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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 4 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - इन्द्रः छन्दः - जगती सूक्तम् - राजासंवरण सूक्त
    179

    आ त्वा॑ गन्रा॒ष्ट्रं स॒ह वर्च॒सोदि॑हि॒ प्राङ्वि॒शां पति॑रेक॒राट्त्वं वि रा॑ज। सर्वा॑स्त्वा राजन्प्र॒दिशो॑ ह्वयन्तूप॒सद्यो॑ नम॒स्यो॑ भवे॒ह ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । त्वा॒ । ग॒न् । रा॒ष्ट्रम् । स॒ह । वर्च॑सा । उत् । इ॒हि॒ । प्राङ् । वि॒शाम् । पति॑: । ए॒क॒ऽराट् । त्वम् । वि । रा॒ज॒ ।सर्वा॑: । त्वा॒ । रा॒ज॒न् । प्र॒ऽदिश॑: । ह्व॒य॒न्तु॒ । उ॒प॒ऽसद्य॑: । न॒म॒स्य᳡: । भ॒व॒ । इ॒ह ॥४.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ त्वा गन्राष्ट्रं सह वर्चसोदिहि प्राङ्विशां पतिरेकराट्त्वं वि राज। सर्वास्त्वा राजन्प्रदिशो ह्वयन्तूपसद्यो नमस्यो भवेह ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । त्वा । गन् । राष्ट्रम् । सह । वर्चसा । उत् । इहि । प्राङ् । विशाम् । पति: । एकऽराट् । त्वम् । वि । राज ।सर्वा: । त्वा । राजन् । प्रऽदिश: । ह्वयन्तु । उपऽसद्य: । नमस्य: । भव । इह ॥४.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजतिलक का उत्सव।

    पदार्थ

    (राजन्) हे राजन् ! (राष्ट्रम्) यह राज्य (त्वा) तुझको (आ, गन्=अगमत्) प्राप्त हुआ है। (वर्चसा सह) तेज के साथ (उत्+इहि=उदिहि) उदय हो। (प्राङ्) अच्छे प्रकार पूजा हुआ, (विशाम्) प्रजाओं का (पतिः) रक्षक, (एकराट्) एक महाराजाधिराज (त्वम्) तू (वि, राज) विराजमान हो। (सर्वाः) सब (प्रदिशः) पूर्वादि दिशायें (त्वा) तुझको (ह्वयन्तु) पुकारें। (उपसद्यः) सबका सेवनीय और (नमस्यः) नमस्कार योग्य (इह) यहाँ पर [अपने राज्य में] (भव) तू हो ॥१॥

    भावार्थ

    राजा सिंहासन पर विराजकर महाप्रतापी और प्रजापालक हो, सब दिशाओं में उसकी दुहाई फिरे और सब प्रजागण उसकी न्यायव्यवस्था पर चलकर उसका सदा आदर और अभिनन्दन करते रहें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(त्वा)। त्वां शूरवीरम्। (आ, गन्)। गमेर्लुङि। मन्त्रे घस०। पा० २।४।८०। इति च्लेर्लुक्। मो नो धातोः। पा० ८।२।६४। इति नत्वम्। आगमत्। प्राप्तम्। (राष्ट्रम्)। अ० १।२९।१। राज्यम्। (सह)। सहितम्। (वर्चसा)। तेजसा। (उदिहि)। उदितः प्रख्यातो भव। (प्राङ्)। ऋत्विग्दधृक्०। पा० ३।२।५९। इति प्र+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्। सम्यक् पूजितः। (विशाम्)। प्रजानाम्। (पतिः)। पालकः। (एकराट्)। सत्सूद्विष०। पा० ३।२।६१। इति एक+राजृ-क्विप्। मुख्यो राजा। (वि राज)। विशेषेण दीप्यस्व, ईश्वरो भव। (सर्वाः)। निखिलाः। (राजन्)। हे नृपते। (प्रदिशः)। अ० १।११।२। प्रकृष्टा दिशः। प्राच्याद्याः। तत्रस्था जनाः। (ह्वयन्तु)। स्वामित्वेन अनुजानन्तु। (उपसद्यः)। उप+षद्लृ गतौ-यत्। सर्वैरुपसदनीयः। सेवनीयः। (नमस्यः)। नमस्य नामधातुः+कर्मणि यत्। नमस्कारयोग्यः। (इह)। अस्मिन् राज्ये। (भव)। वर्त्तस्व ॥

