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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 73 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 73/ मन्त्र 10
    ऋषिः - अथर्वा देवता - घर्मः, अश्विनौ छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - धर्म सूक्त
    47

    अग्ने॒ शर्ध॑ मह॒ते सौभ॑गाय॒ तव॑ द्यु॒म्नान्यु॑त्त॒मानि॑ सन्तु। सं जा॑स्प॒त्यं सु॒यम॒मा कृ॑णुष्व शत्रूय॒ताम॒भि ति॑ष्ठा॒ महां॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अग्ने॑ । शर्ध॑ । म॒ह॒ते । सौभ॑गाय । तव॑ । द्यु॒म्नानि॑ । उ॒त्ऽत॒मानि॑ । स॒न्तु॒ । सम् । जा॒:ऽप॒त्यम् । सु॒ऽयम॑म् । आ । कृ॒णु॒ष्व॒ । श॒त्रु॒यऽय॒ताम् । अ॒भि । ति॒ष्ठ॒ । महां॑सि ॥७७.१०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु। सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभि तिष्ठा महांसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने । शर्ध । महते । सौभगाय । तव । द्युम्नानि । उत्ऽतमानि । सन्तु । सम् । जा:ऽपत्यम् । सुऽयमम् । आ । कृणुष्व । शत्रुयऽयताम् । अभि । तिष्ठ । महांसि ॥७७.१०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 73; मन्त्र » 10
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (शर्ध) हे बलवान् (अग्ने) विद्वान् राजन् ! (महते) हमारे बड़े (सौभगाय) सुन्दर ऐश्वर्य के लिये (तव) तेरे (द्युम्नानि) यश वा धन (उत्तमानि) अति ऊँचे (सन्तु) होवें। (जास्पत्यम्) [हमारे] पत्नी-पतिधर्म [गृहस्थ आश्रम] को (सुयमम्) सुन्दर नियम युक्त (सम् आ) बहुत ही भले प्रकार (कृणुष्व) कर, (शत्रूयताम्) शत्रुसमान आचरण करनेवालों के (महांसि) बलों को (अभि तिष्ठ) परास्त कर दे ॥१०॥

    भावार्थ

    संयमी पुरुषार्थी स्त्री-पुरुष बड़ा ऐश्वर्य, कीर्ति, बल प्राप्त करके शत्रुओं को जीत कर प्रजापालन करें ॥१०॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है−५।२८।३। और यजु०−३३।१२ ॥

    टिप्पणी

    १०−(अग्ने) विद्वन् राजन् (शर्ध) शृधु उन्दे उत्साहे वा-पचाद्यच्। बलवन्। शर्धः=बलम्-निघ० २।९। (महते) प्रभूताय (सौभगाय) शोभनैश्वर्याय (तव) (द्युम्नानि) अ० ६।३५।३। धनानि यशांसि वा (उत्तमानि) उद्गततमानि। उन्नततमानि (सन्तु) (सम्) सम्यक् (जास्पत्यम्) पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्। पा० ५।१।१२८। जायापति-यक्, छान्दसो या शब्दलोपः सुडागमश्च। जायापत्यम्। पत्नीपतिधर्मं (सुयमम्) ईषद्दुःसुषु०। पा० ३।३।१२६। इति खल्। जितेन्द्रियत्वादिनियमयुक्तम् (आ) समन्तात् (कृणुष्व) कुरु (शत्रूयताम्) शत्रुवदाचरताम् (अभि तिष्ठ) आक्रमस्व। अभिभव (महांसि) तेजांसि। बलानि ॥

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    विषय

    महते सौभगाय

    पदार्थ

    १. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! आप हमारे (महते सौभगाय) = महान् सौभाग्य के लिए (शर्ध) = आईहदय होओ। [शुधु उन्दने] हमें धन देने के लिए उत्तम मनबाले होओ। (तव) = आपके, आपसे दिये गये (द्युम्नानि) = [Wealth] ऐश्वर्य (उत्तमानि सन्तु) = उत्कृष्ट हों। २. (जास्पत्यम्) = हमारे पति-पत्नी के कर्म को (सयमम्) = उत्तम संयमवाला (सम् आकृणुष्व) = सम्यक् कीजिए। (शत्यताम्) = हमारे प्रति शत्रु की तरह आचरण करते हुए इन शत्रुओं के (महांसि) = तेजों को (अभितिष्ठ) = अभिभूत कीजिए। ये शत्रु हमें पराजित न कर सकें।

    भावार्थ

    प्रभुकृपा से हम सौभाग्यवाले बनें। प्रभु-प्रदत्त ये धन उत्तम हों। हमारा गृहस्थकर्म बड़ा संयमवाला हो। शत्रुओं के तेज को हम प्रभुकृपा से अभिभूत कर पाएँ।

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    भाषार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणी ! (महते सौभगाय) हमारे महासौभाग्य के लिये (शर्ध) तू दयार्द्रहृदय हो जा (तव) तेरे (द्युम्नानि) यश (उत्तमानि) समुन्नत (सन्तु) हों। (जास्पत्यम्) पति-पत्नी सम्बन्ध को (सुयमम्) सुनियन्त्रित (आ कृणुष्व) कर (शत्रूयताम्) शत्रुता चाहने वालों के (महांसि) तेजों को (अभितिष्ठ) पदाक्रान्त कर, अभिभूत कर।

