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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 77 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 77/ मन्त्र 7
    ऋषिः - वामदेवः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-७७
    31

    अ॒पो वृ॒त्रं व॑व्रि॒वांसं॒ परा॑ह॒न्प्राव॑त्ते॒ वज्रं॑ पृथि॒वी सचे॑ताः। प्रार्णां॑सि समु॒द्रिया॑ण्यैनोः॒ पति॒र्भव॒ञ्छव॑सा शूर धृष्णो ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒प: । वृ॒त्रम् । प॒वि॒ऽवांस॑म् । परा॑ । अ॒ह॒न् । प्र । आ॒व॒त् । ते॒ । वज्र॑म् । पृ॒थि॒वी । सऽचे॑ता: ॥ प्र । अर्णा॑सि । स॒मु॒द्रिया॑णि । ऐ॒नो॒: । पति॑: । भव॑न् । शव॑सा । शू॒र॒ । धृ॒ष्णो॒ इति॑ ॥७७.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपो वृत्रं वव्रिवांसं पराहन्प्रावत्ते वज्रं पृथिवी सचेताः। प्रार्णांसि समुद्रियाण्यैनोः पतिर्भवञ्छवसा शूर धृष्णो ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अप: । वृत्रम् । पविऽवांसम् । परा । अहन् । प्र । आवत् । ते । वज्रम् । पृथिवी । सऽचेता: ॥ प्र । अर्णासि । समुद्रियाणि । ऐनो: । पति: । भवन् । शवसा । शूर । धृष्णो इति ॥७७.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 77; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (धृष्णो) हे साहसी (शूर) शूर पुरुष ! (शवसा) बल के साथ (पतिः) स्वामी (भवन्) होते हुए तूने (अपः) कर्म के (वव्रिवांसम्) रोकनेवाले (वृत्रम्) अन्धकार को (परा अहन्) मार फेंका है, (सचेताः) सेचत (पृथिवी) भूमि ने (ते) तेरे (वज्रम्) वज्र [शासन] को (प्र) अच्छे प्रकार (आवत्) माना है, और तूने (समुद्रियाणि) समुद्र के योग्य (अर्णांसि) बहते हुए जलों को (प्र) आगे को (ऐनोः) चलाया है ॥७॥

    भावार्थ

    पुरुषार्थी राजा कर्मप्रधान होकर प्रजा को शासन में रक्खे और खेती आदि सींचने के लिये नदी-नालों को पहाड़ों से समुद्र तक पहुँचावे ॥७॥

    टिप्पणी

    ७−(अपः) कर्म-निघ० २।१। (वृत्रम्) अन्धकारम् (वव्रिवांसम्) वृणोतेः-क्वसु। आवरकम् (परा) दूरे (अहन्) मध्यमपुरुषस्य प्रथमः। अहः। नाशितवानसि (प्र) प्रकर्षेण (आवत्) अव रक्षणदानादिषु-लङ्। गृहीतवती (ते) तव (वज्रम्) दण्डम्। शासनम् (पृथिवी) (सचेतः) चेतनावती (प्र) प्रकर्षेण (अर्णांसि) गतिमन्ति जलानि (समुद्रियाणि) समुद्रार्हाणि (ऐनोः) इण् गतौ, अन्तर्गतण्यर्थः-लङ्, आडागमो वृद्धिश्च, छान्दसः श्नुः। अगमयः। प्रेरितवानसि (पतिः) स्वामी (भवन्) सन् (शवसा) बलेन (शूर) वीर (धृष्णो) दृढात्मन् ॥

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    विषय

    पृथिवी सचेता:

