अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 73/ मन्त्र 5
ऋषिः - अथर्वा
देवता - घर्मः, अश्विनौ
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - धर्म सूक्त
43
त॒प्तो वां॑ घ॒र्मो न॑क्षतु॒ स्वहो॑ता॒ प्र वा॑मध्व॒र्युश्च॑रतु॒ पय॑स्वान्। मधो॑र्दु॒ग्धस्या॑श्विना त॒नाया॑ वी॒तं पा॒तं पय॑स उस्रियायाः ॥
स्वर सहित पद पाठत॒प्त: । वा॒म् । ध॒र्म: । न॒क्ष॒तु॒ । स्वऽहो॑ता । प्र । वा॒म् । अ॒ध्व॒र्यु: । च॒र॒तु॒ । पय॑स्वान् । मधो॑: । दु॒ग्धस्य॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । त॒नाया॑: । वी॒तम् । पा॒तम् । पय॑स: । उ॒स्रिया॑या: ॥७७.५॥
स्वर रहित मन्त्र
तप्तो वां घर्मो नक्षतु स्वहोता प्र वामध्वर्युश्चरतु पयस्वान्। मधोर्दुग्धस्याश्विना तनाया वीतं पातं पयस उस्रियायाः ॥
स्वर रहित पद पाठतप्त: । वाम् । धर्म: । नक्षतु । स्वऽहोता । प्र । वाम् । अध्वर्यु: । चरतु । पयस्वान् । मधो: । दुग्धस्य । अश्विना । तनाया: । वीतम् । पातम् । पयस: । उस्रियाया: ॥७७.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(अश्विना) हे चतुर स्त्री-पुरुषो ! (वाम्) तुम दोनों को (स्वहोता) धन देनेवाला, (तप्तः) ऐश्वर्ययुक्त (घर्मः) प्रकाशमान घर्म (नक्षतु) व्याप्त होवे, (पयस्वान्) ज्ञानवान् (अध्वर्युः) अहिंसा कर्म चाहनेवाला [वह घर्म] (वाम्) तुम दोनों के लिये (प्रचरत्) प्रचरित होवे। तुम दोनों (तनायाः) उपकारी विद्या के (दुग्धस्य) परिपूर्ण (मधोः) मधुविद्या [ईश्वरज्ञान] की (वीतम्) प्राप्ति करो और (पातम्) रक्षा करो, [जैसे] (उस्रियायाः) गौ के (पयसः) दूध की [प्राप्ति और रक्षा करते हैं] ॥५॥
भावार्थ
स्त्री-पुरुषों को योग्य है कि ये धर्मनिष्ठ होकर विद्या प्राप्त करके सर्वहितकारी कामों में सदा प्रवृत्त रहें ॥५॥
टिप्पणी
५−(तप्तः) ऐश्वर्ययुक्तः (वाम्) युवाम् (घर्मः) प्रकाशमानो घर्मः (नक्षतु) व्याप्नोतु-निघ० २।१८। (स्वहोता) धनदाता (वाम्) युवाभ्याम् (अध्वर्युः) मृगय्वादयश्च। उ० १, ३७। अध्वर+या प्रापणे-कु। अथवा सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। अध्वर-क्यच्। क्याच्छन्दसि। पा० ३।२।१७०। उ प्रत्ययः, अलोपः। अहिंसाप्रापकः। अहिंसामिच्छुः। याजकः (प्रचरतु) प्रचरितो भवति (पयस्वान्) ज्ञानवान् (मधोः) मधुनः। मधुविद्यायाः (दुग्धस्य) प्रपूरितस्य (अश्विना) हे उत्तमस्त्रीपुरुषौ (तनायाः) तनु विस्तारे, तन उपकारे-पचाद्यच्, टाप्। उपकारिकाया विद्यायाः (वीतम्) प्राप्तिं कुरुतम् (पातम्) रक्षां कुरुतम् (पयसः) दुग्धस्य (उस्रियायाः) धेनोः ॥
विषय
अध्वर्युः पयस्वान्
पदार्थ
१. (वाम) = हे अश्विनौ ! आपका (तप्तः घर्म) = दीस ज्ञानप्रकाश [सूर्यसम दीस ज्ञान] (नक्षतु) = हमें प्रास हो। प्राणसाधना के द्वारा हमें ज्ञानदीति प्राप्त हो। यह (वाम्) = आपका (स्वहोता) = आपके प्रति अपना अर्पण करनेवाला व्यक्ति (अध्वर्यु:) = यज्ञशील हो तथा (पयस्वान्) = शक्तियों के आप्यायनवाला होता हुआ (प्रचरतु) = प्रकृष्ट गतिवाला हो। प्राणसाधना से मनुष्य 'यज्ञशील, आप्यायित शक्तिवाला तथा प्रकृष्ट गतिवाला' होता है। २. हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (तनाया:) = पयस, दधि, आज्य'-रूप हवियों के देने के द्वारा यज्ञों का विस्तार करती हुई (उस्त्रियायाः) = इस गौ के (दुग्धस्य) = दोहे गये (मधो:) = मधुर रसोपेत, मधुवत् प्रीणनकारी (पयस:) = दूध का (वीतम्) = भक्षण करो, (पातम्) = पान करो। यह गोदुग्ध ही तुम्हारा खान-पान हो।
भावार्थ
प्राणसाधक 'दीत ज्ञानवाला, यज्ञशील, आप्यायित शक्तिवाला व प्रकृष्ट गतिवाला' होता है। प्राणसाधक को चाहिए कि ताजे गोदुग्ध को ही अपना खान-पान बनाये।
भाषार्थ
(अश्विना) हे दो अश्वियो ! (वाम्) तुम दोनों को (तप्तः) प्रतप्त (घर्मः) क्षारित दुग्ध (नक्षतु) प्राप्त हो, (स्वहोता१) स्वयं प्रदान करने वाला (अध्वर्युः) अहिंसामय दान यज्ञ का करने वाला, (पयस्वान्) दुग्ध वाला सेवक (वाम्) तुम दोनों के [सत्कार के] लिये (प्र चरतु) विचरे। हे अश्वियो ! (उस्त्रियायाः) गौ के, (तनायाः) और गोसन्तति के (मधो) मधुर (दुग्धस्य) दूध का (वीतम्) भक्षण करो, और (पयस) पेयदुग्ध का (पातम्) पान भी करो।
