अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 34/ मन्त्र 2
ऋषिः - अथर्वा
देवता - ब्रह्मौदनम्
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - ब्रह्मौदन सूक्त
1298
अ॑न॒स्थाः पू॒ताः पव॑नेन शु॒द्धाः शुच॑यः॒ शुचि॒मपि॑ यन्ति लो॒कम्। नैषां॑ शि॒श्नं प्र द॑हति जा॒तवे॑दाः स्व॒र्गे लो॒के ब॒हु स्त्रैण॑मेषाम् ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒न॒स्था: । पू॒ता: । पव॑नेन । शु॒ध्दा: । शुच॑य: । शुचि॑म् । अपि॑ । य॒न्ति॒ । लो॒कम् । न । ए॒षा॒म् । शि॒श्नम् । प्र । द॒ह॒ति॒ । जा॒तऽवे॑दा: । स्व॒:ऽगे । लो॒के । ब॒हु । स्त्रैण॑म् । ए॒षा॒म् ३४.२॥
स्वर रहित मन्त्र
अनस्थाः पूताः पवनेन शुद्धाः शुचयः शुचिमपि यन्ति लोकम्। नैषां शिश्नं प्र दहति जातवेदाः स्वर्गे लोके बहु स्त्रैणमेषाम् ॥
स्वर रहित पद पाठअनस्था: । पूता: । पवनेन । शुध्दा: । शुचय: । शुचिम् । अपि । यन्ति । लोकम् । न । एषाम् । शिश्नम् । प्र । दहति । जातऽवेदा: । स्व:ऽगे । लोके । बहु । स्त्रैणम् । एषाम् ३४.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थ
(अनस्थाः) न गिराने योग्य (पवनेन) शुद्ध आचरण से (पूताः) शुद्ध किये गये, (शुद्धाः) शुद्धस्वभाव, (शुचयः) प्रकाशमान महात्मा लोग (अपि) ही (शुचिम्) ज्योतिःस्वरूप (लोकम्) लोक [परमात्मा] को (यन्ति) पाते हैं। (जातवेदाः) प्राणियों का जाननेवाला परमेश्वर (एषाम्) इनकी (शिश्नम्) गति वा सामर्थ्य को (न) नहीं (प्रदहति) जलाता है। [इसलिये कि] (एषाम्) इन [महात्माओं] का (स्त्रैणम्) सृष्टि का हितकर्म (स्वर्गे) अच्छे प्रकार पाने योग्य सुखदायक (लोके) लोक [परमात्मा] में (बहु) बहुत है ॥२॥
भावार्थ
जितेन्द्रिय शुद्धस्वभाव योगी जन ही परमात्मा को पाते हैं और उस जगदीश्वर के सहारे में रह कर संसार का हित करते हुए सर्वत्रगति होते हैं ॥२॥
टिप्पणी
२−(अनस्थाः) असिसञ्जिभ्यां क्थिन्। उ० ३।१५४। इति असु क्षेपणे−क्थिन्। इति अस्थि क्षेपणम्। छन्दस्यपि दृश्यते। पा० ७।१।७६। इति अस्थि शब्दस्य अनङ् आदेशः। अनसनीयाः। अक्षेपणीयाः। अनिवारणीयाः, इत्यर्थः (पूताः) पवित्रीकृताः (पवनेन) शोधनकर्मणा (शुद्धाः) निर्मलाः (शुचयः) दीप्यमानाः परमयोगिनः (शुचिम्) दीप्यमानं ज्योतिर्मयम् (अपि) अवधारणे (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (लोकम्) परब्रह्मधाम (न) निषेधे (एषाम्) योगिनाम् (शिश्नम्) इण्सञ्जि०। उ० ३।२। इति शश प्लुतगतौ-नक्। शिश्नं श्नथतेः-निरु० ४।१९। गतिम्। बलम् (प्र) (दहति) भस्मीकरोति (जातवेदाः) अ० १।७।२। जातानां वेदिता परमेश्वरः (स्वर्गे) सु+अर्ज-घञ्। सुष्ठु अर्जनीये। सुखप्रदे (लोके) स्थाने (बहु) विपुलम् (स्त्रैणम्) स्त्यायतेर्ड्रट्। उ० ४।१६६। इति स्त्यै शब्दसंघातयोः-ड्रट्। लोपो व्योर्वलि। पा० ६।१।६६। इति यलोपः। टित्वात् ङीप्। इति स्त्री संहतिः। स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात्। पा० ४।१।८७। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति हितार्थे नञ्। स्त्रीभ्यः संहतिभ्यः सृष्टिभ्यो हितम् (एषाम्) ॥
विषय
पूताः, शुचयः
पदार्थ
१. अनस्थाः = जो हाड = मांस से बने हुए शरीर से ऊपर उठ जाते हैं - स्थुलाशरीर के भागों से ऊपर उठे हुए हैं , (पूतः) = जो पवित्र वृत्तिवाले हैं , (पवनेन शुद्धः) = प्राणायाम के द्वारा शुद्ध जीवनवाले बने हैं, (शुचय:) = ज्ञान से दीप्त मस्तिष्कवाले हैं - ये व्यक्ति (शुचिम् लोकम्) = पवित्र लोक को (अपियन्ति) = प्राप्त होते हैं | २. (एषाम्) = इनके (शिश्नम्) = उपस्थेन्द्रिय को (जातवेदाः) = कामाग्री (प्रदहति) = जलती नहीं | ये कामाग्नि से संतप्त नहीं होते | इनका घर स्वर्ग-सा बन जाता है और (एषाम्) = इनके इस (स्वर्गे लोके) = स्वर्गलोक में (बहु स्त्रैणम्) = बहिनों , भोजाइयों, पत्नी व माता आदि कितनी ही स्त्रियों का सुखपूर्वक निवास होता है |
