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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 1
    ऋषिः - बृहद्दिवोऽथर्वा देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - विजयप्रार्थना सूक्त
    109

    ममा॑ग्ने॒ वर्चो॑ विह॒वेष्व॑स्तु व॒यं त्वेन्धा॑नास्त॒न्वं॑ पुषेम। मह्यं॑ नमन्तां प्र॒दिश॒श्चत॑स्र॒स्त्वयाध्य॑क्षेण॒ पृत॑ना जयेम ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मम॑ । अ॒ग्ने॒ । वर्च॑: । वि॒ऽह॒वेषु॑ । अ॒स्तु॒ । व॒यम् । त्वा॒ । इन्धा॑न: । त॒न्व᳡म् । पु॒षे॒म॒ ।मह्य॑म् । न॒म॒न्ता॒म् । प्र॒ऽदिश॑:।चत॑स्र:। त्वया॑ । अधि॑ऽअक्षेण । पृत॑ना: । ज॒ये॒म॒ ॥३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम। मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मम । अग्ने । वर्च: । विऽहवेषु । अस्तु । वयम् । त्वा । इन्धान: । तन्वम् । पुषेम ।मह्यम् । नमन्ताम् । प्रऽदिश:।चतस्र:। त्वया । अधिऽअक्षेण । पृतना: । जयेम ॥३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    रक्षा के उपाय का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमात्मन् ! (विहवेषु) संग्रामों में (मम) मेरा (वर्चः) प्रकाश (अस्तु) होवे। (वयम्) हम लोग (त्वा) तुझको (इन्धानाः) प्रकाशित करते हुए (तन्वम्) अपना शरीर (पुषेम) पोषें। (चतस्रः) चारों (प्रदिशः) बड़ी दिशायें (मह्यम्) मेरे लिये (नभन्ताम्) नमें, (त्वया) तुझ (अध्यक्षेण) अध्यक्ष के साथ (पृतनाः) संग्रामों को (जयेम) हम जीतें ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करके अपने सब बाहरी और भीतरी शत्रुओं को जीत कर आनन्द भोगें ॥१॥ इस सूक्त के मन्त्र−१-५, ६ का पूर्वार्ध, ७ का उत्तरार्ध, ८-१० कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−म० १० सू० १२८ ॥

    टिप्पणी

    १−(मम) (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमात्मन् (वर्चः) प्रकाशः (विहवेषु) ह्वः सम्प्रसारणं च न्यभ्युपविषु। पा० ३।३।७२। इति वि+ह्वेञ् आह्वाने−अप्। शूराणामाह्वानस्थानेषु संग्रामेषु (अस्तु) (वयम्) (त्वा) त्वाम् (इन्धानाः) इन्धेः−शानच्। दीपयन्तः (तन्वम्) स्वशरीरम् (पुषेम) पोषयेम (मह्यम्) मदर्थम् (नमन्ताम्) प्रह्वीभवन्तु (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशाः। तद्वासिनो जना इत्यर्थः (चतस्रः) (त्वया) (अध्यक्षेण) अधि+अक्षू व्याप्तौ−अच्। ईश्वरेण (पृतनाः) संग्रामान्−निघ०−२।१७। (जयेम) अभिभवेम ॥

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    विषय

    चतुर्दिग् विजय

    पदार्थ

    १. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (विहवेषु) = जीवन-संग्रामों में (मम वर्चः अस्तु) = मुझमें वर्चस् हो। इस वर्चस् के द्वारा मैं शत्रुओं को जीतनेवाला बनूं। (वयम्) = हम (त्वा इन्धाना:) = आपको अपने हृदयों से दीस करते हुए (तन्वं पुषेम) = अपने शरीर का उचित पोषण करें। २. मेरी शक्ति इतनी बढ़े कि (चतस्त्र: प्रदिश:) = चारों प्रकृष्ट दिशाएँ (मह्यम्) = मेरे लिए (नमन्ताम्) = नत हो जाएँ। मैं चारों दिशाओं का विजय करनेवाला बनूं। हे प्रभो! (त्वया अध्यक्षेण) = आप अध्यक्ष हों और हम आपकी अध्यक्षता से शक्ति-सम्पन्न होकर (पृतना:) = सब संग्रामों को (जयेम) = जीतनेवाले हों। प्राची दिक का अधिपति 'इन्द्र' बनकर मैं काम को पराजित करूँ। दक्षिणा दिक् का अधिपति 'यम' बनकर मैं क्रोध को जीतूं। प्रतीची दिक् का अधिपति 'वरुण' बनकर मैं लोभ का निवारण करूँ और उदीची दिक् का अधिपति "सोम' बनकर सब दुर्गणों से ऊपर उठ जाऊँ।