    पदार्थ

    १. (अप:) = रेत:कणों को (वविवांसम्) = आवृत कर लेनेवाले (वृत्रम्) = कामरूप इस शत्रु को (पर्यहन्) = आप सुदूर विनष्ट करते हो। (सचेता) = चेतनावाला-समझदार (पृथिवी) = अपनी शक्तियों का विस्तार करनेवाला मनुष्य (ते) = आपके दिये हुए (वज्रं प्रावत्) = क्रियाशीलता रूप वज्र को प्रकर्षण रक्षित करता है। सदा क्रियाशील बने रहकर यह वृत्र के आक्रमण से अपने को बचाये रखता है। २. हे (शूर) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले (धृष्णो) = धर्षकशक्ति से युक्त प्रभो! आप (शवसा) = अपने बल के द्वारा (पतिःभवन्) = हमारे रक्षक होते हुए (समुद्रियाणि) = ज्ञानैश्वर्य के आधारभूत वेदरूप समुद्रों के (अर्णांसि) = ज्ञान-जलों को (प्रऐनो:) = प्रकर्षेण प्रेरित करते हैं। कर्मशक्ति व ज्ञान देकर ही तो आप हमारा रक्षण करते हैं।

    भावार्थ

    समझदार पुरुष क्रियाशील बनकर बासना से बचा रहता है। वासना-विनाश से शक्ति व ज्ञान का वर्धन करके यह ज्ञानसमुद्र के रत्नों को पानेवाला बनता है।

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    भाषार्थ

    हे परमेश्वर! आप ने (अपः) सत्कर्मों पर (वव्रिवांसम्) घेरा डालनेवाले (वृत्रम्) पापवृत्र का (पराहन्) हनन किया है। अतः (पृथिवी) समग्र पृथिवीवासी (सचेताः) सचेत होकर (ते) आप के (वज्रम्) दिये ज्ञान-वज्र की (प्रावत्) सुरक्षा करते हैं। (समुद्रियाणि) सामुद्रिक (अर्णांसि) जलों को आप ही (प्र ऐनोः) वर्षा आदि के रूप में प्रेरित कर रहे हैं। (शूर) हे पराक्रमी! (धृष्णो) हे पाप-धर्षक! (शवसा) निज स्वाभाविक शक्ति के कारण आप (पतिः भवन्) जगत् के पति हुए हैं।

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    विषय

    परमेश्वर आचार्य राजा।

    भावार्थ

    हे (धृष्णो) बाधक, अन्तःशत्रुओं के घर्षणशील, विजयी (शूर) शूरवीर ! सामर्थ्यवन् ! आत्मन् ! (ते) तेरा (वज्रं) वीर्य ज्ञान सामर्थ्य (अपः वव्रिवांसं) ज्ञानों का आवरण करने वाले (वृत्रं) मेघ के समान घेरने वाले, तामस अज्ञान को (पराहन्) मेघ को सूर्य के समान विनाश करता है। और (पृथिवी) समस्त पृथिवी या विशाल शक्ति (सचेताः) तेरे बल से चेतनवती होकर तुझे (प्र आवत्) प्राप्त होती है। (समुद्रियाणि) समुद्र के (अर्णांसि) जलों या आकाशस्थ जलों को जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से ऊपर उठाता है और विद्युत् मेघस्थ जलों को नीचे फेंकता है उसी प्रकार तू (शवसा) अपने बल से (पतिः भवन्) सबका पालक होकर (समुद्रियाणि) समस्त पदार्थों के उत्पादक परमेश्वर सम्बन्धी (अर्णांसि) ज्ञानों और बलों को (प्र ऐनोः) उत्तम रीति से सबको प्रकट करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः। इन्द्रो देवता। त्रिष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Indra, ruler of the world, just as, when thunderous rays of the sun break the dark cloud holding waters of rain, the earth rejoices and rivers flow to the sea, so O mighty one, all-aware and intrepidable hero, be the master protector and promoter ruler with your strength and power and, by virtue of the centrifugal force of your power and law, break open the dark strongholds of energy and action, and let the freedom and vitality of humanity flow in action unto the ocean of eternal Divinity.

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    Translation

    O daring bold one, you are watchful and aware. You smite the cloud obstructing waters. This earth obeys your ruling command. You becoming the lord of the world send forth the waters of the ocean with your power.

