अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 108/ मन्त्र 5
मे॒धां सा॒यं मे॒धां प्रा॒तर्मे॒धां म॒ध्यन्दि॑नं॒ परि॑। मे॒धां सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒र्वच॒सा वे॑शयामहे ॥
स्वर सहित पद पाठमे॒धाम् । सा॒यम् । मे॒धाम् । प्रा॒त: । मे॒धाम् । म॒ध्यन्दि॑नम् । परि॑ । मे॒धाम् । सूर्य॑स्य । र॒श्मिऽभि॑: । वच॑सा । आ । वे॒श॒या॒म॒हे॒ ॥१०८.५॥
स्वर रहित मन्त्र
मेधां सायं मेधां प्रातर्मेधां मध्यन्दिनं परि। मेधां सूर्यस्य रश्मिभिर्वचसा वेशयामहे ॥
स्वर रहित पद पाठमेधाम् । सायम् । मेधाम् । प्रात: । मेधाम् । मध्यन्दिनम् । परि । मेधाम् । सूर्यस्य । रश्मिऽभि: । वचसा । आ । वेशयामहे ॥१०८.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
बुद्धि और धन की प्राप्ति के लिये उपदेश।
पदार्थ
(मेधाम्) शुभ गुणवाली बुद्धि वा सम्पत्ति को (सायम्) सायंकाल, (मेधाम्) शास्त्रादि विषयवाली बुद्धि वा सपत्ति को (प्रातः) प्रातःकाल, (मेधाम्) धर्म का स्मरण रखनेवाली बुद्धि वा सम्पत्ति को (मध्यन्दिनम् परि) मध्याह्न समय में, (मेधाम्) सत्य व्यवहारवाली बुद्धि वा संपत्ति को (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मिभिः) फैलनेवाली किरणों के साथ (वचसा) परस्पर बातचीत से (आ) भले प्रकार (वेशयामहे) हम स्थापित करते हैं ॥५॥
भावार्थ
मनुष्य सोते, जागते, और कर्म करते धार्मिक बुद्धि और सम्पत्ति को सूर्य के प्रकाश के समान विस्तीर्ण करके आनन्द प्राप्त करें ॥५॥
टिप्पणी
५−(मेधाम्) शुभगुणवतीं बुद्धिं सम्पत्तिं वा (सायम्) सायंकाले (मेधाम्) शास्त्रादिविषयां सम्पत्तिं वा (प्रातः) प्रातःकाले (मेधाम्) धर्म्मस्मरणशीलां बुद्धिं सम्पत्तिं वा (मध्यन्दिनम्) दिनस्य मध्यं राजदन्तादित्वात् पूर्वनिपातः। पृषोदरादित्वान्नकारागमः। मध्याह्नम् (परि) लक्षणेत्थं भूताख्यान०। पा० १।४।९०। इति इत्थंभूताख्यांए कर्मप्रवचनीयत्वम्। प्रति (मेधाम्) सत्यव्यवहारां बुद्धिं सम्पत्तिं वा (सूर्यस्य) आदित्यस्य (रश्मिभिः) व्यापकैः किरणैः (वचसा) परस्परसम्वादेन (आ) समन्तात् (वेशयामहे) आत्मनि स्थापयामः ॥
विषय
सूर्यरश्मिभिः वचसा
पदार्थ
१. (मेधाम्) = इस मेधाबुद्धि को सायम्-सायंकाल, इस मेधाम-मेधा को प्रात:-प्रात:काल तथा इस (मेधाम्) = मेधाबुद्धि को मध्यन्दिनं परि-मध्याह में वेशयामहे-अपने अन्दर स्थापित करने के लिए यत्नशील होते हैं। यह प्रयत्न ही वस्तुत: 'प्रात:सवन, माध्यन्दिनसवन व सायन्तन सवन' हैं। २. हम इस (मेधाम्) = मेधा को (सूर्यस्य रश्मिभि:) = ज्ञान के सूर्य प्रभु के ज्ञान की किरणों के द्वारा तथा (वचसा) = वेदवचनों के द्वारा अपने में धारण करने के लिए प्रयत्नशील होते हैं। उस सूर्य की रश्मियों की प्राप्ति के लिए साधनभूत ध्यान, प्राणायाम आदि को अपनाते हैं तथा वेदवचनों का स्वाध्याय करते हैं।
भावार्थ
हम 'प्रातः, मध्याह्न व सायं' सदा मेधा को प्रास करने के लिए यत्नशील हों। हम ध्यान द्वारा ज्ञान के सूर्य प्रभु की रश्मियों को देखने का यत्न करें और स्वाध्याय द्वारा वेदवाणी को प्राप्त करें। यही मेधावी बनने का मार्ग है।
विशेष
बुद्धि की साधना में प्रवृत्त मनुष्य 'अथर्वा' बनता है-संसार के विषयों से आन्दोलित न होनेवाला। अगले चार सूक्तों का यही ऋषि है। यह पिप्पली के प्रयोग से शरीर को नीरोग रखता है।
