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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 77 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 77/ मन्त्र 5
    ऋषिः - वामदेवः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-७७
    38

    व॑व॒क्ष इन्द्रो॒ अमि॑तमृजि॒ष्युभे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा। अत॑श्चिदस्य महि॒मा वि रे॑च्य॒भि यो विश्वा॒ भुव॑ना ब॒भूव॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    व॒व॒क्षे । इन्द्र॑: । अमि॑तम् । ऋ॒जी॒षी । उ॒भे इति॑ । आ । प॒प्रौ॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । म॒हि॒ऽत्वा ॥ अत॑: । चि॒त् । अ॒स्य॒ । म॒हि॒मा । वि । रे॒चि॒:। अ॒भि । य: । विश्वा॑ । भुव॑ना । बभूव॑ ॥७७.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ववक्ष इन्द्रो अमितमृजिष्युभे आ पप्रौ रोदसी महित्वा। अतश्चिदस्य महिमा वि रेच्यभि यो विश्वा भुवना बभूव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ववक्षे । इन्द्र: । अमितम् । ऋजीषी । उभे इति । आ । पप्रौ । रोदसी इति । महिऽत्वा ॥ अत: । चित् । अस्य । महिमा । वि । रेचि:। अभि । य: । विश्वा । भुवना । बभूव ॥७७.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 77; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (ऋजीषी) सरल स्वभाववाले (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर] ने (अमितम्) बे-नाप सामर्थ्य को (ववक्षे) पाया है, और (महित्वा) अपनी महिमा से (उभे) दोनों (रोदसी) सूर्य और भूमि को (आ) सब प्रकार (पप्रौ) भर दिया है। (अतः) इस कारण से (चित्) ही (अस्य) इस [जगदीश्वर] की (महिमा) महिमा (वि) विशेष करके (रेचि) अधिक हुई है, (यः) जो (विश्वा) सब (भुवना) लोकों में (अभि बभूव) व्यापक हुआ है ॥॥

    भावार्थ

    जो परमात्मा अपने अतोल बल से अनन्त संसार को धारण कर रहा है, उसी के गुण जानकर मनुष्य अपना सामर्थ्य बढ़ावें ॥॥

    टिप्पणी

    −(ववक्षे) वहतेर्लिडर्थे लेट्। सिब्बहुलं लेटि। पा० ३।१।३४। इति सिप्। बहुलं छन्दसि। पा० २।४।७६। इति शपः श्लुः। ढत्वकत्वषत्वानि। लोपस्त आत्मनेपदेषु। पा० ७।१।४१। इति तलोपः। वहते गतिकर्मा-निघ० २।१४। उवाह। प्राप (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्तो जगदीश्वरः (अमितम्) अपरिमितसामर्थ्यम् (ऋजीषी) म० १। सरलस्वभावः (उभे) द्वे (आ) समन्तात् (पप्रौ) पूरितवान् (रोदसी) सूर्यभूमी (महित्वा) महत्वेन (अतः) अस्मात् कारणात् (चित्) एव (महिमा) (अस्य) ईश्वरस्य (वि) विशेषेण (रेचि) अरेचि। अधिकोऽभवत् (अभि) अभीत्य। व्याप्य (यः) ईश्वरः (विश्वा) सर्वाणि (भुवना) भुवनानि (बभूव) ॥

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    विषय

    'सर्वत्र व्यास-अनन्त' प्रभु

    पदार्थ

    १. (ऋजीषी) = ऋजुता [सरलता] की प्रेरणा देनेवाले (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली प्रभु (अमितं ववक्ष) = असीम वृद्धिवाले होते हैं, [वक्ष to grow]|वे (महित्वा) = अपनी महिमा से उभे रोदसी दोनों द्यावापृथिवी को (आपनौ) = पूरित कर लेते हैं। २. वास्तव में तो (अत: चित्) = इन द्यावापृथिवी से भी (अस्य महिमा) = इन प्रभु की महिमा (विरेचि) = अतिरिक्त होती है। ये द्यावापृथिवी प्रभु की महिमा को अपने में समा लेने में समर्थ नहीं होते। प्रभु तो वे हैं (यः) = जोकि (विश्वा भुवना) = सब भुवनों को (अभिबभूव) = अभिभूत किये हुए हैं। उन्होंने इस सारे ब्रह्माण्ड को अपने एक देश में लिया हुआ है।

    भावार्थ

    द्यावापृथिवी उस प्रभु की महिमा को प्रकट कर रहे हैं। प्रभु इनसे महान् है, ये द्यावापृथिवी तो प्रभु के एक देश में ही स्थित हैं।

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    भाषार्थ

    (ऋजीषी) ऋजु अर्थात् सत्यमार्गाभिलाषी (इन्द्रः) परमेश्वर, (अमितम्) न नापे और विस्तार में अज्ञात संसार का (ववक्षे) वहन कर रहा है। (महित्वा) निज महिमा से परमेश्वर (उभे रोदसी) द्युलोक और भूलोक दोनों में—(आ पप्रौ) भरपूर हुआ-हुआ है। (अतः चित्) इस संसार से (अस्य महिमा) इस ईश्वर की महिमा (वि रेचि) प्रवाहित हो रही है, (यः) जो परमेश्वर कि (विश्वा भुवना) सब भुवनों पर (अभि बभूव) विजय पाए हुए है।