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    Translation

    O daring bold one, you are watchful and aware. You smite the cloud obstructing waters. This earth obeys your ruling command. You becoming the lord of the world send forth the waters of the ocean with your power.

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    Translation

    O brave and daring person, capable of smashing the forces of the enemy or evil, thou shatterest the overwhelming foe or the darkening forces of ignorance and thy deadly weapon of high power and knowledge attains thee the vast lands pulsating with life and energy. Being the master by thy power, thou completely regulated the waters of the oceans, both terrestrial and atmospheric.

    Footnote

    Sarma and Angiras are not special personages, as noted by Sayana and Griffith.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(अपः) कर्म-निघ० २।१। (वृत्रम्) अन्धकारम् (वव्रिवांसम्) वृणोतेः-क्वसु। आवरकम् (परा) दूरे (अहन्) मध्यमपुरुषस्य प्रथमः। अहः। नाशितवानसि (प्र) प्रकर्षेण (आवत्) अव रक्षणदानादिषु-लङ्। गृहीतवती (ते) तव (वज्रम्) दण्डम्। शासनम् (पृथिवी) (सचेतः) चेतनावती (प्र) प्रकर्षेण (अर्णांसि) गतिमन्ति जलानि (समुद्रियाणि) समुद्रार्हाणि (ऐनोः) इण् गतौ, अन्तर्गतण्यर्थः-लङ्, आडागमो वृद्धिश्च, छान्दसः श्नुः। अगमयः। प्रेरितवानसि (पतिः) स्वामी (भवन्) सन् (शवसा) बलेन (शूर) वीर (धृष्णो) दृढात्मन् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজধর্মোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ধৃষ্ণো) হে সাহসী (শূর) বীর পুরুষ ! (শবসা) বলের [দ্বারা] (পতিঃ) স্বামী/বলবান (ভবন্) হয়ে আপনি (অপঃ) কর্মের (বব্রিবাংসম্) গতিরোধকারী/আচ্ছাদনকারী (বৃত্রম্) অন্ধকারকে (পরা অহন্) নাশ করেছেন, (সচেতাঃ) চেতনাবতী (পৃথিবী) পৃথিবী (তে) আপনার (বজ্রম্) বজ্রকে [শাসন] (প্র) উত্তম প্রকারে (আবৎ) গ্রহণ করেছে, আপনি (সমুদ্রিয়াণি) সমুদ্রের যোগ্য (অর্ণাংসি) প্রবাহিত জলকে (প্র) সম্মুখে (ঐনোঃ) গতিমান করেছেন ॥৭॥

    भावार्थ

    পুরুষার্থী রাজা কর্মপ্রধান হয়ে প্রজাদের শাসনে রাখুক এবং চাষবাস আদি ফসল ফলানোর জন্য নদী-নালাগুলোকে পাহাড় থেকে সমুদ্র পর্যন্ত পৌছে দেয়। ॥৭॥

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    भाषार्थ

    হে পরমেশ্বর! আপনি (অপঃ) সৎকর্ম (বব্রিবাংসম্) ঘেরাওকারী/পরিবেষ্টনকারী (বৃত্রম্) পাপবৃত্রের (পরাহন্) হনন করেছেন। অতঃ (পৃথিবী) সমগ্র পৃথিবীবাসী (সচেতাঃ) সচেতন হয়ে (তে) আপনার (বজ্রম্) প্রদত্ত জ্ঞান-বজ্রের (প্রাবৎ) সুরক্ষা করে। (সমুদ্রিয়াণি) সামুদ্রিক (অর্ণাংসি) জলকে আপনিই (প্র ঐনোঃ) বর্ষাদি রূপে প্রেরিত করছেন। (শূর) হে পরাক্রমী! (ধৃষ্ণো) হে পাপ-ধর্ষক! (শবসা) নিজ স্বাভাবিক শক্তির কারণে আপনি (পতিঃ ভবন্) জগতের পতি হয়েছেন।

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