भावार्थ
ज्ञान - भोजन करनेवाले लोग भोतिक सुखों से ऊपर उठकर प्राणसाधना करते हुए पवित्र व दीप्त जीवन बताते हैं| ये लोग कामाग्नि से संतप्त नहीं होते | इनका घर स्वर्ग लोक - सा बन जाता है |
भाषार्थ
(अनस्था:) जो अस्थिपञ्जर नहीं हैं [अपितु मांसल हैं, हृष्ट-पुष्ट हैं] (पूताः) आचार से पवित्र हैं, (पवनेन) प्रवाहित तथा पवित्र वायु द्वारा (शुद्धाः) [शरीर से] शुद्ध हैं। (शुचयः) विचारों द्वारा शुचि हैं, वे ही (शुचिम् लोकम्) शुचि-गृहस्थलोक में (अपि यन्ति) जाते हैं, प्रविष्ट होते हैं। (जातवेदाः) प्रज्ञानी परमेश्वर (एषाम्) इनकी (शिश्नम्) प्रजनन-इन्द्रिय को (न प्र दहति) प्रदग्ध नहीं करता, (स्वर्गे लोके) स्वर्गरूप गृहस्थ लोके में (एषाम्) इनके (बहु स्त्रैणम्) बहुत स्त्रीसमूह के होते हुए भी।
टिप्पणी
[पवनेन=पूञ् पवने (क्र्यादिः), पूङ् पवने (भ्वादिः)। लोकम्= गृहस्थलोक यथा "अदुर्मङ्गली पतिलोकमा विशेमं शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे" (अथर्व० १४।२।४०)। यह मन्त्र विवाह-प्रकरण का है। विवाह के पश्चात् पत्नी पतिलोक अर्थात् पतिगृह में जाती है, न कि मृतपति के मृतलोक में। बहु स्त्रैणम्= गृहस्थ जीवन में नाना स्त्रियाँ होती हैं, माता, भगिनी, चाची, ताई, बेटी, बहुएँ आदि। इन सबके होते हुए, तप से प्रादुर्भूत (मन्त्र १) ब्रह्मचारी, सद्गृहस्थी हुआ, सदाचारपूर्वक निज विवाहित पत्नी के साथ ही गृहस्थ धर्म का व्यवहार करता है, और दुराचारी नहीं होता। कर्मफल प्रदाता, ज्ञानी परमेश्वर ऐसों को शिश्नप्रदाहरूपी दुष्फल प्रदान नहीं करता, शिश्न का निर्वीर्य हो जाना, तथा अन्य घृणित रोगों द्वारा रुग्ण होना 'शिश्न-प्रदाह' है। ऐसा गृहस्थलोक ही स्वर्गलोक है। स्वर्ग के अन्य स्वरूपों के परिज्ञान के लिए देखें (अथर्व० ६।१२२।२), "दातुं चेच्छिक्षान्स स्वर्ग एव"। तथा (अथर्व० १०।२।३१) "अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः"। अयोध्या= शरीर; कोश:= हृदय। हृदय है स्वर्ग, जिसमें कि ब्रह्म का निवास है, स्थिति है (मन्त्र अथर्व १०।२।३२)।]
विषय
विष्टारी ओदन, परम प्रजापति की उपासना और फल।
भावार्थ
उक्त प्रकार के प्रजापति परमात्मा की उपासना एवं ज्ञान करने वाले ब्रह्मचारीगण ऐसे होने चाहिये कि वे (अनस्थाः) खूब हृष्ट पुष्ट और बलिष्ठ हों, उनकी हड्डियां दीखे नहीं, (पूताः) आचार से वे पवित्र हों, (पवनेन शुद्धाः) प्राणायाम की क्रिया द्वारा शुद्ध हों, (शुचयः) विचार से पवित्र हों, ऐसे होकर वे (शुचिं लोकम्) शुद्ध लोक अर्थात् गृहस्थ-लोक को (अपियन्ति) प्राप्त होते हैं। (जातवेदाः) ब्रह्मचर्यावस्था में प्राप्त ज्ञान या परमात्माग्नि का ध्यान (एषाम्) इनकी (शिश्नम्) कामेन्द्रिय को (न दहति) दग्ध नहीं करता, (स्वर्गे लोके) चाहे गृहस्थ स्वर्गलोक में (एषाम्) इनके आस पास (बहु स्त्रैणम्) बहुत सम्बन्धों की स्त्रियां रहती हैं। अर्थात् ब्रह्मचर्यावस्था में आचार-विचार को पवित्र कर के ब्रह्मचारी जब गृहस्थ में प्रवेश करता है तो वह इस आश्रम को स्वर्ग धाम बना देता है। वह ब्रह्मचर्यावस्था में प्राप्त ज्ञान के प्रताप से अपने आपको इस आश्रम में दग्ध नहीं होने देता, चाहे उसके चारों ओर इस गृह आश्रम में बहिनें, माता, चाची, चचेरी बहिन, पुत्रवधू आदि नाना स्त्रियां विद्यमान भी हों।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। ब्रह्मास्यौदनं विष्टारी ओदनं वा देवता। १-३ त्रिष्टुभः। ५ त्र्यवसाना सप्तपदाकृतिः। ६ पञ्चपदातिशक्वरी। ७ भुरिक् शक्वरी, ८ जगती। अष्टर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Worship and Self-Surrender