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    विषय

    उपसद्य, नमस्य

    पदार्थ

    १. राज्याभिषेक के समय पुरोहित कहता है [आजकल की भाषा में स्पीकर या न्यायाधीश शपथ दिलाता हुआ कहता है]-हे राजन्! (त्वा) = तुझे (राष्ट्रम्) = यह राष्ट्र (आ अगन्) = प्राप्त हुआ है। तू इस राष्ट्र में (वर्चसा सह उद् इहि) = शक्ति के साथ उत्कृष्ट गतिवाला हो। तू शक्तिशाली बनकर शासन करनेवाला बन । तेरी सारी गति अत्यन्त उत्कृष्ट हो। (प्राइ) = [प्रअञ्च] अग्रगतिवाला होता हुआ (विशांपति:) = प्रजाओं का रक्षक तू (एक-राट) = अद्वितीय शासक अथवा मुख्य शासक [एक-मुख्य, केवल] होता हुआ (त्वम्) = तू विराज-विशिष्ट दीप्तिवाला हो। प्रजाओं के जीवन को व्यवस्थित [regulated] करनेवाला हो। २. हे (राजन्) = राष्ट्र के व्यवस्थापक! (सर्वा:प्रदिश:) = सब विस्तृत दिशाएँ-इन दिशाओं में रहनेवाले लोग (त्वा) = तुझे (हयन्तु) = पुकारें, अर्थात् शासनकार्य के लिए तुझे चुनें। तू (इह) = यहाँ शासक पद पर आसीन होकर (उपसद्य:) = सबके लिए अभिगम्य [Approachable] तथा (नमस्य:) = आदरणीय (भव) = हो। तेरे शासनकार्य की उत्तमता के लिए आवश्यक है कि तू प्रजाओं की ठीक स्थिति से परिचित हो। इसके लिए यह आवश्यक है कि तू प्रजाओं के लिए अभिगम्य हो। तेरे शासन में न्याय-व्यवस्था इतनी ठीक हो कि तू सभी के आदर का पात्र बने।

    भावार्थ

    राजा प्रजाओं के लिए 'उपसद्य व नमस्य' हो।

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    भाषार्थ

    [हे सम्राट !] (त्वा) तुझे (राष्ट्रम्) राष्ट्र (आ गन्) पुनः आ गया है, प्राप्त हो गया है। (वर्चसा सह) निज तेज के साथ (उदिहि) सूर्य के सदृश तू उदित हो, (प्राङ्) प्रगति करता हुआ (विशाम् पतिः) प्रजाओं का पति (त्वम्) तु (एकराट्) मुख्य या अकेला राजा होकर (विराज) विराजमान हो, दीप्यमान हो। (राजन्) हे राजन ! (सर्वा दिशः) सब विशाओं में स्थित प्रजाएँ (त्वा ह्वयन्तु) तेरा आह्वान करें। (इह) इस साम्राज्य में (उपसद्यः) सब द्वारा समीप बैठने योग्य और (नमस्यः) नमस्कार योग्य (भव) तू हो।

    टिप्पणी

    [सूक्त ३ के अनुसार वापस आ गये सम्राट का वर्णन सुक्त ४ में है। एतदर्थ देखो मन्त्र ५, ६, ७। मन्त्र में "उदिहि" पद द्वारा उदय होना कहकर सम्राट् को सूर्य से उपमित किया है। प्राङ् के दो अर्थ हैं-पूर्व दिशा तथा प्रगति करनेवाला। प्राङ=प्र+अञ्चु गतौ। सूर्योदय पूर्व दिशा में ही होता है और पश्चिम की ओर गति करता है। उपसद्य:= उप+षद् (बैठना); अथवा उप + षद् (गतौ) उपगमन करना, समीप जाना, तद्योग्य। षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु (भ्वादिः, तुदादिः)।]

