अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 77/ मन्त्र 6
विश्वा॑नि श॒क्रो नर्या॑णि वि॒द्वान॒पो रि॑रेच॒ सखि॑भि॒र्निका॑मैः। अश्मा॑नं चि॒द्ये बि॑भि॒दुर्वचो॑भिर्व्र॒जं गोम॑न्तमु॒शिजो॒ वि व॑व्रुः ॥
स्वर सहित पद पाठविश्वा॑नि । श॒क्र । नर्या॑णि । वि॒द्वान् । अ॒प: । रि॒रे॒च॒ । सखि॑ऽभि: । निऽका॑मै: ॥ अश्मा॑नम् । चि॒त् । ये । बि॒भि॒दु: । वच॑ऽभि । व्र॒जम् । गोऽम॑न्तम् । उ॒शिज॑: । वि । व॒व्रु॒रिति॑ । वव्रु: ॥७७.६॥
स्वर रहित मन्त्र
विश्वानि शक्रो नर्याणि विद्वानपो रिरेच सखिभिर्निकामैः। अश्मानं चिद्ये बिभिदुर्वचोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः ॥
स्वर रहित पद पाठविश्वानि । शक्र । नर्याणि । विद्वान् । अप: । रिरेच । सखिऽभि: । निऽकामै: ॥ अश्मानम् । चित् । ये । बिभिदु: । वचऽभि । व्रजम् । गोऽमन्तम् । उशिज: । वि । वव्रुरिति । वव्रु: ॥७७.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(विद्वान्) विद्वान् (शक्रः) शक्तिवाले [इन्द्र मनुष्य] ने (निकामैः) निश्चित कामनावाले (सखिभिः) मित्रों के साथ (विश्वानि) सब (नर्याणि) नेताओं के हितकारी (अपः) कर्मों को (रिरेच) फैलाया है। (ये) जिन [बुद्धिमानों] ने (वचोभिः) अपने वचनों से (अश्मानम्) व्यापक विघ्न [अथवा मेघ के समान अन्धकार फैलानेवाले शत्रु] को (चित्) निश्चय करके (बिभिदुः) तोड़ा-फोड़ा है, (उशिजः) उन बुद्धिमानों ने (गोमन्तम्) वेदवाणीवाले (व्रजम्) मार्ग को (विवव्रुः) खोल दिया है ॥६॥
भावार्थ
राजा को योग्य है कि सत्यवादी पराक्रमी मित्रों के साथ अज्ञान का नाश करके विद्या की वृद्धि से प्रजापालन करे ॥६॥
टिप्पणी
६−(विश्वानि) सर्वाणि (शक्रः) शक्तिमान् राजा (नर्याणि) नेतृभ्यो हितानि (विद्वान्) (अपः) बहुवचनस्यैकवचनम्। अपांसि कर्माणि (रिरेच) रिचिर् विरेचने। व्यक्तीकृतवान् (सखिभिः) मित्रैः (निकामैः) निश्चितकामनायुक्तैः (अश्मानम्) व्यापकं विघ्नम्। मेघमिवान्धकारकरं शत्रुम् (चित्) निश्चयेन (ये) मेधाविनः (बिभिदुः) छिन्नभिन्नं कृतवन्तः (वचोभिः) वचनैः (व्रजम्) मार्गम् (गोमन्तम्) वेदवाणीयुक्तम् (उशिजः) शुभगुणान् कामयमाना मेधाविनः (वि वव्रुः) विवृतं व्यक्तं कृतवन्तः ॥
विषय
अप: सखिभिः रिरेच
पदार्थ
१. (शक्रः) = सर्वशक्तिमान् प्रभु (विश्वानि) = सब नर्याणि विद्वान्-नरहित साधनभूत बातों को जानता हुआ (निकामैः) = प्रभु-प्राप्ति की प्रबल कामनावाले (सखिभि:) = मित्रभूत जीवों के साथ (अपः रिरेच) = वीर्यकों को मिलाता है [रिच-to mix, tojoin] वस्तुत: इन वीर्यकों के द्वारा ही सब हित सिद्ध होते हैं। जीवन-भवन की नीव ये वीर्यकण ही हैं। २. (ये) = जो उपासक (वचोभिः) = स्तुतिवचनों के द्वारा (अश्मानं चित्) = पत्थर के समान दृढ़ भी वासना को (विभिदुः) = विदीर्ण करते हैं, वे (उशिजः) = मेधावी-प्रभु की कामनावाले पुरुष (गोमन्तम्) = प्रशस्त इन्द्रियाश्वोंवाले (व्रजम्) = बाड़े को (विवव्रुः) = वासना के आच्छादन से रहित करते हैं, अर्थात् इन्द्रियों को वासनाओं से मुक्त करते हैं। अपने को वासनाओं से मुक्त करके ही तो वे वीर्यरक्षण कर पाते हैं।