    टिप्पणी

    [शर्ध= शृधु मृधु उन्दने (भ्वादिः)। द्युम्नम् = द्योततेः "यशो वा अन्नम् वा" (निरुक्त पद ३३; ५।१।५)। जास्पत्यम्= जाया और पति का सम्बन्ध सुयमम् = यज्ञिय वैवाहिक अग्नि द्वारा जाया पति का सम्बन्ध वैधानिक तो हो जाता है, परन्तु यह अग्नि इस सम्बन्ध को "सुयम" अर्थात् सुनियन्त्रित नहीं कर सकती, और न शत्रुओं के तेजों का पराभव कर सकती है। वैवाहिक सम्बन्ध का सुनियन्त्रण तो राष्ट्र की अग्नि [अग्रणी] ही एतत्सम्बन्धी नियमों के निर्माण द्वारा कर सकती है, और राष्ट्राग्नि ही शत्रुओं के तेजों का पराभव कर सकती है। तथा न वैवाहिक अग्नि के साथ दयार्द्रता का ही सम्बन्ध सम्भव है]।

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    विषय

    ब्रह्मानन्द रस।

    भावार्थ

    हे (अग्ने) अग्ने ! अग्रणी ! ज्ञानवन् ! तू (महते सौभगाय) बड़े भारी सौभाग्य, उत्तम यश और सुखसम्पत्ति प्राप्त करने के लिये (शर्ध*) उत्साह कर। इस प्रकार (तव) तेरे (उत्तमानि) उत्तम, उत्कृष्ट कोटि के (द्युम्नानि) यश और धन (सन्तु) हों। हे राजन् ! तू (जास्पत्यं*) पति-पत्नी के परस्पर के दाम्पत्य सम्बन्ध को (सु-यमम्) उत्तम रीति से सुदृढ (सम् आकृणुष्व) कर। और (शत्रूयताम्) शत्रु के समान आचरण करनेवाले पुरुषों के (महांसि) सब तेजों, बलों को (अभि तिष्ठ) दबा। राजा अपने पराक्रम से राज्य सम्पत्ति को बढ़ावे, राष्ट्र में पतिपत्नी के सम्बन्ध को सुदृढ़ करे। और शत्रु के समान व्यवहार करनेवाले राजद्रोहियों के बलों को दबावे।

    टिप्पणी

    ऋग्यजुषोर्विश्ववारा आत्रयी ऋषिका। शर्धद् उत्सहतामिति निरुक्तं (नै० अ० ४। ख० १९) ‘जास्पत्यं’ जाया च पतिश्च जास्पती, तयोः कर्म इति सायणः। दाम्पत्यमित्यर्थः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। अश्विनौ देवते। धर्मसूक्तम्। १, ४, ६ जगत्यः। २ पथ्या बृहती। शेषा अनुष्टुभः। एकादशर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Yajna Karma

    Meaning

    O mighty Agni, light of life, great and highest are your gifts of wealth, honour and splendour. May they be good and auspicious for our great good fortune. Bless us that our familial loyalty and discipline be good, divinely controlled and directed, and let the powers of our negative forces be kept down, ineffectualised.

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    Translation

    May you repress, O fire-divine, our foes: to ensure us our great prosperity. May your éffulgent splendour be excellent. May you preserve in concord the relation of man and wife, and may you overpower the energies of our adversaries. (Also Rg. V.28.33; Yv.XXXIII.12)

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.77.10AS PER THE BOOK

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    Translation

    Let the most excellent effulgence and splendors of this mighty fire be for our excessive happiness, let it make easy for us to maintain our house-hold supremacy and let it become the means of overcoming the might of our internal foes which trouble us.

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    Translation

    O brave King, may thy excellent effulgent splendors be for our bliss. Strengthen through Brahmcharya the well-knit bond of wife and husband, and trample down the might of our foes!

    Footnote

    See Rig, 5-28-3, Yajur, 33-12.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १०−(अग्ने) विद्वन् राजन् (शर्ध) शृधु उन्दे उत्साहे वा-पचाद्यच्। बलवन्। शर्धः=बलम्-निघ० २।९। (महते) प्रभूताय (सौभगाय) शोभनैश्वर्याय (तव) (द्युम्नानि) अ० ६।३५।३। धनानि यशांसि वा (उत्तमानि) उद्गततमानि। उन्नततमानि (सन्तु) (सम्) सम्यक् (जास्पत्यम्) पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्। पा० ५।१।१२८। जायापति-यक्, छान्दसो या शब्दलोपः सुडागमश्च। जायापत्यम्। पत्नीपतिधर्मं (सुयमम्) ईषद्दुःसुषु०। पा० ३।३।१२६। इति खल्। जितेन्द्रियत्वादिनियमयुक्तम् (आ) समन्तात् (कृणुष्व) कुरु (शत्रूयताम्) शत्रुवदाचरताम् (अभि तिष्ठ) आक्रमस्व। अभिभव (महांसि) तेजांसि। बलानि ॥

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