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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 77 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 77/ मन्त्र 4
    ऋषिः - वामदेवः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-७७
    45

    स्वर्यद्वेदि॑ सु॒दृशी॑कम॒र्कैर्महि॒ ज्योती॑ रुरुचु॒र्यद्ध॒ वस्तोः॑। अ॒न्धा तमां॑सि॒ दुधि॑ता वि॒चक्षे॒ नृभ्य॑श्चकार॒ नृत॑मो अ॒भिष्टौ॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स्व॑: । यत् । वेदि॑ । सु॒ऽदृशी॑कम् । अ॒र्कै: । महि॑ । ज्योति॑: । रु॒रु॒चु॒: । यत् । ह॒ । वस्तो॑: ॥ अ॒न्धा । तमां॑सि । दुधि॑ता । वि॒ऽचक्षे॑ । नृऽभ्य॑: । च॒का॒र॒ । नृऽत॑म: । अ॒भिष्टौ॑ ॥७७.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स्वर्यद्वेदि सुदृशीकमर्कैर्महि ज्योती रुरुचुर्यद्ध वस्तोः। अन्धा तमांसि दुधिता विचक्षे नृभ्यश्चकार नृतमो अभिष्टौ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    स्व: । यत् । वेदि । सुऽदृशीकम् । अर्कै: । महि । ज्योति: । रुरुचु: । यत् । ह । वस्तो: ॥ अन्धा । तमांसि । दुधिता । विऽचक्षे । नृऽभ्य: । चकार । नृऽतम: । अभिष्टौ ॥७७.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 77; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (यत्) जो (अर्कैः) पूजनीय विचारों से (सुदृशीकम्) उत्तम प्रकार से देखने योग्य, (महि) बड़ा (ज्योतिः) प्रकाशमय (स्वः) सुख (वेदि) जाना गया है, और (यत्) जिस [सुख] से (ह) निश्चय करके (वस्तोः) दिन [के समान] (रुरुचुः) वे [विद्वान् जन] प्रकाशित हुए हैं। [उस सुख के लिये] (नृतमः) सबसे बड़े नेता पुरुष ने (अभिष्टौ) सब प्रकार मिलाप में (नृभ्यः) नेता लोगों के निमित्त (विचक्षे) विशेष करके देखने के अर्थ (अन्धा) भारी (तमांसि) अन्धकारों को (दुधिता) नष्ट (चकार) किया है ॥४॥

    भावार्थ

    जिस सुख को महात्मा लोगों ने बड़े विचारों से अनुभव करके हृदय का आवरण हटाया है, उस सुख को सुनीतिज्ञ राजा सूर्य के प्रकाश के समान विद्वानों में बढ़ाकर प्रजापालन करे ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(स्वः) सुखम् (यत्) (वेदि) अवेदि। ज्ञानम् (सुदृशीकम्) मृडः कीकच्कङ्कणौ। उ०।२४। दृशेः-कीकच्। सुष्ठु दर्शनीयम् (अर्कैः) पूजनीयविचारैः (महि) महत् (ज्योतिः) प्रकाशमयं (रुरुचुः) दीप्तियुक्ता बभूवुः ते विद्वांसः (यत्) येन सुखेन (ह) निश्चयेन (वस्तोः) दिनम्। दिनप्रकाशो यथा (अन्धा) अन्धानि। निबिडानि (तमांसि) अन्धकारान् (दुधिता) दुहिर् अर्दने-क्त, हस्य ध। दुहितानि। नाशितानि (विचक्षे) चक्षिण् व्यक्तायां वाचि दर्शने च-क्विप्। विशेषेण दर्शनाय (नृभ्यः) नेतृभ्यः (चकार) कृतवान् (नृतमः) अतिशयेन नेता (अभिष्टौ) यजेः क्तिन्। सर्वतः संगतौ ॥

