अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 69/ मन्त्र 5
आ त्वा॑ विशन्त्वा॒शवः॒ सोमा॑स इन्द्र गिर्वणः। शं ते॑ सन्तु॒ प्रचे॑तसे ॥
स्वर सहित पद पाठआ । त्वा॒ । वि॒श॒न्तु॒ । आ॒शव॑: । सोमा॑स: । इ॒न्द्र॒ । गि॒र्व॒ण॒: ॥ शम् । ते॒ । स॒न्तु॒ । प्रऽचे॑तसे ॥६९.५॥
स्वर रहित मन्त्र
आ त्वा विशन्त्वाशवः सोमास इन्द्र गिर्वणः। शं ते सन्तु प्रचेतसे ॥
स्वर रहित पद पाठआ । त्वा । विशन्तु । आशव: । सोमास: । इन्द्र । गिर्वण: ॥ शम् । ते । सन्तु । प्रऽचेतसे ॥६९.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
१-८ पराक्रमी मनुष्य के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थ
(गिर्वणः) हे स्तुतियों से सेवनीय (इन्द्र) इन्द्र ! [महाप्रतापी मनुष्य] (आशवः) वेग गुणवाले (सोमासः) सोमरस (त्वा) तुझमें (आ) सब ओर से (विशन्तु) प्रवेश करें और (प्रचेतसे ते) तुझ दूरदर्शी के लिये (शम्) सुखदायक (सन्तु) होवें ॥॥
भावार्थ
मनुष्य तीव्रबुद्धि होकर शीघ्र गुणकारी सिद्धान्तों का ग्रहण करके सुखी होवें ॥॥
टिप्पणी
−(आ) सर्वतः (त्वा) त्वाम् (विशन्तु) प्रविशन्तु। व्याप्नुवन्तु (आशवः) वेगगुणयुक्ताः (सोमासः) तत्त्वरसाः (इन्द्र) महाप्रतापिन् मनुष्य (गिर्वणः) अ० २०।६।६। स्तुतिभिः सेवनीय (शम्) सुखप्रदाः (ते) तुभ्यम् (सन्तु) (प्रचेतसे) प्रकृष्टज्ञानिने दूरदर्शिने ॥
विषय
क्रियाशीलता-शान्ति-प्रकृष्ट चेतना
पदार्थ
१. हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष! (सोमासः) = ये सोमकण (त्वा आविशन्तु) = तुझमें समन्तात् प्रवेश करें-तेरे शरीर में व्याप्त हो जाएँ। ये सोमकण (आशव:) = तुझे सदा कर्मों में व्याप्त करनेवाले हैं [अश् व्याप्तौ]। सोमकणों के शरीर में व्याप्त होने पर तुझे अकर्मण्यता नहीं घेर सकती। २. हे (गिर्वणः) = ज्ञान की वाणियों का सेवन करनेवाले पुरुष ! ये सुरक्षित हुए-हुए सोमकण (ते शं सन्तु) = तुझे शान्ति देनेवाले हों। (प्रचेतसे) = ये तेरी प्रकृष्ट चेतना के लिए हों। इनके रक्षण से तू सदा आत्म स्मरणवाला हो। मैं कौन हूँ। मैं यहाँ क्यों आया हूँ, इन बातों का स्मरण तुझे कभी मार्गभ्रष्ट न होने देगा।
भावार्थ
शरीर में सुरक्षित सोम हमें क्रियाशील, शान्तस्वभाव व प्रकृष्ट चेतनायुक्त' बनाता है।
भाषार्थ
(गिर्वणः) हे वेदवाणियों द्वारा भजनीय (इन्द्र) परमेश्वर! (आशवः) हमारे संवेगी (सोमासाः) भक्तिरस, (त्वा) आप में (आ विशन्तु) प्रवेश पा जाएँ, आप उन्हें स्वीकार कर लें। (ते) और वे भक्तिरस (प्रचेतसे) प्रज्ञानी उपासक के लिए (शम्) शान्तिप्रद (सन्तु) हों।
विषय
राजा, सेनापति, परमेश्वर।
भावार्थ
