अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 9
ऋषिः - अथर्वा
देवता - हेतिः
छन्दः - प्रस्तारपङ्क्तिः
सूक्तम् - ब्रह्मविद्या सूक्त
59
चक्षु॑षो हेते॒ मन॑सो हेते॒ ब्रह्म॑णो हेते॒ तप॑सश्च हेते। मे॒न्या मे॒निर॑स्यमे॒नय॒स्ते स॑न्तु॒ ये॒स्माँ अ॑भ्यघा॒यन्ति॑ ॥
स्वर सहित पद पाठचक्षु॑ष: । हे॒ते॒ । मन॑स: । हे॒ते॒ । ब्रह्म॑ण: । हे॒ते॒ । तप॑स: । च॒ । हे॒ते॒ । मे॒न्या: । मे॒नि: । अ॒सि॒ । अ॒मे॒नय॑: । ते । स॒न्तु॒ । ये । अ॒स्मान् । अ॒भि॒ऽअ॒घा॒यन्ति॑ ॥६.९॥
स्वर रहित मन्त्र
चक्षुषो हेते मनसो हेते ब्रह्मणो हेते तपसश्च हेते। मेन्या मेनिरस्यमेनयस्ते सन्तु येस्माँ अभ्यघायन्ति ॥
स्वर रहित पद पाठचक्षुष: । हेते । मनस: । हेते । ब्रह्मण: । हेते । तपस: । च । हेते । मेन्या: । मेनि: । असि । अमेनय: । ते । सन्तु । ये । अस्मान् । अभिऽअघायन्ति ॥६.९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सब सुख प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थ
[हे अग्ने परमात्मन् !] (चक्षुषः) [शत्रुओं की] आँख की (हेते) बरछी ! (मनसः) हे मन की (हेते) बरछी ! (ब्रह्मणः) हे अन्न की (हेते) बरछी ! (च) और (तपसः) सामर्थ्य की (हेते) बरछी ! तू (मेन्याः) वज्र का (मेनिः) वज्र (असि) है। (ते) वे लोग (अमेनयः) वे वज्र (सन्तु) होवें (ये) जो (अस्मान्) हमें (अभ्यघायन्ति) सताना चाहते हैं ॥९॥
भावार्थ
जिस प्रकार चोर आदि दुष्टों को दण्ड देकर असमर्थ कर देते हैं, इसी प्रकार मनुष्य परमेश्वर का आश्रय लेकर अपने दोषों को निर्बल करदें ॥९॥
टिप्पणी
९−(चक्षुषः) शत्रूणां नेत्रस्य (हेते) अ० १।१३।३। हननशक्ते। वज्र, वज्ररूप (मनसः) अन्तःकरणस्य (हेते) (ब्रह्मणः) अन्नस्य−निघ० २।७। (हेते) (तपसः) सामर्थ्यस्य (च) समुच्चये (हेते) (मेन्याः) अ० २।११।१। वज्रस्य (मेनिः) वज्रः (असि) भवसि (अमेनयः) अवज्राः (ते) शत्रवः (सन्तु) (ये) (अस्मान्) धार्मिकान् (अभ्यघायन्ति) छन्दसि परेच्छायामपि वक्तव्यम्। वा० पा० ३।१।८। अश्वाघस्यात्। पा० ७।४।३७। इति आत्वम्। अभितः परस्याघमिच्छन्ति ॥
विषय
'चक्षु, मन ब्रह्म व तप' का वज्र
पदार्थ
१. हे (चक्षुषः हेते) = चक्षु के वज्र ! (मनसः हेते) = मन के वज्र ! (ब्रह्मणः हेते) = ज्ञान के वज्र ! (च) = और (तपसः हेते) = तप के वज्र ! तू (मेन्याः मेनिः असि) = वज्रों का भी वज्र है। 'आँख से सबको भद्र दृष्टि से देखना, मन से सबके कल्याण की कामना करना, ज्ञान से सबमें आत्मभाव का होना, तप से दिव्य वृत्तिवाला बनना'- ये चार बातें वे वज्र हैं जोकि सब शत्रुओं का विनाश करनेवाले हैं । २. (ये) = जो (अस्मान् अभि) = हमारे प्रति (अघायन्ति) = अघ (पाप) की कामनावाले होते हैं, (ते) = वे (अमेनयः सन्तु) = वज्ररहित हो जाएँ। हमारी भद्रदृष्टि, पवित्र मानसभाव, ज्ञान के कारण आत्मदृष्टि तथा तपोजन्य निःस्वार्थ वृत्ति अघायुओं को भी पवित्र बना दे। इन वज्रों के सामने उनके आयस वज्र निकम्मे पड़ जाएँ ।
भावार्थ
हम भद्रदृष्टि, शुभविचार, आत्मैक्य दृष्टि तथा तपोजन्य दिव्य वृत्ति द्वारा शत्रुओं को भी मित्र बनाने में समर्थ हों ।
भाषार्थ
(चक्षुषः) चक्षुः१ सम्बन्धी [पाप-वृत्र के लिए] (हेते) अस्त्ररूप ! (मनसः) मनःसम्बन्धी [पाप-वृत्र के लिए ] ( हेते) अस्त्ररूप ! (ब्रह्मणः) वैदिक जीवन-सम्बन्धी [पाप-वृत्र के लिए ] (हेते) अस्त्ररूप ! (तपसा: च ) और तपः सम्बन्धी [पाप-वृत्र के लिए ] (हेते) अस्त्ररूप [हे ब्रह्म !] तू (मेन्याः) पाप-वृत्रसम्बन्धी घातक वज्र का ( मेनिः) घातक वच ( असि) है। (ते) वे पाप-वृत्र (अमेनयः) घातक वज्रों से रहित (सन्तु) हो जाएँ, (ये) जो पाप-वृत्र कि (अस्मान् अभि ) हमें लक्ष्य कर ( अधायन्ति ) हत्यारूप पापकर्म करना चाहते हैं।
टिप्पणी