Meaning
Souls with constant mind, undistracted, holy in conduct and character, purified by pranayama, pure, unsullied by anything within or without, rise to the region of purity. In that region of bliss, the yajnic fire and revelation of truth does not destroy, in fact, it maintains their creative spirit and sustains their productivity in abundance. (They maintain their bliss, creativity and productivity of happy family life through the performance of yajna, a real symbolic act simulating the cosmic creative yajna.)
Translation
Bereft of physical bodies, pure, cleansed with the wind, brilliant, they go to a brilliant world. The fire does not cause burning in their male organ. In the world of happiness they get plenty of women.
Translation
The persons firm in their faith, purified, cleansed with their sacerdotal acts and pure in their conscience attain the state of splendid purity. The all-pervading Divinity does not burn or deprive of their organ of enjoyment and generation and in the state of Svarga they have many women, one for each one as his wife.
Translation
Brahmcharis, who worship God, should be so stout and strong, that their bones be not visible. They should be pure in character, morally elevated through Pranayama (control of breath), and pure in thought. Being equipped with these qualifications, they enter the pure domestic life. The knowledge acquired by them in their stage of celibacy, does not excite their fire of lust, and they remain self-controlled, even in the midst of their female relatives.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(अनस्थाः) असिसञ्जिभ्यां क्थिन्। उ० ३।१५४। इति असु क्षेपणे−क्थिन्। इति अस्थि क्षेपणम्। छन्दस्यपि दृश्यते। पा० ७।१।७६। इति अस्थि शब्दस्य अनङ् आदेशः। अनसनीयाः। अक्षेपणीयाः। अनिवारणीयाः, इत्यर्थः (पूताः) पवित्रीकृताः (पवनेन) शोधनकर्मणा (शुद्धाः) निर्मलाः (शुचयः) दीप्यमानाः परमयोगिनः (शुचिम्) दीप्यमानं ज्योतिर्मयम् (अपि) अवधारणे (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (लोकम्) परब्रह्मधाम (न) निषेधे (एषाम्) योगिनाम् (शिश्नम्) इण्सञ्जि०। उ० ३।२। इति शश प्लुतगतौ-नक्। शिश्नं श्नथतेः-निरु० ४।१९। गतिम्। बलम् (प्र) (दहति) भस्मीकरोति (जातवेदाः) अ० १।७।२। जातानां वेदिता परमेश्वरः (स्वर्गे) सु+अर्ज-घञ्। सुष्ठु अर्जनीये। सुखप्रदे (लोके) स्थाने (बहु) विपुलम् (स्त्रैणम्) स्त्यायतेर्ड्रट्। उ० ४।१६६। इति स्त्यै शब्दसंघातयोः-ड्रट्। लोपो व्योर्वलि। पा० ६।१।६६। इति यलोपः। टित्वात् ङीप्। इति स्त्री संहतिः। स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात्। पा० ४।१।८७। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति हितार्थे नञ्। स्त्रीभ्यः संहतिभ्यः सृष्टिभ्यो हितम् (एषाम्) ॥
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