmic creation.
Translation
O Almighty Divinity, you are possessor of nice omniscience. You mature in strength even now manifest your preeminence for guarding the cosmic creation.
Translation
O Mighty Lord, king or soul, Performer of noble deeds, Thou, at once, appeareth Great and Extolled for the satisfaction and protection of this created world and for the establishment of Thy Highest Grandeur.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(त्वम्) (सुतस्य) निष्पादितस्य तत्त्वरसस्य (पीतये) पानाय। ग्रहणाय (सद्यः) शीघ्रम् (वृद्धः) वृद्धियुक्तः पण्डितः (अजायथाः) प्रसिद्धोऽभवः (इन्द्र) महाप्रतापिन् मनुष्य (ज्यैष्ठ्याय) गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च। पा० ।१।१२४। ज्येष्ठ-ष्यञ्। प्रधानत्वप्राप्तये (सुक्रतो) श्रेष्ठकर्मबुद्धियुक्त ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
১-৮ পরাক্রমিলক্ষণোপদেশঃ
भाषार्थ
(সুক্রতো) হে শ্রেষ্ঠকর্ম এবং বুদ্ধিযুক্ত (ইন্দ্র) ইন্দ্র ! [মহান প্রতাপশালী মনুষ্য] (ত্বম্) তুমি (সদ্যঃ) শীঘ্র (সুতস্য) তত্ত্বরস (পীতয়ে) পানের জন্য এবং (জ্যেষ্ঠ্যায়) জ্যেষ্ঠত্ব প্রাপ্তির জন্য (বৃদ্ধঃ) বৃদ্ধিযুক্ত পণ্ডিত (অজায়থাঃ) হয়েছো ॥৪॥
भावार्थ
যে মনুষ্য তীব্রবুদ্ধিযুক্ত হয়ে শীঘ্র তত্ত্ব গ্রহণ করে, সে সংসারে জ্যেষ্ঠ পদ প্রাপ্তির যোগ্য হয় ॥৪॥
भाषार्थ
(সুক্রতো ইন্দ্র) আমাদের উপাসনা-কর্মকে সুফলকারী হে পরমেশ্বর! (ত্বম্) আপনি (বৃদ্ধঃ) শ্রেষ্ঠ গুণে সর্বাধিক বর্ধিত পুরাণ পুরুষ। আপনি (সুতস্য) নিষ্পন্ন ভক্তিরসের (পীতয়ে) স্বীকৃতির জন্য তথা (জ্যৈষ্ঠ্যায়) সর্বশ্রেষ্ঠ মোক্ষ প্রদানের নিমিত্ত/জন্য, (সদ্যঃ) শীঘ্রই/সদ্য (অজায়থাঃ) প্রকট হন।
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