भावार्थ
हमारे जीवनों को मंगलमय बनाने के लिए प्रभु हमारे साथ वीर्यकणों को जोड़ते हैं। इन वीर्यकणों के रक्षण के लिए प्रभु की उपासना नितान्त आवश्यक है।
भाषार्थ
(शक्रः) शक्तिशाली परमेश्वर (नर्याणि) मनुष्योचित (विश्वानि) सब आवश्यकताओं को (विद्वान्) जानता हुआ, (अपः) मेघीय जलों को (रिरेच) क्षारित करता है, या मनुष्योचित कर्त्तव्यकर्मों की वर्षा वेद द्वारा करता है। परमेश्वर (निकामैः) आध्यात्मिक कामनाओंवाले (सखिभिः) उपासक-सखाओं के साथ सदा रहता है, (ये) जो सखा कि (वचोभिः) अपने कथनमात्र से (अश्मानं चित्) अविद्या के किलों को भी (बिभिदुः) छिन्न-भिन्न कर देते हैं, और जो (उशिजः) प्रभु को चाहनेवाले प्रभु के सखा, (गोमन्तं व्रजम्) वाणियों के समूह अर्थात् वेदसंहिता का (विवव्रुः) सर्वत्र विवरण अर्थात् प्रवचन करते रहते हैं।
टिप्पणी
[गौः=वाणी (उणा০ कोष २.६७)।]
विषय
परमेश्वर आचार्य राजा।
भावार्थ
मेघ जिस प्रकार वायुओं के साथ मिलकर जलों को प्रदान करता है उसी प्रकार (शक्रः) शक्तिशाली (विद्वान्) ज्ञानवान्, आत्मा (निकामैः) कामना से रहित (सखिभिः) मित्रभूत चक्षु आदि इन्दियों द्वारा (विश्वानि) समस्त (नर्याणि) मनुष्यों के हितकारी (अपः) ज्ञानों और कर्मों, कर्मफलों को (रिरेच) स्वयं त्याग देता है दूसरों पर न्योछावर करता है। और (ये) जो विद्वान् योगीजन (वचोभिः) अपनी स्तुतियों द्वारा (अश्मानं) पर्वत के समान अभेद्य और मेघ के समान रस वर्ष आत्मा को (बिभिदुः) भेदते हैं वे ही (उशिजः) परमपद के आकांक्षी होकर (गोमन्तं व्रजं) इन्द्रियों के समूह को (विवक्षुः) विशेष रूप से संयम करके रोक लेने में समर्थ होते हैं। अथवा वे ही (गोमन्तं) वेदवाणियों से सम्पन्न (व्रजं) परम गन्तव्य मोक्ष पद को (वि वव्रुः) विशेषरूप से वरण करते हैं, प्राप्त करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः। इन्द्रो देवता। त्रिष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Indra, world ruler, commanding knowledge and power, exhausts all the possibilities of human action with his dedicated friends who, even with words of command, break down adamantine resistance and, passionate for action, open up and reveal the hidden treasures of wealth and energy of nations, like cowherds releasing cows from the stalls or winds breaking the clouds and releasing the waters.
Translation
The learned and powerful preceptor with the friends of decided ends spreads all the actions of human well-being. The most enlightened ones who through their speeches have broken the rocky impact of ignorance have found and opened the path of Vedic knowledge.