भाषार्थ
(मेधाम्) मेधा को (सायम्) सायंकाल में, (मेधाम्) मेधा को (प्रातः) प्रातःकाल में, (मेधाम्) मेधा को (मध्यन्दिनं परि) मध्याह्न काल के आस-पास, (मेधाम) मेधा को (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मिभिः) रश्मियों के साथ अर्थात् सूर्योदय काल में, (वचसा) वेदवाणी के [स्वाध्याय] द्वारा (आवेशयामहे) हम चित्त में आविष्ट करते हैं, स्थापित करते हैं।
टिप्पणी
[स्वाध्याय काल का क्रम है, सूर्योदय प्रातः मध्यन्दिन, सायम्]
विषय
मेधा का वर्णन।
भावार्थ
(सायम्) सायंकाल के समय (मेधाम्) बुद्धि-शक्ति को, (वचसा) वैदिक वचनों के अनुसार (आवेशयामहे) अपने में हम स्थापित करते हैं, (प्रातः) प्रातःकाल के समय (मेधाम्) बुद्धि-शक्ति को अपने में हम स्थापित करते हैं, (मध्यन्दिनं परि) मध्याह्न काल में (मेधाम्) बुद्धि-शक्ति को अपने में हम स्थापित करते हैं, (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मिभिः) किरणों के समय (मेधाम्) बुद्धि-शक्ति को अपने में हम स्थापित करते हैं। अर्थात् जागते हुए किसी समय में भी हम बुद्धि-शक्ति से रहित न हों।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शौनक ऋषिः। मेधा देवता। ४ अग्निर्देवता। १, ४, ५ अनुष्टुप्, २ उरोबृहती, ३ पथ्या वृहती। पञ्चर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Intelligence
Meaning
With words of vision and holiness of faith, and with radiations of the sun-rays, we adore and inculcate in ourselves divine intelligence day and night: intelligence every morning intelligence every evening, intelligence at the noon tide of the day.
Subject
Medha.
Translation
The understanding in the evening, the understaning in the moming, the understanding throughout the noon, the understanding with the rays of the sun and with the speech we induct into ourselves.
Translation
We cultivate into us the intelligence at eve, at morning and at the noon time. We attain it through speech and through the beams of the Knowledge of the Divinity.
Translation
We plant in our soul, with Vedic words, wisdom, at eve, at morn, Wisdom at noon of day, and at the time of the rising of the Sun's beams.
Footnote
At no time should we be bereft of wisdom. It should be our constant companion.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(मेधाम्) शुभगुणवतीं बुद्धिं सम्पत्तिं वा (सायम्) सायंकाले (मेधाम्) शास्त्रादिविषयां सम्पत्तिं वा (प्रातः) प्रातःकाले (मेधाम्) धर्म्मस्मरणशीलां बुद्धिं सम्पत्तिं वा (मध्यन्दिनम्) दिनस्य मध्यं राजदन्तादित्वात् पूर्वनिपातः। पृषोदरादित्वान्नकारागमः। मध्याह्नम् (परि) लक्षणेत्थं भूताख्यान०। पा० १।४।९०। इति इत्थंभूताख्यांए कर्मप्रवचनीयत्वम्। प्रति (मेधाम्) सत्यव्यवहारां बुद्धिं सम्पत्तिं वा (सूर्यस्य) आदित्यस्य (रश्मिभिः) व्यापकैः किरणैः (वचसा) परस्परसम्वादेन (आ) समन्तात् (वेशयामहे) आत्मनि स्थापयामः ॥
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