[समग्र मूक्त में पाप-वृत्रों के विनाश का वर्णन है। ये पाप-वृत्र हैं पापभावनाएँ तथा पाप कर्म (मन्त्र ४, ८)। इन्हें ही मन्त्र ८ में दुरित और अवद्य कहा है तथा मन्त्र ९ में इन्हीं वृत्रों के विनाश के लिए ब्रह्म को हेतिरूप कहा है, और घातक वज्ररूप भी । बिना ब्राह्मी सहायता के पाप-वृत्रों का विनाश सम्भव नहीं। पाप-वृत्र हमारी आध्यात्मिक दृष्टिशक्ति, मननशक्ति और तपोमय जीवन के विघातक हैं। पाप-वृत्र जोवननिष्ठ ब्राह्मीज्योति या वैदिक जीवन के भी विघातक हैं, जिन्हें ब्राह्मी-ज्योति अस्त्र और मेनिरूप होकर विनष्ट करती है। मेनिः वज्रनाम (निघं० २।२०)। यह मेनि-वज्र घातक है “मीञ् हिंसायाम्" (क्र्यादिः) । अघायन्ति= अघं हन्तेनिर्ह्र सितोपसर्ग आहन्तीति (निरुक्त ६।३।११)। "अघायन्ति" में बहुवचन भिन्न-भिन्न नाना पाप वृत्रों का सुचक है, यथा "पापवृत्र हैं काम, कोध, लोभ, मोह" आदि । ] [१. आध्यात्मिक दिव्य चक्षु, दिव्य दृष्टि ।]
विषय
जगत्-स्रष्टा और राजा का वर्णन।
भावार्थ
हे (चक्षुषः हेते) चक्षु के आयुध ! हे (मनसः हेते) मन के आयुध ! हे (ब्रह्मणः हेते) ब्रह्म = ज्ञान के आयुध ! और (तपसः च हेते) तपः सामर्थ्य के आयुधरूप राजन् ! तू (मेन्याः मेनिः असि) मेनि = आयुध का भी तू आयुध है। (ये अस्मान्) जो हम पर (अभि अधायन्ति) सब तरफ से पापाचार करना चाहते हैं (ते अमेनयः सन्तु) वे सदा बिना हथियार के रहें। शत्रु पर आंख रख कर उसको दबाना चक्षु का शस्त्र फैंकना है। मानस—मन्त्र- शक्ति से दबाना मन का हथियार चलाना है, विद्वानों के विज्ञान का वार करना ब्रह्म का हथियार चलाना है, इसी प्रकार बल, तपस्या, सहन-शक्ति से शत्रु पर वार करना तप का हथियार चलाना है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। १ सोमरुदौ, ब्रह्मादित्यौ, कर्माणि रुद्रगणाः हेतिश्च देवताः। १ त्रिष्टुप्। २ अनुष्टुप्। ३ जगती। ४ अनुष्टुबुष्णिक् त्रिष्टुब्गर्भा पञ्चपदा जगती। ५–७ त्रिपदा विराड् नाम गायत्री। ८ एकावसना द्विपदाऽनुष्टुप्। १० प्रस्तारपंक्तिः। ११, १३, पंक्तयः, १४ स्वराट् पंक्तिः। चतुर्दशर्चं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Brahma Vidya
Meaning
O evil of the eye, imprecation of the mind, chant- power of mantric vengeance, pride of austere ritual, know your limitations. O Agni, light and fire of life, you are the power-strike of power itself, super-thunder over all arms and missiles. May those who wish to malign, strike and torture us be disarmed of their weapons and power.
Subject
Heti - Missile
Translation
O missile of vision, missile of mind, missile of knowledge and missile of austerities, you are the weapon of weapons. May they become weaponless who commit sins against us. (Caksuse hete = missile of vision; manaso hete — missile of mind; brahmano hete = missile of knowledge)
Translation
This Agni, the fire is the missile of eyes, missile of mind, missile of Knowledge and missile of ferver. This is the weapon against the weapon. Let those persons who assail us be weaponless.
Translation
O King, the missile of the eye, missile of mind, missile of knowledge, missile of austerity; thou art the weapon shot against the weapon. Let those be weaponless who sin against us.
Footnote
The fiery eye, the strong mind, vast knowledge, and austerity of the king are his powerful weapons, wherewith thou enslavest foe.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
९−(चक्षुषः) शत्रूणां नेत्रस्य (हेते) अ० १।१३।३। हननशक्ते। वज्र, वज्ररूप (मनसः) अन्तःकरणस्य (हेते) (ब्रह्मणः) अन्नस्य−निघ० २।७। (हेते) (तपसः) सामर्थ्यस्य (च) समुच्चये (हेते) (मेन्याः) अ० २।११।१। वज्रस्य (मेनिः) वज्रः (असि) भवसि (अमेनयः) अवज्राः (ते) शत्रवः (सन्तु) (ये) (अस्मान्) धार्मिकान् (अभ्यघायन्ति) छन्दसि परेच्छायामपि वक्तव्यम्। वा० पा० ३।१।८। अश्वाघस्यात्। पा० ७।४।३७। इति आत्वम्। अभितः परस्याघमिच्छन्ति ॥
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