टिप्पणी
[स्वहोता = स्वयम् होता, प्रदान करने वाला (हु दाने)। अध्वर्युः = ध्वरति हिंसाकर्मा, तत्प्रतिषेधः अध्वरः, तं युनक्ति इति अध्वर्युः। नक्षति गतिकर्मा; व्याप्तिकर्मा (निघं० २।१४ २।१८)। तनायाः= "तना"२ का षष्ठ्येकवचन। तना= तनयेन (अथर्व० ८।४।१०; सायण)। अभिप्राय यह है कि हे अश्वियो! तुम गौ और गोसन्तति के दुग्ध का सदा सेवन किया करो। मन्त्र में 'वीतम्' तथा 'पातम्" दो पद पठित हैं, जिनके अभिप्राय हैं, खाना और पीना। दुग्ध द्रव होता है, अतः इसकी पेयरूपता तो स्पष्ट है, खाद्यरूप में दुग्ध, दधि रूप और आमिक्षारूप जाना जा सकता है]। [१. स्वहोता = स्वयं प्रदाता; हु दाने (जुहोत्यादिः)। २. अथवा "तना घननाम" (निघं० २।११), उस्रिया अर्थात् गौ धनरूप है। उस्रा गोनाम (निघं० २।११)। उस्रिया= उस्रा + इयाङ्।]
विषय
ब्रह्मानन्द रस।
भावार्थ
हे (अश्विनौ) अश्वियो ! (वां) तुम्हें (धर्मः) ज्योतिर्मय आत्मानन्द रस (नक्षतु) प्राप्त हो। (स्व-होता) स्वयं तुम्हारा होता = आदान प्रतिदान करने हारा (अध्वर्युः) कभी विनाश न होने वाला आत्मा (वाम्) तुम्हारे बल पर (पयस्वान्) पुष्टिप्रद पदार्थों और ज्ञान आनन्दरस से युक्त होकर (प्र चरतु) उत्तम, श्रेयोमार्ग में विचरण करे। हे अश्विनौ ! (तनायाः) देह के सब कार्यों का विस्तार करने वाली (उस्त्रियायाः) उत्सर्पणशील चेतना शक्ति के (मधोः) मधुमय, अमृत (दुग्धस्य) दुही गई, प्राप्त हुई (पयसः) ज्ञानराशिको (वीतं) और प्रकाशित करो। प्राणायाम के बल से आत्मा के आनन्द को प्राप्त करो। चितिशक्ति की ऋतम्भरा-प्रज्ञा को प्राप्त करके परमानन्द का सुख उपभोग करो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। अश्विनौ देवते। धर्मसूक्तम्। १, ४, ६ जगत्यः। २ पथ्या बृहती। शेषा अनुष्टुभः। एकादशर्चं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Yajna Karma
Meaning
Ashvins, harbingers of the dawn, men and women of the Rashtra, may the rising warmth and fragrance of yajna reach you. May the self-sacrificing organising priest of the yajna of love and non-violence, bearing milk and ghrta, conduct the yajna for you. Ashvins, enjoy the milk of cows, warmth of sun rays and the milky sweet knowledge of the honey essences of nature and protect and promote the yajna.
Translation
May the warm, self-offering libation come to you. May the offerer priest, with plenty of milk, come to you. O twinhealers, may you eat (the preparations of) the sweetened milk of the stout (cow) and drink the milk of the ruddy cow.
Comments / Notes
MANTRA NO 7.77.5AS PER THE BOOK
Translation
Let the warm oblation offered by the Hotar-priest come to these heaven and earth and let the Adhvaryu priest with the store of the milk or molten ghee etc conduct the yajna for these twain, let these two grasp the sweet milk milked from the healthy cow and be the source of the protection of all.
Translation
O learned man and woman, may ye get warm milk. May the learned, non-violent sacrificer serve ye. May ye obtain and drink the sweet milk yielded by a stout cow.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(तप्तः) ऐश्वर्ययुक्तः (वाम्) युवाम् (घर्मः) प्रकाशमानो घर्मः (नक्षतु) व्याप्नोतु-निघ० २।१८। (स्वहोता) धनदाता (वाम्) युवाभ्याम् (अध्वर्युः) मृगय्वादयश्च। उ० १, ३७। अध्वर+या प्रापणे-कु। अथवा सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। अध्वर-क्यच्। क्याच्छन्दसि। पा० ३।२।१७०। उ प्रत्ययः, अलोपः। अहिंसाप्रापकः। अहिंसामिच्छुः। याजकः (प्रचरतु) प्रचरितो भवति (पयस्वान्) ज्ञानवान् (मधोः) मधुनः। मधुविद्यायाः (दुग्धस्य) प्रपूरितस्य (अश्विना) हे उत्तमस्त्रीपुरुषौ (तनायाः) तनु विस्तारे, तन उपकारे-पचाद्यच्, टाप्। उपकारिकाया विद्यायाः (वीतम्) प्राप्तिं कुरुतम् (पातम्) रक्षां कुरुतम् (पयसः) दुग्धस्य (उस्रियायाः) धेनोः ॥
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