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    विषय

    ज्ञान-प्रकाश व वासना-विलय

    पदार्थ

    १.(अर्कैः) = अर्चना के साधनभूत मन्त्रों के द्वारा (यत्) = जब (सदशीकम) = उत्तम दर्शनीय स्व:-प्रकाश बेदि-जाना जाता है-प्राप्त किया जाता है। (यत्) = जब (ह) = निश्चय से (वस्तो:) = निवास को उत्तम बनाने के उद्देश्य से (महि ज्योति:) = महनीय व महान् ज्योति में ही (रुरुचः) = रुचिवाले होते हैं। उस समय (नृतमः) = वह सर्वोत्तम नेता प्रभु (नृभ्यः) = उन्नति-पथ पर चलनेवाले इन लोगों के लिए (अभिष्टौ) -=वासनाओं पर आक्रमण के निमित्त (अन्धा तमांसि) = घने अन्धकारों को (दुधिता चकार) = [नाशितानि सा०] नष्ट कर देते हैं और (विचक्षे) = उन लोगों के लिए विशेष रूप से मार्गदर्शन के लिए होते हैं। २. प्रभु की उपासना से प्रकाश प्रास होता है। इसी से हमारी रुचि ज्ञान-प्राप्ति की ओर होती है। उस समय प्रभु हमारे बने अज्ञानान्धकारों को नष्ट करते हैं। ज्ञान के प्रकाश में वासनान्धकार का विलय हो जाता है।

    भावार्थ

    प्रभु उपासक को ज्ञान का वह प्रकाश प्राप्त कराते हैं, जिसमें वासनान्धकार विलीन हो जाता है।

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    भाषार्थ

    (स्वः) सुखस्वरूप, (सुदृशीकम्) तथा शोभनदर्शनवाले परमेश्वर को, (यद्) जब (अर्कैः) वेदमन्त्रों के द्वारा, (वेदि) मैंने जाना, तब प्रतीत हुआ कि उसी के सामर्थ्य द्वारा, (वस्तोः) दिन की (यद् ह महि ज्योतिः) जो महाज्योति अर्थात् सूर्य है वह तथा रात्रि के तारागण (रुरुचुः) चमक रहे हैं। और (विचक्षे) मैं विशेषरूप में कहता हूँ, और देख रहा हूँ कि सांसारिक भोग तो (अन्धा) अन्धा बना देनेवाले (तमांसि) तमोरूप हैं, और (दुधिता) अहितकर हैं। (नृतमः) सर्वश्रेष्ठ नेता परमेश्वर ने, (नृभ्यः) सर्वसाधारण सांसारिक लोगों के (अभिष्टौ) अभीष्ट साधन के निमित्त (चकार) जगत् की रचना की है।

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    विषय

    परमेश्वर आचार्य राजा।

    भावार्थ

    वह (नृतमः) समस्त नेताओं में श्रेष्ठ नरोत्तम, परमपुरुष आत्मा (यत्) जो (अर्कैः) किरणों से (सुदृशीकम्) सुन्दर, सुचारु रूप से दर्शन करने योग्य, अति सुन्दर, सूर्य के समान देदीप्यमान (स्वः) परमसुखमय प्रकाशमय (महि ज्योतिः) उस महान् ज्योति को (चकार) प्रकट करता है (यद् वस्तोः) जिसके भीतर रहने के लिये सभी प्राणगण और योगी जन एवं जिस परमब्रह्म नाम की ज्योति में समस्त सूर्य, चन्द्र, तारे आदि (रुरुचुः) कामना करते एवं प्रकाशमान हो रहे हैं। वह ही (अभिष्टौ) अभीष्ट प्राप्ति के निमित्त (विचक्षे) विशेष ज्ञानदर्शन कराने के लिये (नृभ्यः) मनुष्यों के ऊपर छाये (अन्धा तमांसि) घोर, कष्टदायी अन्धकारों को (दुधिता) विनष्ट (चकार) करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः। इन्द्रो देवता। त्रिष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    The heavenly light and paradisal bliss that is revealed by the reflections of knowledge and radiations of the sun, the greatness and sublimity of ultimate reality that is revealed and shines as the dawn of the day, the impenetrable layers of darkness that are laid open and bare, all that, Indra, the best of men and highest of leaders and divinities, does for the sake of humanity for their highest good so that all may see and admire.

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    Translation

    Through that light which has been known as the great wonderful refulgent splendour, by which the learned men shine like day the men of excellence for the sake of beholding of the people dispels away blinding darkness of ignorance.

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    Translation

    Through that light which has been known as the great wonderful refulgent splendor, by which the learned men shine like day the men of excellence for the sake of beholding of the people dispels away blinding darkness of ignorance.