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    विषय

    राजा का राज्याभिषेक ।

    भावार्थ

    राजा को राजसिंहासन पर स्थापित करने का उपदेश करते हैं—हे (राजन्) राजन् ! सबसे अधिक गुणों में प्रकाशमान और सब प्रजाओं के चित्तों को अनुरंजन करने हारे पुरुष ! (त्वा) तुझको (राष्ट्रं) यह राष्ट्र (आगन्) प्राप्त होता है—तेरे हाथों सौंपा जाता है । तू (वर्चसा) अपने पराक्रम और वर्चः-तेज के साथ सूर्य के समान (उद् इहि) ऊपर उठ, उन्नति कर । तू (प्राङ्) सबसे आगे चलने हारा, नेता होने के कारण (विशां) समस्त प्रजाओं का (पतिः) पालक है । त्वं) तू (एकराट्) एकमात्र सर्वोपरि अधिकारी होकर (विराज) शोभा दे―विराजमान हो । हे राजन् ! (त्वा) तुझको (सर्वाः) समस्त (प्रदिशः) दिशा प्रदिशाओं के वासी अथवा उत्तम मार्ग दर्शाने वाली समितिएं (ह्वयन्तु) आदरपूर्वक बुलावें और तेरा स्वागत करें । (इह) इस राष्ट्र में तू सब का (उपसद्यः) प्राप्त करने योग्य शरण योग्य और (नमस्यः) आदर करने योग्य (भव) हो । जिसको समस्त राष्ट्र चुने, जो नेता हो, वही सबसे मुख्य राजपद पर स्थापित किया जाय । सब अधीन देश उसको अपना राजा स्वीकार करें, सब व्यक्ति अपने कष्टों को उससे कहें और सब उसका आदर करें।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘आ त्वा अगत्’ इति ह्विटनि कामितः पदच्छेदः । (द्वि०) ‘प्राकूविशां’ इति पैप्प० सं०, सायणाभितश्च। पूप्रर्वाद् दिशतेरिव प्रादेशिको गुरुः। प्रकृष्टं दिशन्ति इति प्रदिशः विद्वत्सभाः ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ जगती । ५, ६ भुरिजौ । २, ३, ४, ७ त्रिष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Re-establishment of Order

    Meaning

    O refulgent ruler, this Rashtra, this social order has come under your rule and care. Ascend your seat of power with your regal lustre. Shine and rule as the sole ruler and protector of the people, first and foremost citizen of the land. Let the people in all quarters of the republic invoke and honour you as the ruler. Be the highest venerable and approachable man worthy of homage and salutation here.

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    Subject

    Indrah

    Translation

    To you has come the kingdom. Rise up with lusture. First become the lord of people. There-after may you shine as the only sovereign. O prince, may all the quarters (all regions, accept you (as their lord), (and none else). May you be approachable as well as revered here.

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    Translation

    O’ Emperor; the imperial majesty is fallen upon you, you shine with its splendor in the empire and as sovereign imperial ruler rule it. O King let all the regions of the space invite you and be you honored by people and revered by people.

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    Translation

    O King, to thee hath come the kingship; advance with thy splendor. Asa leader, shine as the sole ruler of the people. King, let denizens of all regions invite thee. Here let men wait on thee and bow before thee!