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    विषय

    परमेश्वर आचार्य राजा।

    भावार्थ

    (ऋजीषी) महान् संचित ऐश्वर्य वाला, समृद्ध अथवा (ऋच्ईषी-ऋजु ईषी) ऋगादि मन्त्रों से स्तुत्य अथवा ऋजुमार्ग पर ले चलनेहारा (इन्द्र) ऐश्वर्यवान्, परमेश्वर (अमितम्) अमित, अपार. पता नहीं कितना (ववक्षे) धारण करता है। वह (महित्वा) महान् सामर्थ्य से (रोदसी) द्यौ और पृथिवी दोनों को (आ पप्रौ) पूर्ण कर रहा है। (यः) जो वह (विश्वा भुवना) समस्त लोकों को (अभि बभूव) व्याप्त है और सबको वश कर रहा है तो भी (अस्य महिमा) इसका महान् सामर्थ्य (अतः चिंत् विरोच) इससे भी अधिक बड़ा है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः। इन्द्रो देवता। त्रिष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Indra, lord supreme of nature and Rtam, the law of nature, wields and sustains both heaven and earth, immeasurable though they are. He pervades both and transcends them with his power and grandeur. For this very reason, his power and grandeur too exceeds everything else of the universe since he pervades, transcends and presides over all the regions of the universe in existence.

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    Translation

    The All-impelling God spreads immensely. He with his pervasiveness has filled the twain of haven and earth. His majestic power extends even beyond. He is He who exceeds all the worlds in greatness.

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    Translation

    The All-impelling God spreads immensely. He with his pervasiveness has filled the twain of heaven and earth. His majestic power extends even beyond. He is He who exceeds all the worlds in greatness.

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    Translation

    The Mighty Creator, the Regulator of the universe on right lines, bears an Immeasurable Power and Energy. He fully fills-up both the heavens and the earth by His Grandeur. His Majesty, Who rules over all the worlds* is far greater than this.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    −(ववक्षे) वहतेर्लिडर्थे लेट्। सिब्बहुलं लेटि। पा० ३।१।३४। इति सिप्। बहुलं छन्दसि। पा० २।४।७६। इति शपः श्लुः। ढत्वकत्वषत्वानि। लोपस्त आत्मनेपदेषु। पा० ७।१।४१। इति तलोपः। वहते गतिकर्मा-निघ० २।१४। उवाह। प्राप (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्तो जगदीश्वरः (अमितम्) अपरिमितसामर्थ्यम् (ऋजीषी) म० १। सरलस्वभावः (उभे) द्वे (आ) समन्तात् (पप्रौ) पूरितवान् (रोदसी) सूर्यभूमी (महित्वा) महत्वेन (अतः) अस्मात् कारणात् (चित्) एव (महिमा) (अस्य) ईश्वरस्य (वि) विशेषेण (रेचि) अरेचि। अधिकोऽभवत् (अभि) अभीत्य। व्याप्य (यः) ईश्वरः (विश्वा) सर्वाणि (भुवना) भुवनानि (बभूव) ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজধর্মোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ঋজীষী) সরল স্বভাবযুক্ত (ইন্দ্রঃ) ইন্দ্র [পরম ঐশ্বর্যবান্ জগদীশ্বর] (অমিতম্) অপরিমিত সামর্থ্যকে (ববক্ষে) ধারণ করে রয়েছেন, এবং (মহিত্বা) নিজ মহিমা দ্বারা (উভে) উভয় (রোদসী) সূর্য এবং ভূমিকে (আ) সকল প্রকারে (পপ্রৌ) পূরণ করেছেন। (অতঃ) এই কারণে (চিৎ)(অস্য) এই [জগদীশ্বরের] (মহিমা) মহিমা (বি) বিশেষরূপে (রেচি) অধিক হয়েছে, (যঃ) যা (বিশ্বা) সকল (ভুবনা) লোকে (অভি বভূব) ব্যাপ্ত হয়েছে ॥৫॥

    भावार्थ

    যে পরমাত্মা নিজ অপরিমিত বল দ্বারা অনন্ত সংসারকে ধারণ করে রয়েছেন, তাঁর গুণ জেনে মনুষ্য নিজ সামর্থ্য বৃদ্ধি করে/করুক ॥৫॥

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    भाषार्थ

    (ঋজীষী) ঋজু অর্থাৎ সত্যমার্গাভিলাষী (ইন্দ্রঃ) পরমেশ্বর, (অমিতম্) অপরিমিত এবং বিস্তারে অজ্ঞাত সংসারের (ববক্ষে) বহন করছেন। (মহিত্বা) নিজ মহিমা দ্বারা পরমেশ্বর (উভে রোদসী) দ্যুলোক এবং ভূলোক উভয়ের মধ্যে—(আ পপ্রৌ) ভরপূর/পরিপূর্ণ। (অতঃ চিৎ) এই সংসার থেকে (অস্য মহিমা) এই ঈশ্বরের মহিমা (বি রেচি) প্রবাহিত হচ্ছে, (যঃ) যে পরমেশ্বর (বিশ্বা ভুবনা) সব ভুবনে (অভি বভূব) বিজয় প্রাপ্ত।

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