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    Translation

    When the noblest leader of men, (the Refulgent God), generates the great shining splendour, making the altar, in the innermost recesses of the heart of a Yogi, look so beautiful and bright, which all the divine beings so keenly desire to attain, He effaces all deep darkness of ignorance and evil and creates all facilities for men to see clearly their object of attainment.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(स्वः) सुखम् (यत्) (वेदि) अवेदि। ज्ञानम् (सुदृशीकम्) मृडः कीकच्कङ्कणौ। उ०।२४। दृशेः-कीकच्। सुष्ठु दर्शनीयम् (अर्कैः) पूजनीयविचारैः (महि) महत् (ज्योतिः) प्रकाशमयं (रुरुचुः) दीप्तियुक्ता बभूवुः ते विद्वांसः (यत्) येन सुखेन (ह) निश्चयेन (वस्तोः) दिनम्। दिनप्रकाशो यथा (अन्धा) अन्धानि। निबिडानि (तमांसि) अन्धकारान् (दुधिता) दुहिर् अर्दने-क्त, हस्य ध। दुहितानि। नाशितानि (विचक्षे) चक्षिण् व्यक्तायां वाचि दर्शने च-क्विप्। विशेषेण दर्शनाय (नृभ्यः) नेतृभ्यः (चकार) कृतवान् (नृतमः) अतिशयेन नेता (अभिष्टौ) यजेः क्तिन्। सर्वतः संगतौ ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজধর্মোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (যৎ) যে (অর্কৈঃ) পূজনীয় বিচার দ্বারা (সুদৃশীকম্) উত্তম প্রকারে দর্শনযোগ্য, (মহি) মহৎ (জ্যোতিঃ) প্রকাশময় (স্বঃ) সুখকে (বেদি) জানা গেছে, এবং (যৎ) যে [সুখ] দ্বারা (হ) নিশ্চিতরূপে (বস্তোঃ) দিন [এর সমান] (রুরুচুঃ) তাঁরা [বিদ্বানগণ] প্রকাশিত হয়েছেন, [সেই সুখের জন্য] (নৃতমঃ) সর্বশ্রেষ্ঠ নেতা পুরুষ (অভিষ্টৌ) সকল প্রকার সম্মিলনে (নৃভ্যঃ) নেতাদের নিমিত্ত (বিচক্ষে) বিশেষ দর্শনের জন্য (অন্ধা) গভীর (তমাংসি) অন্ধকারকে (দুধিতা) বিনষ্ট (চকার) করেছেন ॥৪॥

    भावार्थ

    যে সুখকে মহাত্মাগণ গম্ভীর বিচারপূর্বক উপলব্ধি করে হৃদয়ের আবরণ উন্মোচন করেছেন, সেই সুখকে সুনীতিজ্ঞ রাজা সূর্যালোকের ন্যায় বিদ্বানদের মধ্যে বিস্তার করে প্রজাপালন করেন/করুক॥৪॥

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    भाषार्थ

    (স্বঃ) সুখস্বরূপ, (সুদৃশীকম্) তথা শোভনদর্শনযুক্ত পরমেশ্বরকে, (যদ্) যখন (অর্কৈঃ) বেদমন্ত্রের দ্বারা, (বেদি) আমি জেনেছি, তখন প্রতীত হয়েছে উনার সামর্থ্য দ্বারা, (বস্তোঃ) দিনের (যদ্ হ মহি জ্যোতিঃ) যে মহাজ্যোতি অর্থাৎ সূর্য আছে তা তথা রাত্রির তারাগণ (রুরুচুঃ) চমকিত হচ্ছে। এবং (বিচক্ষে) আমি বিশেষরূপে বলি, এবং দেখছি যে, সাংসারিক ভোগ তো (অন্ধা) দৃষ্টি হননকারী (তমাংসি) তমোরূপ, এবং (দুধিতা) অহিতকর। (নৃতমঃ) সর্বশ্রেষ্ঠ নেতা পরমেশ্বর, (নৃভ্যঃ) সর্বসাধারণ সাংসারিক লোকেদের (অভিষ্টৌ) অভীষ্ট সাধনের জন্য (চকার) জগতের রচনা করেছেন।

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