Translation
The learned and powerful preceptor with the friends of decided ends spreads all the actions of human well-being. The most enlightened ones who through their speeches have broken the rocky impact of ignorance have found and opened the path of Vedic knowledge.
Translation
Just as the cloud releases its waters through the help of winds, similarly does a selfless, powerful learned person fully devotes-all his knowledge and actions for the benefit of the people. Those who are desirous of attaining the highest state of beatitude, shatter the cloud of darkness and ignorance and throw open the flood-gates of the fold of light and Vedic learning and ultimately the radiant state of salvation.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(विश्वानि) सर्वाणि (शक्रः) शक्तिमान् राजा (नर्याणि) नेतृभ्यो हितानि (विद्वान्) (अपः) बहुवचनस्यैकवचनम्। अपांसि कर्माणि (रिरेच) रिचिर् विरेचने। व्यक्तीकृतवान् (सखिभिः) मित्रैः (निकामैः) निश्चितकामनायुक्तैः (अश्मानम्) व्यापकं विघ्नम्। मेघमिवान्धकारकरं शत्रुम् (चित्) निश्चयेन (ये) मेधाविनः (बिभिदुः) छिन्नभिन्नं कृतवन्तः (वचोभिः) वचनैः (व्रजम्) मार्गम् (गोमन्तम्) वेदवाणीयुक्तम् (उशिजः) शुभगुणान् कामयमाना मेधाविनः (वि वव्रुः) विवृतं व्यक्तं कृतवन्तः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
রাজধর্মোপদেশঃ
भाषार्थ
(বিদ্বান্) বিদ্বান্ (শক্রঃ) শক্তিশালী [ইন্দ্র মনুষ্য] (নিকামৈঃ) নিশ্চিত কামনাযুক্ত (সখিভিঃ) মিত্রদের সহিত (বিশ্বানি) সকল (নর্যাণি) নেতাদের হিতকারী (অপঃ) কর্মসমূহকে (রিরেচ) বিস্তারিত করেছেন। (যে) যে [বুদ্ধিমানগণ] (বচোভিঃ) নিজ বচনের দ্বারা (অশ্মানম্) ব্যাপক বিঘ্ন [অথবা মেঘের ন্যায় অন্ধকার প্রসারণকারী শত্রু] কে (চিৎ) নিশ্চিতভাবে (বিভিদুঃ) ছিন্নভিন্ন করেছেন, (উশিজঃ) সে সকল বুদ্ধিমান (গোমন্তম্) বেদবাণীযুক্ত (ব্রজম্) মার্গকে (বিবব্রুঃ) উন্মুক্ত করেছেন ॥৬॥
भावार्थ
রাজার উচিত, সত্যবাদী পরাক্রমী মিত্রদের সাথে অজ্ঞান নাশ করে বিদ্যার বৃদ্ধি দ্বারা প্রজাপালন করে/করুক॥৬॥
भाषार्थ
(শক্রঃ) শক্তিশালী পরমেশ্বর (নর্যাণি) মনুষ্যোচিত (বিশ্বানি) সকল আবশ্যকতা (বিদ্বান্) জানেন/জ্ঞাত, (অপঃ) মেঘীয় জল (রিরেচ) ক্ষারিত/বর্ষণ করেন, বা মনুষ্যোচিত কর্ত্তব্যকর্মের বর্ষা বেদ দ্বারা করেন। পরমেশ্বর (নিকামৈঃ) আধ্যাত্মিক কামনাযুক্ত (সখিভিঃ) উপাসক-সখাদের সাথে সদা থাকেন, (যে) যে সখা (বচোভিঃ) নিজের কথনমাত্র দ্বারা (অশ্মানং চিৎ) অবিদ্যার পাথরকেও (বিভিদুঃ) ছিন্ন-ভিন্ন করে দেয়, এবং যে (উশিজঃ) প্রভুর কামনাকারী প্রভুর সখা, (গোমন্তং ব্রজম্) বাণীসমূহ অর্থাৎ বেদসংহিতার (বিবব্রুঃ) সর্বত্র বিবরণ অর্থাৎ প্রবচন করতে থাকে।
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