हे (गिर्वणः) वाणियों द्वारा स्तुति करने योग्य ! हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् परमेश्वर ! (आशवः) ये समस्त व्यापक पदार्थ और वेगवान् सूर्यदि लोक (सोमासः) और विद्याओं में व्याप्त ज्ञानी पुरुष भी (त्वा आविशन्तु) तुझ को ही प्राप्त हो जाते हैं और (ते) तुझ (प्रचेतसे) प्रकृष्ट उत्कृष्ट ज्ञानवान् के अधीन होकर ही (शं) कल्याणकारी और शक्तिदायक (सन्तु) होते हैं। अथवा—ज्ञानी पुरुष (प्रचेतसे) सर्वोत्कृष्ट ज्ञानी (ते) तुझे प्राप्त करने के लिये ही (शं) शांतिसम्पन्न, शमदमादि युक्त (सन्तु) हों। राजा और जीव के पक्ष में—हे स्तुतियोग्य ! समस्त (आशवः सोमासः) शीघ्रगामी तीव्र बुद्धिमान् विद्वान्गण (त्वा आविशन्तु) तेरे अधीन रहें। सर्वोत्कृष्ट ज्ञानवान् पुरुष तेरे लिये कल्याणकारी हों।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मधुच्छन्दा ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। द्वादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Indra, noble soul, high-priest of yajna and the divine voice, may all these brilliant creations of lightning speed be good and beneficial to you and humanity. May they bring bliss and peace to you, prince of knowledge and grandeur.
Translation
O dorable Divinity, may the men of sharp intellect enter into you and may they be favourable devotee of you, All-knowledge.
Translation
O adorable Divinity, may the men of sharp intellect enter into you and may they be favorable devotee of you, All knowledge.
Translation
O Worship-worthy Lord of Learning and Light, king or soul, let the swift-moving forces of nature and sweet-natured, bliss-seeking, learned persons, find their abode in Thee. Let them be all peace and tranquillity for attaining Thee, the sources of all knowledge and light.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
−(आ) सर्वतः (त्वा) त्वाम् (विशन्तु) प्रविशन्तु। व्याप्नुवन्तु (आशवः) वेगगुणयुक्ताः (सोमासः) तत्त्वरसाः (इन्द्र) महाप्रतापिन् मनुष्य (गिर्वणः) अ० २०।६।६। स्तुतिभिः सेवनीय (शम्) सुखप्रदाः (ते) तुभ्यम् (सन्तु) (प्रचेतसे) प्रकृष्टज्ञानिने दूरदर्शिने ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
১-৮ পরাক্রমিলক্ষণোপদেশঃ
भाषार्थ
(গির্বণঃ) হে স্তুতি দ্বারা সেবনীয় (ইন্দ্র) ইন্দ্র ! [মহাপ্রতাপী মনুষ্য] (আশবঃ) বেগগুণযুক্ত (সোমাসঃ) সোমরস (ত্বা) তোমার মধ্যে (আ) সর্বতোভাবে (বিশন্তু) প্রবেশ করুক এবং (প্রচেতসে তে) দূরদর্শী তোমার জন্য তা (শম্) সুখদায়ক (সন্তু) হোক ॥৫॥
भावार्थ
মনুষ্য তীব্রবুদ্ধি সম্পন্ন হয়ে শীঘ্র হিতকর সিদ্ধান্ত গ্রহণ পূর্বক সুখী হোক ॥৫॥
भाषार्थ
(গির্বণঃ) হে বেদবাণীর দ্বারা ভজনীয় (ইন্দ্র) পরমেশ্বর! (আশবঃ) আমাদের সংবেগী (সোমাসাঃ) ভক্তিরস, (ত্বা) আপনার মধ্যে (আ বিশন্তু) প্রবিষ্ট হোক, আপনি তা স্বীকার করুন। (তে) এবং সেই ভক্তিরস (প্রচেতসে) প্রজ্ঞানী উপাসকের জন্য (শম্) শান্তিপ্রদ (সন্তু) হোক।
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