अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 16/ मन्त्र 1
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - वरुणः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सत्यानृतसमीक्षक सूक्त
168
बृ॒हन्नेषामधिष्ठा॒ता अ॑न्ति॒कादि॑व पश्यति। यस्ता॒यन्मन्य॑ते॒ चर॒न्त्सर्वं॑ दे॒वा इ॒दं वि॑दुः ॥
स्वर सहित पद पाठबृ॒हन् । ए॒षा॒म् । अ॒धि॒ऽस्था॒ता । अ॒न्ति॒कात्ऽइ॑व । प॒श्य॒ति॒ । य: । स्ता॒यत् । मन्य॑ते । चर॑न् । सर्व॑म् । दे॒वा: । इ॒दम् । वि॒दु॒: ॥१६.१॥
स्वर रहित मन्त्र
बृहन्नेषामधिष्ठाता अन्तिकादिव पश्यति। यस्तायन्मन्यते चरन्त्सर्वं देवा इदं विदुः ॥
स्वर रहित पद पाठबृहन् । एषाम् । अधिऽस्थाता । अन्तिकात्ऽइव । पश्यति । य: । स्तायत् । मन्यते । चरन् । सर्वम् । देवा: । इदम् । विदु: ॥१६.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
वरुण की सर्वव्यापकता का उपदेश।
पदार्थ
(एषाम्) इन [लोकों] का (बृहन्) बड़ा (अधिष्ठाता) अधिष्ठाता [वह वरुण] (अन्तिकात् इव) समीप में वर्तमान सा (पश्यति) देखता है, (यः) जो [वरुण] (तायत्) विस्तार वा पालन (चरन्) करता हुआ (सर्वम्) सब जगत् को (मन्यते) जानता है। (देवाः) व्यवहार में कुशल देवता लोग (इदम्) यह बात (विदुः) जानते हैं ॥१॥
भावार्थ
परमात्मा सर्वनियन्ता, सर्वज्ञाता, सर्वस्रष्टा और सर्वरक्षिता है, इस बात को ऋषि महात्मा साक्षात् करते हैं ॥१॥
टिप्पणी
१−(बृहन्) महान् (एषाम्) दृश्यमानानां लोकानाम् (अधिष्ठाता) नियन्ता (अन्तिकात् इव) समीपदेशाद् यथा (पश्यति) अवलोकयति (यः) वरुणः (तायत्) वर्तमाने पृषद्बृहन्महज्जगच्छतृवच्च। उ० २।८४। इति तायृ सन्तानपालनयोः-अति। विस्तारम्। पालनम् (मन्यते) जानाति (चरन्) चर आचारे-शतृ। कुर्वन् सन् (सर्वम्) सरणशीलं जगत् (देवाः) व्यवहारकुशलाः। विद्वांसः (इदम्) निर्दिष्टं वृत्तम् (विदुः) विदन्ति। जानन्ति। साक्षात् कुर्वन्ति ॥
विषय
वह महान् अधिष्ठाता
पदार्थ
१. (बृहन्) = वह महान् वरुण (एषाम्) = इन सब लोकों व प्राणियों का (अधिष्ठाता) = नियन्ता होता हुआ इन सब प्राणियों से किये जाते हुए कर्मों को (अन्तिकात् इव) = बहुत समीपता से ही (पश्यति) = देख रहा है। प्रभु से किसी का कार्य छिपा हुआ नहीं है। २. (यः) = वे प्रभु (तायत्) = सातत्येन वर्तमान स्थित वस्तु को तथा (चरन्) = चरणशील नश्वर वस्तु को (मन्यते) = जानते हैं-स्थावर जंगमरूप यह सम्पूर्ण जगत् प्रभु के ज्ञान का विषय हो रहा है। जो (इदं सर्वम्) = इस सारी बात को कि 'प्रभु सब-कुछ देख रहे हैं, प्रभु के ज्ञान से कुछ भी परे नहीं' (विदुः) = जानते हैं, वे (देवा:) = देव बनते हैं। प्रभु की सर्वज्ञता व सर्वगष्टत्व को समझते हुए ये पापवृत्ति से दूर रहते हैं और परिणामत: देववृत्ति के बनते हैं इनके जीवन में असुरभाव नहीं पनप पाते।
भावार्थ
वे महान् अधिष्ठाता प्रभु सबको समीपता से देख रहे हैं। स्थावर-जंगम सम्पूर्ण जगत् प्रभु के ज्ञान का विषय बन रहा है। इस बात को समझनेवाले लोग देववृत्ति के बनते हैं।
पदार्थ
शब्दार्थ = ( बृहन् ) = महान् वरुण श्रेष्ठ ( एषाम् अधिष्ठाता ) = इन सब प्राणियों का नियन्ता प्रभु सब प्राणियों के कर्मों को ( अन्तिकादिव पश्यति ) = समीपता से ही जानता है ( यः तायन् मन्यते ) = जो वरुण स्थिर वस्तु को जानता है वही ( चरन् ) = चरणशील को भी जानता है ( सर्वं देवा इदं विदुः ) = चर-अचर स्थूल सूक्ष्म सब वस्तु मात्र को वरुण देव प्रभु जानते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ = हे सर्वत्र व्यापक वरुण श्रेष्ठ प्रभो! आप प्राणिमात्र के नियन्ता और उन सबके कर्मों को सब प्रकार से जाननेवाले जिन से किसी का कोई काम भी छिपा नहीं है, दूरस्थ समीपस्थ चर-अचर स्थूल-सूक्ष्म इन सब ब्रह्मण्डस्थ पदार्थ मात्र को जाननेवाले सर्वत्र व्यापक महान् सब से श्रेष्ठ सबके उपासनीय भी आप ही हैं ।
भाषार्थ
