अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 73/ मन्त्र 4
यदु॒स्रिया॒स्वाहु॑तं घृ॒तं पयो॒ऽयं स वा॑मश्विना भा॒ग आ ग॑तम्। माध्वी॑ धर्तारा विदथस्य सत्पती त॒प्तं घ॒र्मं पि॑बतं रोचने दि॒वः ॥
स्वर सहित पद पाठयत् । उ॒स्रिया॑सु । आऽहु॑तम् । घृ॒तम् । पय॑: । अ॒यम् । स: । वा॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । भा॒ग: । आ । ग॒त॒म् । माध्वी॒ इति॑ । ध॒र्ता॒रा॒ । वि॒द॒थ॒स्य॒ । स॒त्प॒ती॒ इति॑ सत्ऽपती । त॒प्तम् । घ॒र्मम् । पि॒ब॒त॒म् । रो॒च॒ने । दि॒व: ॥७७.४॥
स्वर रहित मन्त्र
यदुस्रियास्वाहुतं घृतं पयोऽयं स वामश्विना भाग आ गतम्। माध्वी धर्तारा विदथस्य सत्पती तप्तं घर्मं पिबतं रोचने दिवः ॥
स्वर रहित पद पाठयत् । उस्रियासु । आऽहुतम् । घृतम् । पय: । अयम् । स: । वाम् । अश्विना । भाग: । आ । गतम् । माध्वी इति । धर्तारा । विदथस्य । सत्पती इति सत्ऽपती । तप्तम् । घर्मम् । पिबतम् । रोचने । दिव: ॥७७.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(यत्) जैसे (उस्रियासु) गौवों में (घृतम्) घृत और (पयः) दूध (आहुतम्) दिया गया है, (अश्विना) हे चतुर स्त्री-पुरुषो ! (आ गतम्) आवो, (अयम् सः) वही (वाम्) तुम दोनों का (भागः) भाग [सेवनीय व्यवहार] है। (माध्वी) हे मधुविद्या [वेदविद्या] के जाननेवाले, (विदथस्य) जानने योग्य कर्म के (धर्तारा) धारण करनेवाले, (सत्पती) सत्पुरुषों के रक्षा करनेवाले ! तुम दोनों (दिवः) सूर्य के (रोचने) प्रकाश में (तप्तम्) ऐश्वर्ययुक्त (घर्मम्) प्रकाशमान [घर्म] का (पिबतम्) पान करो ॥४॥
भावार्थ
जैसे गौ से घृत दुग्ध आदि सार पदार्थ लिया जाता है, वैसे ही विद्वान् स्त्री-पुरुष संसार के सर्व पदार्थों से तत्त्व ज्ञान प्राप्त करें, और जैसे सूर्य के प्रकाश में सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं, वैसे ही ब्रह्म विद्या का प्रकाश करके आनन्दित होवें ॥४॥
टिप्पणी
४−(यत्) यथा (उस्रियासु) अ० ४।२६।५। गोषु (आहुतम्) सम्यग् दत्तम् (घृतम्) (पयः) दुग्धम् (अयम्) (सः) (वाम्) युवयोः (अश्विना) उत्तमस्त्री-पुरुषौ (भागः) सेवनीयो व्यवहारः (आ गतम्) आगच्छतम् (माध्वी) मधु+ई गतौ-क्विप्, छान्दसो दीर्घः। सुपां सुलुक्पूर्वसवर्णा०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेः पूर्वसवर्णदीर्घः। मधु मधुविद्यां वेदविद्यामीयेते जानीतो मध्व्यौ मधुविद्यावेदितारौ (धर्तारा) धारकौ (विदथस्य) अ० १।१३।४। ज्ञातव्यस्य कर्मणः (सत्पती) सज्जनानां पालकौ (तप्तम्) ऐश्वर्ययुक्तम् (घर्मम्) प्रकाशमानं घर्मम् (पिबतम्) स्वीकुरुतम् (रोचने) प्रकाशे (दिवः) सूर्यस्य ॥
विषय
माध्वी, धारा विदथस्य, सत्पती
पदार्थ
१. हे (अश्विना) = प्राणापानो! (यत्) = जो (उस्त्रियासु) = गौवों में (घृतम्) = मलों का क्षरण करने तथा दीप्ति देनेवाला (पय:) = दूध आहुतम् प्रभु द्वारा दिया गया है, स्थापित हुआ है, (अयं स:) = यह (वां भाग:) = आपका भजनीय अंश है। (आगतम्) = आप आओ, उस दूध के ग्रहण के लिए प्राप्त होओ। २. हे प्राणापानो! आप (माध्वी) = मधुविद्या के बेदिता हो। प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की महिमा को देखना ही मधुविद्या है। प्राणापान की साधना होने पर यह साधक सर्वत्र प्रभु की महिमा को देखता है। अथवा (माध्वी) = आप जीवन को मधुर बनानेवाले हो। (विदथस्य धारा) = यज्ञों को धारण करनेवाले हो । (सत्पती) = सब सत्कर्मों के रक्षक हो। (दिवः रोचने) = मस्तिष्करूप धुलोक के दीप्त होने पर (तप्तं धर्मम्) = दीस हुए-हुए ज्ञानसूर्य को [Sunshine धर्म] (पिबतम्) = अपने अन्दर ग्रहण करो। प्राणापान का साधक ज्ञान का अपने अन्दर निरन्तर ग्रहण करता है।
भावार्थ
प्राणसाधक को चाहिए कि वह गोदुग्ध का सेवन करे। यह प्राणसाधना उसे मधुर जीवनवाला, यज्ञशील, उत्तम कर्मों का रक्षक व ज्ञानप्रकाश को अपने अन्दर लेनेवाला बनाएगी।
भाषार्थ