    Footnote

    This hymn describes the coronation of a king

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(त्वा)। त्वां शूरवीरम्। (आ, गन्)। गमेर्लुङि। मन्त्रे घस०। पा० २।४।८०। इति च्लेर्लुक्। मो नो धातोः। पा० ८।२।६४। इति नत्वम्। आगमत्। प्राप्तम्। (राष्ट्रम्)। अ० १।२९।१। राज्यम्। (सह)। सहितम्। (वर्चसा)। तेजसा। (उदिहि)। उदितः प्रख्यातो भव। (प्राङ्)। ऋत्विग्दधृक्०। पा० ३।२।५९। इति प्र+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्। सम्यक् पूजितः। (विशाम्)। प्रजानाम्। (पतिः)। पालकः। (एकराट्)। सत्सूद्विष०। पा० ३।२।६१। इति एक+राजृ-क्विप्। मुख्यो राजा। (वि राज)। विशेषेण दीप्यस्व, ईश्वरो भव। (सर्वाः)। निखिलाः। (राजन्)। हे नृपते। (प्रदिशः)। अ० १।११।२। प्रकृष्टा दिशः। प्राच्याद्याः। तत्रस्था जनाः। (ह्वयन्तु)। स्वामित्वेन अनुजानन्तु। (उपसद्यः)। उप+षद्लृ गतौ-यत्। सर्वैरुपसदनीयः। सेवनीयः। (नमस्यः)। नमस्य नामधातुः+कर्मणि यत्। नमस्कारयोग्यः। (इह)। अस्मिन् राज्ये। (भव)। वर्त्तस्व ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    [হে সম্রাট্ !] (ত্বা) তোমাকে (রাষ্ট্রম্) রাষ্ট্র (আ গন্) পুনঃ এসে গেছে, প্রাপ্ত হয়েছে, (বর্চসা সহ) নিজ তেজের সাথে (উদিহি) সূর্যের সদৃশ তুমি উদিত হও, (প্রাঙ্) প্রগতি করে (বিশাম্ পতিঃ) প্রজাদের পতি (ত্বম্) তুমি (একরাট্) মুখ্য বা একমাত্র রাজা হয়ে (বিরাজ) বিরাজমান হও, দীপ্যমান হও। (রাজা) হে রাজন্ ! (সর্বা দিশঃ) সমস্ত দিশায় স্থিত প্রজাগণ (ত্বা হ্বয়ন্তু) তোমার আহ্বান করুক। (ইহ) এই সাম্রাজ্যে (উপসদ্যঃ) সকলের দ্বারা সন্নিকটে বসার/উপবেশনের যোগ্য এবং (নমস্যঃ) নমস্কার যোগ্য (ভব) তুমি হও।

    टिप्पणी

    [সূক্ত ৩ এর অনুসারে পুনরায় ফিরে আসা সম্রাটের বর্ণনা সূক্ত ৪ এ হয়েছে। এতদর্থ দেখো মন্ত্র ৫, ৬, ৭। মন্ত্রে "উদিহি" পদ দ্বারা উদয় হওয়া বলে সম্রাটকে সূর্যের সাথে উপমিত করা হয়েছে। প্রাঙ্ এর দুটি অর্থ রয়েছে-পূর্ব দিশা এবং প্রগতিশীল। প্রাঙ্=প্র+অঞ্চু গতৌ। সূর্যোদয় পূর্ব দিশাতেই হয় এবং পশ্চিমে অস্ত যায়। উপসদ্যঃ=উপ+ষদ্ (বসা); অথবা উপ+ষদ্ (গতৌ) গমন করা, সন্নিকটে যাওয়া, তদ্যোগ্য। ষদ্লৃ বিশরণগত্যবসাদনেষু (ভ্বাদিঃ, তুদাদিঃ)।]

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    मन्त्र विषय

    রাজ্যাভিষেকোৎসবঃ

    भाषार्थ

    (রাজন্) হে রাজন্ ! (রাষ্ট্রম্) এই রাজ্য (ত্বা) তোমাকে (আ, গন্=অগমৎ) প্রাপ্ত হয়েছে। (বর্চসা সহ) তেজের সাথে (উৎ+ইহি=উদিহি) উদয় হও। (প্রাঙ্) উত্তমরূপে পূজিত, (বিশাম্) প্রজাদের (পতিঃ) রক্ষক, (একরাট্) এক মহারাজাধিরাজ (ত্বম্) তুমি (বি, রাজ) বিরাজমান হও। (সর্বাঃ) সমস্ত (প্রদিশঃ) পূর্বাদি দিশা (ত্বা) তোমাকে (হ্বয়ন্তু) আহ্বান করুক। (উপসদ্যঃ) সকলের সেবনীয় এবং (নমস্যঃ) নমস্কার যোগ্য (ইহ) এখানে [নিজের রাজ্যে] (ভব) তুমি হও॥১॥

    भावार्थ

    রাজা সিংহাসনে বিরাজমান হয়ে মহাপ্রতাপী ও প্রজাপালক হোক, সব দিশায় তাঁর উপকার বর্ষিত হোক এবং সমস্ত প্রজাগণ তাঁর ন্যায়ব্যবস্থা দ্বারা চালিত হয়ে তাঁর সদা আদর ও অভিনন্দন করতে থাকুক ॥১॥

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