(एषाम् ) इनका (बृहन्) महान् (अधिष्ठाता) नियन्ता, (अन्तिकात् इव) अति समीप से मानो (पश्यति) देखता है। (यः) जो व्यक्ति (चरन्) चलता-फिरता (तायन्) अपने को परिपालित (मन्यते) मानता है, (इदं सर्वम) इस सबको (देवाः) वरुण के पाशहस्त देव (विदुः) जानते हैं।
टिप्पणी
[एषाम् = इन प्रजाजनों का अधिष्ठाता। तायत्= तायन् परिपालित; चरन्=चलता–फिरता हुआ कोई जो दुष्कर्म करता है और फिर भी अपने-आपको वह परिपालित अर्थात् सुरक्षित मानता है, इस सबको वरुण के देव (मन्त्र ४, ६) जानते हैं। तायत्=तायृ सन्तानपालनयोः (भ्वादिः)।]
विषय
राजा और ईश्वर का शासन।
भावार्थ
राजा के गुप्तचर विभाग का वर्णन करते हुए परमेश्वर के राज्य का उपदेश करते हैं। (एषां) इन देवों का (अधिष्ठाता) अधिपति शासक स्वयं (बृहन्) बहुत बड़ा है, जो सबको (अन्तिकात् इव) ऐसे देख रहा है मानों उनके पास ही खड़ा है। तथा उस पुरुष को भी वह देख रहा है (यः) जो पुरुष (स्तायत्) अपने को गुप्त रूप से छुपकर (चरन्) विचरता हुआ, (मन्यते) जानता है, (इदं) यह सब बात (देवाः) देव अर्थात् राष्ट्र के अधिकारीगण जिस प्रकार जानते हैं उसी प्रकार समस्त विद्वान्गण भी (इदं सर्वं) इस सब सत्यं को (विदुः) जानते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। सत्यानृतान्वीक्षणसूक्तम्। वरुणो देवता। १ अनुष्टुप्, ५ भुरिक्। ७ जगती। ८ त्रिपदामहाबृहती। ९ विराट् नाम त्रिपाद् गायत्री, २, ४, ६ त्रिष्टुभः। नवर्चं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
All Watching Divinity
Meaning
Mighty and infinitely great is the ruling lord and master of these worlds of the universe who watches everything as if at the closest, directly, and, expanding these all, alert and ever awake, knows, watches and assesses the entire universe and its working. This, the brilliant divine sages know well.
Subject
Varuna - Truth and Non-Truth
Translation
The mighty overseer of these (worlds), watches as if from very close quarters. Whosoever thinks that he is acting stealthily, all that the bounties of Nature know.
Translation
God, the Mighty Ordainer Of all these worlds beholds, them as if from near at band who Maintaining all the worlds knows all, the learned men know it for certain.
Translation
The mighty Ruler of these worlds beholds as though from close at hand. He protecting the whole world knows it. The learned know this trait of His.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१−(बृहन्) महान् (एषाम्) दृश्यमानानां लोकानाम् (अधिष्ठाता) नियन्ता (अन्तिकात् इव) समीपदेशाद् यथा (पश्यति) अवलोकयति (यः) वरुणः (तायत्) वर्तमाने पृषद्बृहन्महज्जगच्छतृवच्च। उ० २।८४। इति तायृ सन्तानपालनयोः-अति। विस्तारम्। पालनम् (मन्यते) जानाति (चरन्) चर आचारे-शतृ। कुर्वन् सन् (सर्वम्) सरणशीलं जगत् (देवाः) व्यवहारकुशलाः। विद्वांसः (इदम्) निर्दिष्टं वृत्तम् (विदुः) विदन्ति। जानन्ति। साक्षात् कुर्वन्ति ॥
बंगाली (1)
পদার্থ
বৃহন্নেষামধিষ্ঠাতা অন্তিকাদিব পশ্যতি।
য় স্তায়ন্মন্যতে চরন্ত্সর্বং দেবা ইদং বিদুঃ।।১৩।।
(অথর্ব ৪।১৬।১)
পদার্থঃ (বৃহন্) মহান বরণীয় পরমাত্মা (এষাম্ অধিষ্ঠাতা) এই সকল প্রাণীদের নিয়ন্তা, তিনি সকল প্রাণীর কর্মকে (অন্তিকাদিব পশ্যতি) সমীপতা থেকেই বা খুব কাছ থেকেই জানেন। (য়ঃ তায়ন্ মন্যতে) সেই বরুণ স্থির বস্তুুকে জানেন, (চরন্) বিচরণশীলকেও জানেন। (সর্বং দেবা ইদং বিদুঃ) চর অচর স্থূল সূক্ষ্ম সব বস্তুমাত্রকেই সেই দেব জানেন।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ হে সর্বব্যাপক বরণীয় পরমাত্মা! তুমি প্রাণী মাত্রেরই নিয়ন্ত্রক আর তাদের সকলের কর্ম সকল প্রকারে জান। তোমার কাছে কারো কোনো কাজই গোপন নেই। দূরের, নিকটের, চর, অচর, স্থূল, সূক্ষ্ম এই সকল ব্রহ্মাণ্ডস্থ পদার্থমাত্রের জ্ঞাতা সর্বত্র ব্যাপ্ত, সকলের শ্রেষ্ঠ, সকলের উপাসনার যোগ্য তুমি।। ১৩।।
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