    भावार्थ

    हम प्रभु-उपासना करते हुए प्रभु की अध्यक्षता में सब संग्रामों का विजय करें।

    विशेष

    हम प्रभु-उपासना करते हुए प्रभु की अध्यक्षता में सब संग्रामों का विजय करें।

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    भाषार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणी प्रधानमन्त्रिन् ! (विहवेषु१) विविध युद्धों में (मम वर्चः, अस्तु) मेरी प्रख्याति हो, (वयम् ) हम सेनाधिपति लोग (त्वा) हे अग्रणी ! तुझे (इन्धाना:) प्रदीप्त करते हुए, प्रख्यात करते हुए ( तन्वम्) विस्तृत 'साम्राज्य-शरीर'२ को (पुषेम ) परिपुष्ट करें । (चतस्रः प्रदिशः ) साम्राज्य की चारों विस्तृत दिशाएं (मह्यम्) मेरे लिए ( नमन्ताम् ) प्रह्लीभूत हों, (त्वया अध्यक्षेण) तुझ साम्राज्य के अध्यक्ष की छत्रछाया में (पृतनाः) शत्रु सेनाओं को (जयेम) हम सेनिक-वर्ग जीतें । मन्त्र में 'मम, मह्यम्' द्वारा सेनानायक की उक्ति है।

    टिप्पणी

    [समग्र सूक्त में सैन्य शासन का वर्णन है। यद्यपि civil शासन अर्थात् नागरिक शासन के अधिकारी पूर्ववत् स्थिर रहते हैं, तो भी युद्ध अवस्था में सेनानायक "सोम" के हाथ में राज्यव्यवस्था होती है, तभी सोम को राजा कहा है (मन्त्र ७)। सोम है सेनानायक (यजु:० १७।४०) । 'अग्नि' आदि अधिकारी सोम की सहायता करते हैं।] [१. युद्ध के लिए विशेष आह्वानों पर । २. सैनिक वर्ग साम्राज्य को निज शरीरवत् जानकर इस प्रकार उसका परिषोषण करें जैसेकि वे निजशरीरों का परिपोषण करते हैं । यथा "पृष्ठीमें राष्ट्रमुदरम सौ ग्रीवाश्च श्रोणी। ऊरूऽअरत्नी जानुनी विशो मेऽङ्गानि सर्वत:।" यजु:० २०।८)। मन्त्र में पृष्ठीः द्वारा राष्ट्र को कहा है, और विशः अर्थात् प्रजाओं को, शरीर के अन्य अङ्ग। यद्यपि मन्त्र में राष्ट्रशरीर का वर्णन है तो भी इसे साम्राज्यशरीर तथा सार्वभौम शरीर के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए । यही भावना साम्राज्य के अधिकारियों में भी होनी चाहिए।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Strength and Victory

    Meaning

    O light of life, Agni, let my lustre and splendour shine in battles of the brave and assemblies of the wise. May we, lighting and exalting you in yajnic contests, strengthen and advance ourselves in body, mind and soul in the open social order. Let the four directions of the earth recognise and accept me with due honour and felicitation. Let us all win all round in the struggles for higher life under your leadership and watchful eye.

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    Subject

    Agnih

    Translation

    O fire divine, may there be glory for me in battles; enkindling you, may we develop our body. May all the four mid-regions bow to me; with you as our leadér, may we conquer the invading hordes. (Also Rg. X.128.1)

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    Translation

    Let this fire of Yajna make strength of mine prevail in the battles, we enkindling this fire support our bodies. May the four regions of the heaven bend and bow before us. With this powerful fire we may win the combat.

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    Translation

    O God, let me acquire eminence in battles, enkindling Thee may we Support our bodies and souls. May the denizens of four regions bend and bow before me: with Thee for Guardian may we win the foe's army!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(मम) (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमात्मन् (वर्चः) प्रकाशः (विहवेषु) ह्वः सम्प्रसारणं च न्यभ्युपविषु। पा० ३।३।७२। इति वि+ह्वेञ् आह्वाने−अप्। शूराणामाह्वानस्थानेषु संग्रामेषु (अस्तु) (वयम्) (त्वा) त्वाम् (इन्धानाः) इन्धेः−शानच्। दीपयन्तः (तन्वम्) स्वशरीरम् (पुषेम) पोषयेम (मह्यम्) मदर्थम् (नमन्ताम्) प्रह्वीभवन्तु (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशाः। तद्वासिनो जना इत्यर्थः (चतस्रः) (त्वया) (अध्यक्षेण) अधि+अक्षू व्याप्तौ−अच्। ईश्वरेण (पृतनाः) संग्रामान्−निघ०−२।१७। (जयेम) अभिभवेम ॥

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