(यत्) जो (घृतम्, पयः) घृत और दूध (उस्रियासु) गौओं में (आहुतम्) परमेश्वर द्वारा प्रदत्त है (अयम्, सः) यह वह (भागः) भाग, (अश्विना वाम्) हे दो अश्वियो ! तुम दोनों के लिये है, (आ गतम्) आओ। (माध्वी) हे मधुर दुग्ध का सेवन करने वालो ! (विदथस्य) राष्ट्रयज्ञ के (धर्तारा) हे धारण करने वालो ! (सत्पती) हे सच्चे रक्षको ! (दिवः रोचने) दिन के प्रकाश में (तप्तम् घर्मम्) गर्म और क्षारित दूध को (पिबतम्) तुम पियो।
टिप्पणी
[विदथः यज्ञनाम (निघं० ३।१०)। माध्वी=मधुमन्तौ (ऋ० ५।७५।१, वेंकट माधव)। उस्रिया गौः (सायण), (निघं० २।११)]
विषय
ब्रह्मानन्द रस।
भावार्थ
(यत्) जो शक्तिरस (उस्त्रियासु) उत्सर्पणशील इन्द्रिय रूप गौओं में (घृतं) आत्माका तेजोमय चेतनांश (आ-हुतं) प्रदान किया गया है (सः पयः) वह पुष्टिकारक अंश वास्तव में हे (अश्विनौ) प्राण और अपान ! (वां भागः) तुम दोनों का भाग है। उसको प्राप्त करने के लिए तुम इस देह में, यज्ञमें (आगतम्) आओ, निरन्तर रहो। हे (विदथस्य) इस वेदना, चेतनामय जीवनरूप यज्ञ के (धर्त्तारौ) धारण करने हारो ! आप (माध्वी) मधुरूप आत्मा को धारण करने हारे और (सत्पती) सत्स्वरूप आत्मा के पालक हो। आप उस (तप्तम्) तपे हुए, तप, स्वाध्याय, प्रवचन, शम, दम, तितिक्षा, मुमुक्षा आदि साधनों से प्रतप्त, परिपक्व (धर्मम्) तेजोमय आत्मरस का (पिबतम्) पान करो. इसे प्राप्त करो। जो (दिवः) द्यु अर्थात् मूर्धास्थान के प्रति (रोचने) प्रकाशमान भाग में विराजता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। अश्विनौ देवते। धर्मसूक्तम्। १, ४, ६ जगत्यः। २ पथ्या बृहती। शेषा अनुष्टुभः। एकादशर्चं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Yajna Karma
Meaning
Ashvins, harbingers of the dawn, men and women who are harbingers of the day’s activities, the ghrta which is vested in the cows by nature, and the ghrta which is offered into the fire and through the fire into the rays of the sun, that is your share. Come and join. O honey sweet conductors and sustainers of yajna, holy managers and sustainers of the Rashtra yajna, taste, protect and promote the burning fire and rising fragrance of yajna and raise it to the lights of heaven.
Translation
What milk, rich in butter, was there in the cows, that has been poured (in the cauldron); O twin-healers, that, your share, is here. Please come. O full of sweetness, sustainers of the sacrifice, protectors of the good, drink the warm libation under the shine of the sky.
Comments / Notes
MANTRA NO 7.77.4AS PER THE BOOK
Translation
Let the twain of heaven and earth which are the source of worldly knowledge, supporter of the worlds and protector of the living creatures come into our knowledge and grasp the hot oblation in the light of day and whatever, ghee, milk etc. has been offered as oblation in the mornings is the share of these twain.
Translation
O wise man and woman, the molten butter and milk given to the cows, is your portion. Come ye hitherward. Ye, masters of the sweet knowledge of the Vedas occupants of the conscious Yajna of life, guardians of the noble, drink ye the warm milk in the light of the Sun!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(यत्) यथा (उस्रियासु) अ० ४।२६।५। गोषु (आहुतम्) सम्यग् दत्तम् (घृतम्) (पयः) दुग्धम् (अयम्) (सः) (वाम्) युवयोः (अश्विना) उत्तमस्त्री-पुरुषौ (भागः) सेवनीयो व्यवहारः (आ गतम्) आगच्छतम् (माध्वी) मधु+ई गतौ-क्विप्, छान्दसो दीर्घः। सुपां सुलुक्पूर्वसवर्णा०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेः पूर्वसवर्णदीर्घः। मधु मधुविद्यां वेदविद्यामीयेते जानीतो मध्व्यौ मधुविद्यावेदितारौ (धर्तारा) धारकौ (विदथस्य) अ० १।१३।४। ज्ञातव्यस्य कर्मणः (सत्पती) सज्जनानां पालकौ (तप्तम्) ऐश्वर्ययुक्तम् (घर्मम्) प्रकाशमानं घर्मम् (पिबतम्) स्वीकुरुतम् (रोचने) प्रकाशे (दिवः) सूर्यस्य ॥
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